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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 139, कुल 508 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 139

उन्होंने राजा के हाथ-पैर छूकर देखे । उन्हें अब ज्ञात हो गया कि राजा के शरीर में
प्राण नही है । तब वे रुदन करने लगे । कौसल्या हड़बड़ाकर उठी, सुमित्रा भी जागकर आई ।
उन दोनो ने राजा को देखा और ऊँचे स्वर में विलाप करने लगी—'हाय प्राणनाथ,
हाय महाराज ! आप हमें छोड़कर चले गये ।' यह विलाप सुनकर कैकेयी दौड़ी हुई आई ।
दोनो ने सिर पीटते हुए कैकेयी को देखकर कहा--'हाय कैकेयी ! आज तुम्हारी
इच्छाएँ पूरी हुईं । तुमने काकुत्स्थ-वंश का सर्वनाश किया । राम को वन में भेजकर
अपयश का सहन करते हुए तुमने दशरथ के प्राण ले लिये । आज से तुम अपने पुत्र के
साथ समस्त पृथ्वी का उपभोग करो ।'
इस प्रकार, कौसल्या आदि रानियाँ कैकेयी को घेरकर रोने-कलपने लगीं । वह सिर
झुकाये अत्यधिक शोक से अपने पति के शरीर पर गिरकर कई प्रकार से विलाप करने लगी ।
कौसल्या की चेतना जब लौट आई, तब उन्होंने कहा—'हे राजन् ! क्या आप
जैसे धर्मात्मा की ऐसी मृत्यु होनी चाहिए ? आपके आदेश का उल्लघन न करके मैं धोखा
खा गई । आपकी सत्यनिष्टा ने आपकी यह दशा कर दी । अत्यत क्रूर स्त्री कैकेयी को
देखकर और राम के वनवास के दुख से अभिभूत होकर मैं आपकी उचित परिचर्या न
कर सकी । आपकी इच्छा का पालन करते हुए वन में निवास करके राघव महायश का
भागी बना । सत्य का पालन करके आपने स्वर्ग-सुख को प्राप्त किया । अब मुझे केवल
आप जैसे उत्तम पति को कटुवचन सुनाने का पाप मिला ।'
इस प्रकार, कौसल्या को विलाप करते देख सुमित्रा आदि रानियाँ ऊँचे स्वर में रुदन
करने लगीं । बात-की-बात में यह समाचार सारे नगर में फैल गया । स्त्रियों के विलाप
से सारा आकाश गूंजने लगा । सूर्योदय के होते ही अत्यन्त भीत हो राजा के मित्र,
नातेदार, सामंत-राजा, वसिष्ठ आदि मुनि, ब्राह्मण तथा नगर के प्रतिष्ठित व्यक्ति, आकर
शोक व्यक्त करने लगे । वसिष्ठ मुनि मंत्रियों के परामर्श के पश्चात् महाराज दशरथ के
शरीर को तेल में डुबोकर मणिमय सिंहासन पर उसे बैठा दिया, मानो वे दरबार में बैठे
हुए हों । उसके पश्चात् उन्होंने सामंत राजाओं को तथा मंत्री और राजनीतिज्ञों को संबोधित
करते हुए कहा—'महाराज साम्राज्य का पालन करके सुरधाम चले गये । पिता का वचन
पालन करने के लिए राम अपनी स्त्री के साथ वन-वास करने गये । उससे पूर्व ही शत्रुघ्न
के साथ भरत अपने मामा के नगर गये हैं । यदि हम रामचन्द्र को बुला भेजें, तो वे नहीं
आयेंगे । वे अपने प्रण के पालन में पटु हैं । इसलिए हमें राजकाज को संभालने के लिए
भरत को शीघ्र बुलाना चाहिए । राजा के बिना कोई भी देश, नगर या राष्ट्र शोभा
नही देता । दण्डनीति, दान-धर्म आदि की व्यवस्था बिगड़ जायगी । शत्रु प्रबल हो जायेंगे ।
जार-चोर आदि की वृद्धि होगी । दुर्जन सज्जनों को दुख देने लगेंगे । सामंत, दुर्ग-रक्षक
आदि कर नहीं देंगे ।'
ऐसा निश्चय करके उन्होंने धीमान्, जयन्त आदि चार मंत्रियों को बुलाकर कहा—
'तुम लोग भिन्न-भिन्न वस्त्राभरण लिये हुए वज्रपुर जाओ और भरत को यहाँ की घटनाओं
का पता दिये बिना सिर्फ इतना कहो कि गुरु वसिष्ठ ने आपको लिवा लाने के लिए हमें