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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 132, कुल 508 में से

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पृष्ठ 132

करके लौट जाओ। मेरे बदले तुम राजा को बार-बार धैर्य देते हुए, उनकी सेवा करते
रहना।' तब अत्यंत दीन होकर सुमंत्र साकेत नगर के लिए रवाना हुए।
१९. राम का गंगा पार करके वन में प्रवेश करना
राघव ने बड़ी भक्ति के साथ मन-ही-मन अयोध्या नगर को प्रणाम किया और गुह
की लाई हुई नाव में बैठकर गंगा पार करने लगे। बीच धारा में पहुँचने पर सीता ने
गंगा नदी को भक्ति के साथ हाथ जोड़कर प्रणाम किया और अत्यंत विनीत भाव से
प्रार्थना करने लगीं—'हे माता गंगे ! दशरथ नृप की आज्ञा से राज त्यागकर दुर्दशा को
प्राप्त मेरे पति घोर कानन में चौदह वर्ष तक निवास करने जा रहे हैं। मैं उनके साथ
भ्रमण करती हुई (अवधि-समाप्ति पर) यदि राम-लक्ष्मण के साथ सकुशल लौट आऊँगी,
तो आपकी सेवा में असंख्य गायें, वस्त्र, मिष्टान्न आदि विविध चढ़ावे समर्पित करूँगी और
भूसुरों को दान दूँगी।' इस प्रकार उन्होंने भव-भंग (संसार के पापों का नाश करनेवाली)
धवलांग (धवल शरीरवाली) भवमौलिसंग (शिव के जटाजूट में निवास करनेवाली)
गंगा की प्रार्थना की।
गंगा नदी पार करने के पश्चात् राम ने गुह का आभार मानकर उसे विदा किया
और उसके बताये हुए मार्ग से सीता को बीच में करके आगे-आगे लक्ष्मण तथा पीछे-पीछे
स्वयं चलने लगे। इस प्रकार तीन योजन का मार्ग तय करके सुधर्मद नामक सरोवर के
निकट पहुँचकर उस दिन वहीं ठहर गये। उस भयंकर कानन में अकेली सीता को सोती
हुई देखकर, अपनी दशा, अपनी माताओं का शोक कैकेयी की इच्छा की पूर्ति, महाराज की
सत्य-निष्ठा, प्रजा का दुःख—इन सब के बारे में अपने अनुज से कहते हुए रामचन्द्र की
आँखों में अश्रु बहने लगे।
रात्रि व्यतीत हुई। प्रभात- होते ही राघव वहाँ से रवाना हुए और तीन योजन
चलकर पवित्र गंगा तथा यमुना के संगम-स्थल पर प्रयाग पहुँचे। वहाँ निवास करनेवाले
मुनिलोक-वंद्य भरद्वाज मुनि को देखकर राम ने उन्हें प्रणाम किया और सारा समाचार उनसे
निवेदन किया। उस तपोधन ने रघुवंशज उन दोनों भाइयों को आशीर्वाद दिये, रघुराम
की सुशीलता पर आश्चर्य प्रकट किया और तथ्य को जान गये। उन्होंने कंद-मूल-फल
आदि से उन्हें संतुष्ट करके बड़े प्रेम से उनका सत्कार किया। वहाँ उन्होंने बड़े आराम
से रात बिताई और प्रातःकाल ही बड़ी निष्ठा से संध्योपासना करके मुनियों के आशीर्वाद
प्राप्त किये। इसके पश्चात् पुण्यात्मा भरद्वाज से अनुपम चित्रकूट पर्वत का मार्ग जानकर
वे वहाँ से विदा हुए। वन के बीच राम अपने धनुष की टंकार-मात्र सुनकर भागनेवाले
मृग-समूहों को सीता को दिखाते हुए उनका मनोरंजन करते जाते थे। जब वे थक जाते
या सीता थक जाती थीं, तो थोड़ी देर के लिए ठहर जाते और फिर चल पड़ते। इस
प्रकार कई दुर्गम स्थलों को पार करके वे यमुना के तट पर पहुँच गये। यमुना को पार
करते ही उन्होंने सिद्ध-वटवृक्ष (अक्षय वट) को देखा। सीता ने बड़ी भक्ति से अपनी
कार्यसिद्धि-हेतु हाथ जोड़कर उस वृक्ष की प्रार्थना की। वे उस रात को वहीं ठहर गये।
और, दूसरे दिन घोर जंगलों में सुरक्षित मार्ग से होते हुए उन्होंने माल्यवती से घिरकर,