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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 133, कुल 508 में से

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पृष्ठ 133

अयोध्याकांड १०३
श्रेष्ठ सयमी मुनियो के निवास-स्थान से होते हुए सुललित तरु-लताओ के समूह से भरे
चित्रकूट को देखा । उस पर्वत पर निवास करनेवाले तपोधन मुनियो को देखकर उन्होने
प्रणाम किया और उनसे उचित आदर-सत्कार प्राप्त किया । फिर, उनकी आज्ञा प्राप्त
करके गम और उनके अनुज दोनो ने एक स्थान पर बडे उत्साह से पेडों की शाखाओ
को काटकर अनोखी पर्णशाला बनाई । एक काले हिरन का वध करके गृह-शान्ति तथा
हवन-आदि विधिवत् पूरा किये । उसके पश्चात् राम और सीता ने उस पर्णशाला की
प्रशंसा करते हुए उसमें प्रवेश किया और मुनियो की प्रशंसा प्राप्त करते हुए उनकी चरित्र-
चर्चाओ में आनंद लेने हुए वहाँ रहने लगे ।
२०. काकासुर-वृत्तांत
एक दिन सीता की जाँघ पर सिर रखे राम सोये हुए थे । सीता भोजन के लिए
कंद-मूल-फल आदि तैयार कर रही थी । तब निर्भय गति से एक दुष्ट कौआ पर्णशाला में
प्रवेश करके उसका नाश करने लगा । सीता ने उसे भगाने का प्रयत्न किया, फिर भी वह
भागा नही । वह इधर-उधर देखकर अंत में सीता के स्तन पर बैठकर चोंच मारने लगा ।
जब रक्त की धारा बहने लगी, तब राम जाग पडे । उस दुष्ट कौए की करतूत पर क्रुद्ध
होकर राम ने उस पर एक बाण चलाया । उसने कौए का पीछा किया । कौआ काँव-काँव
करता हुआ (उस बाण से बचने के लिए) तीनो लोको का चक्कर काटने लगा । मगर कही
कोई रक्षक नही मिला । उसने दिक्पाल, ब्रह्मा तथा शिव की शरण माँगी । किन्तु उन्होने कहा—
'यह श्रीराम का शर है । इसे हम रोक नही सकते ।' तब वह कौआ फिर राम की
शरण में आया । तब अत्यन्त कृपा से उस कौए को देखकर राम ने कहा—'मेरा बाण कभी
खाली नही जायगा । अत तुम अपना कोई अग उसे देकर अपनी जान बचाओ । तब
कौए ने बडी भक्ति से अपनी एक आँख उस अस्त्र को भेंट की और वहाँ से चला गया ।
तब राम ने देवताओ को सीता के तैयार किये हुए फल आदि का भोग चढ़ाया और उसके
पश्चात् सब लोगो ने उन फलो को ग्रहण किया ।
२१. सुमंत्र का अयोध्या पहुँचना
वहाँ सुमंत्र राम की गति-विधि जानने के लिए तीन दिन तक गुह के साथ रहे ।
फिर दूसरे दिन उन्होने घोर दुख से पीडित होते हुए अयोध्या नगर में प्रवेश किया ।
सहज श्री से हीन उस राज-मार्ग में जब वह जाने लगा, तब नगरवासी रथ की ध्वनि
सुनकर यह कहते हुए सुमंत्र के पास आये कि देखो, रामभद्र आ गये हैं । किन्तु रथ में
रघुराम को न देखकर वे सुमंत्र से कहने लगे—'हे क्रूरकर्मी, राम के बिना यह रिक्त
रथ यहाँ क्यो लाये हो ?' इस प्रकार लोगों की भीड एकत्रित होकर उनकी निंदा
करने लगी । सुमंत्र उन्हें रामचन्द्र का वृत्तांत सुनाते हुए राजा के अंत पुर के निकट आ
पहुँचे । वहाँ रथ से उतरकर वे गजा के निवास की ओर गये । उन्होने धूलि-धूसरित
शरीर तथा अश्रु-पूरित नयनों से, मन-ही-मन कुढ़नेवाले राजा को अविगत दुख से अभि-
भूत होकर कौसल्या के घर में पडे और विलाप करते हुए देखा । उन्होने राजा को प्रणाम