रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 130, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ें१०० रंगनाथ रामायण
कराया और तृण तथा शिला-आवृत भूमि पर अत्यत वेग से उसे चलाने का आदेश दिया ।
उनका गमन तथा महाराज के आदेश की कथा सुनकर मार्ग के ग्राम-वासी अत्यत दु खी
हुए और धैर्य तजकर रुदन करने लगे । ऐसे कितने ही ग्रामवासियों का रुदन वार-वार
सुनते हुए मार्ग के विविध वन-दृश्यों को सीता को दिखाते हुए, प्राचीन काल में सूर्य-वश-
मणि इक्ष्वाकु को मनु के द्वारा दी हुई भूमि का अवलोकन करते हुए अत्यत शीघ्र गति से
उन्होने सरयू नदी¹ को पार किया और दूसरे दिन सध्या तक गगा नदी के तट पर
पहुँच गये । वहाँ पहुँचकर उन्होने एक इगुदी-वृक्ष के नीचे बडी शान्ति के साथ विश्राम किया ।
वहाँ, तमसा नदी के तट पर अयोध्या की प्रजा ने प्रभात के समय उठकर चारो
ओर देखा, तो वे सभ्रमित तथा आश्चर्य-चकित रह गये । वहाँ न राम-लक्ष्मण थे, न रथ
का कही पता था । उनके शोक की सीमा नही रही । रथ के पहियो के चिह्न देखकर
उन्होने सोचा कि कदाचित् महाराज की आज्ञा पाकर राम राज्य-भार को वहन करने
अयोध्या लौट गये हैं । वे अयोध्या को लौट आये, किन्तु वहाँ भी राम को न देखकर वे
शोकाग्नि में तपने लगे और कहने लगे—‘हाय ! राम हमें भुलावा देकर चले गये ! ’
वे राम की दयालुता, उनकी सत्यनिष्ठा तथा सद्व्यवहार की प्रशसा करते हुए उनके वियोग
में दु ख का अनुभव करने लगे ।
१५. गुह से राम की भेंट
निषादराज गुह को जब यह समाचार मिला कि राघव गगा-तट पर ठहरे हुए हैं,
तब वह राम-लक्ष्मण की सेवा में कदमूल-फल आदि खाद्य पदार्थ, सुनहले वस्त्र तथा
विविध उपहार लेकर आया और बडी भक्ति से उन्हें प्रणाम करके सब वस्तुओ को उनके
चरणो में अर्पित करके कहा—‘हे देव, क्या कारण है कि आप राज-पाट छोडकर वनवास
के लिए पधारे हैं ? हे सूर्य-वश-तिलक, मेरे जैसे सेवक के रहते हुए आपकी ऐसी दशा क्यो ?
जिस दुष्ट ने आपकी यह दशा कर दी है, उस नीच का मैं युद्ध में वध कर डालूँगा ।’
उसकी सद्भक्ति, शक्ति तथा धीर वचनो को सुनकर राघव अत्यत प्रसन्न हुए और
उसे गले से लगाकर अपना सारा वृत्तात कह सुनाया । सारी कथा सुनने के पश्चात्
गुह मन-ही-मन चितित हुआ और कैकेयी की करतूत पर दुःख प्रकट करने लगा । उसने
दशरथ की सरलता पर खेद प्रकट किया और दशरथात्मजो की दुर्दशा का विचार करके
शोक-पीडित हुआ । राम अत्यत स्नेहातुर हुए और आप तथा लक्ष्मण दोनो ने उचित रीति
से गुह के दु ख का शमन किया ।
इतने में सूर्यास्त हो गया । राजकुमारो ने सध्या-वंदन आदि से निवृत्त होकर गगा-
जल से अपनी क्षुधा शात की । उसके पश्चात् राम, जानकी तथा लक्ष्मण तृण-शय्या पर
विश्राम करने लगे । सूत (सुमन्त्र) तथा शृगवेरपुर का स्वामी गुह उनकी सेवा में लगे रहे ।
१ सरयू नदी तो अयोध्या से उत्तर होकर बहती है और फिर विहार में प्रवेश
करती है । राम दक्षिण की ओर चले थे, उन्हें सरयू नदी कैसे मिलती ? वाल्मीकि ने
गंगा के निकट पहुँचने के पहले राम को वेदश्रुति और गोमती नदी को पार
उतरवाया है ।—सम्पादक