रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 145, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ें'हे महात्मा, आपके तपोबल की महिमा की प्रशंसा करना ब्रह्मा के लिए भी कठिन है । अब
हम सूर्यवंश-तिलक रघुराम की सेवा में जायेंगे । हमें आज्ञा दें।' यो कहकर भरत ने
अपनी माताओ से मुनि को प्रणाम करवाया । मुनि बोले—'ये कौन-कौन हैं ? अलग-अलग
इनका परिचय मुझे दो ।' तब भरत ने कहा—'हे महात्मा, ये राजा की ज्येष्ठ रानी
सफलजन्मा कौसल्या है, जिन्होंने सब लोगो में कीर्त्ति तथा प्रशंसा पाई है । राम को पुत्र-
रूप में प्राप्त कर अपनी कोख को सफल बनाया है, पर उनके (राम के) वियोग की
अग्नि में तप्त हो रही है । ये लक्ष्मण को जन्म देनेवाली पुण्यशीला सुमित्रा हैं, जो कौसल्या
के बायें हाथ की तरह रहती हैं । पुष्प-रहित कर्णिकार की शाखा के समान अलंकारहीना
होकर राम के वियोग-दुख से दुःखी हैं । ये हतपुण्या मेरी माता कैकेयी हैं, जिनके कारण
मेरे अग्रज वनवास के लिए गये हैं, जिनके कारण मेरे पिता का देहात हुआ और जिनकी
इच्छा ने मेरी ऐसी दुर्गति कर दी है ।' इतना कहकर उमडते हुए शोक मे विह्वल तथा
गद्गद हो वे चुप हो रहे । मुनि ने उन्हें सांत्वना देते हुए आगे के कार्य का विचार करके
कहा—'कैकेयी ने लोकहित किया है । यह तुम लोगो को आगे स्पष्ट होगा ।' इतना
कहकर उन्होने भरत को राम के निवास-स्थान का मार्ग बताया और उन्हें आशीर्वाद देकर
विदा किया ।
भरत ने अत्यंत श्रद्धा मे युक्त हो सेना के साथ चित्रकूट पर्वत की ओर प्रस्थान
किया । हाथियो के चिंघाडने, अश्वो के हिनहिनाने, सेना के वार्त्तालाप करने, तथा रथो के
चलने से जो विपुल रव होता था, उससे भीत होकर जगली मृग चारो दिशाओ में
भागने लगे । विशाल सेना के चलने से उठी हुई धूलि से आवृत होकर सूर्यमडल भी मलिन
दीखने लगा ।
वहाँ चित्रकूट में कुटिल-कुतला सीता के साथ राम बडे आनंद से वार्त्तालाप कर रहे थे ।
सीता का ध्यान पर्वत की शोभा की ओर आकृष्ट करते हुए वे कह रहे थे—
'हे बिंबाधरवाली, देखा तुमने पर्वत की शोभा, हमारे नेत्रो को कितना अपूर्व आनंद पहुँचा रही है ।
इस पर्वत की महिमा का वर्णन करना क्या शेषनाग के लिए भी संभव है ?
निर्झरो की घन गभीर ध्वनियो को मेघ-गर्जन समझकर अत्यंत आनंद से तुम्हारे केश
की समता रखनेवाले अपनी पंखो को फैलाकर नाचनेवाले उन मयूरो को देखो । क्या,
इन भीलनियो को तुमने देखा, जो अपने कुच-कुंभो को गज-कुंभो की समता प्रदान करने
के लिए, गजो के कुभस्थल को चीरकर उसमें से निकले हुए मणियो को धारण कर रखा है।
देवताओ का संकेत-स्थान होने के कारण इस घाटी में दिव्य सुगंधि फैल रही है ।
वहाँ देखो, वह गंधर्वों का क्रीडा-स्थल उनके पदतलो के महावर-वर्ण से प्रकाशमान दीख
रहा है । हे किन्नर-कंठवाली, यह गिरि-गुफा देखो, जो किन्नर-किन्नरियो के संगीत से
मुखरित है । हे कोकिलकंठी, इस सहकार-वृक्ष को देखो, जो कोयल की कलध्वनि तथा
पल्लवो से युक्त है । हे कोमलांगी, मलया निल विभिन्न प्रकार के फूलो की सुगंधि को
एकत्रित करते हुए मद-मद गति से चलकर हम पर अपना प्रभाव डाल रहा है । वहाँ
उस मंदाकिनी को देखो, जो लाल तथा सफेद कमलो के समूह से अलंकृत है, जिसके कूल