सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 137, कुल 508 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 137

अयोध्याकांड १०७

ही मुझसे ऐसा दुस्साहस करने के लिए प्रेरित किया है । सरयू नदी के तट पर में अँधेरी
निशा में मृगया के लिए गया था और मृगों के आने के स्थान के पास छिपकर उनकी
आहट सुनकर उनपर शब्दवेधी बाण चलाकर उनका शिकार करता था । संयोग की बात,
उसी समय आपके पुत्र ने नदी के प्रवाह में जल के लिए कलश डुबोया । उसकी ध्वनि
सुनकर मुझे हाथी का भ्रम हुआ और मैंने बाण चला दिया । हे अनघ, मेरे उस शक्ति-
शाली बाण ने आपके पुत्र के प्राण हर लिये ।'
“इतना सुनना था कि मुनि का हृदय धक् से रह गया और वे मूर्च्छित हो गये ।
मुनि-पत्नी 'हाय पुत्र !' कहकर भूमि पर निश्चेष्ट हो गिर पड़ी । थोड़ी देर के बाद मेरा
विलाप सुनकर उनकी मूर्च्छा छूटी, तो उन्होंने मुझे देखकर कहा—'हे दशरथ ! तुमने हमको
शोकाग्नि में जलाने के लिए हमारे पुत्र को कहाँ छिपा रखा है ? वन में तपस्या करते हुए
हम अंधे तथा वृद्ध को मारकर तुमने घोर पाप किया है । तुम्हारा बाण लगते ही
न जाने हमारे पुत्र ने क्या कहा होगा ? कौन जाने कि उस हृदय-पीडा से उसके प्राण
निकल गये या अभी तक वह तड़प रहा है ? क्या मृत्यु का कोई कारण नहीं होना चाहिए
क्या बाण बिना कारण ही मुनि-पुत्र के प्राण हर सकता है ? वानप्रस्थ-आश्रम में जीवन
व्यतीत करनेवालों का वध, चाहे इन्द्र भी करें, तो उसका भी नाश हो जाता है, तो राजा
की क्या गिनती ? हे राजन्, तुमने अनजान में हमारे पुत्र का वध किया है, इसलिए तुम
पर क्रोध करना उचित नहीं है । अपने पुत्र को देखे बिना हमारी शोकाग्नि शांत नहीं
होगी । हमें अपने पुत्र के पास ले चलो ।'
“इस प्रकार शोक-विह्वल उन वृद्ध तपस्वियों को ले जाकर उन्हें उनके पुत्र को
दिखाकर मैंने कहा—'यही आपका पुत्र है । मुनि-पत्नी हाथों से टटोलते हुए कहने लगी,
'कहाँ है वह दयालु, उदार और विमलचेता ? कहाँ है वह तपोधन तथा पुण्यवान् ?
कहाँ है वह विद्वानों की प्रशंसा के योग्य आचरणवाला ? कहाँ है वह सतत वेदाध्ययन
में तत्पर ?' यों कहती हुई वह अपने पुत्र पर गिरकर विलाप करने लगी । फिर उन्होंने
उसे अपनी गोद में लिटाकर उसके भीगे हुए केशों पर सिर रखकर रोती हुई
कहने लगी—'हे विमलात्मा, हे यज्ञदत्त, हे सदाचरणवाले, हे धर्म-निपुण, तुम हमसे कहे बिना
कभी कहीं नहीं जाते थे । आज तुमने ऐसा क्यों किया ? आज स्वर्गलोक की यात्रा
के लिए जाते समय तुमने मुझसे क्यों नहीं कहा ? हे मेरे वंश-तिलक ! मैं बड़ी पापिनी हूँ ।
अर्द्ध-रात्रि के समय मैंने तुमसे (जल के लिए) जाने को कहा । गुरुजनों की भक्ति
में संसार में अद्वितीय पुत्र को मैंने खो दिया । मेरे लिए अब तपस्या किसलिए ? तुम्हारे
साथ परलोक जाने में ही मेरी सद्गति है । कहाँ तीक्ष्ण बाण और कहाँ तुम्हारे प्राण ?
कहाँ राजा दशरथ और कहाँ तुम ? हाय ! अन्त में तुम्हारे कर्म-फल ने इन सबका
संयोग करके तुम्हारे प्राण ले लिये हैं ।'
“शोक-संतप्त माता के इस तरह के आर्तनाद को सुनकर मुनि अपने पुत्र पर गिरकर
कहने लगे—'हाय पुत्र ! तुम तो मेरे पास आकर मेरी सेवा करते थे । आज मैं तुम्हारे
पास आया हूँ, तो भी तुम मेरी सेवा-शुश्रूषा नहीं करते हो, क्या तुम्हें यह उचित है ?