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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 138, कुल 508 में से

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पृष्ठ 138

इस वाण से जो घाव तुम्हें लगा, उसके द्वारा क्या तुम्हारा सारा निर्मल गुण-समूह निकल
गया ? मैं अब किसे वेद पढाऊँगा ? किसे अब शास्त्र समझाऊँगा ? किसे धर्म सुनाऊँगा ?
काव्य किसे समझाऊँगा ? हमारी आवश्यकता पहचानकर हमें कौन फल तथा जल
लाकर देगा ? मैंने सदा तुम्हें चिरायु रहने का ही तो आशीर्वाद दिया है ? कब मैंने वज्रसम
‘शक्तिशाली वाण से तुम्हारी मृत्यु की कल्पना की थी ? हे पुत्र, तुम मुझे भी अपने साथ
ले चलो, तो मैं यम से भी पुत्र-भिक्षा देने की प्रार्थना करूँगा । संसार की यही रीति है
कि पुत्र अपने माता-पिता के परलोक-संबधी क्रिया-कर्म करते है । आज विधि ने उस
क्रम को उलट दिया और तुम्हारे क्रिया-कर्म करने के लिए हमें नियोजित किया । जबतक
तुम रहे, तुमने बड़ी भक्ति से हमारी सेवा करके हमारी रक्षा की । हे पुण्यचरित्र !
मैं किस युग में तुम्हारे जैसा पुत्र प्राप्त करूँगा ? तुम पाप-रहित हो, श्रेष्ठ तपोनिधि हो,
गुरुभक्त, परमार्थी, आर्य, धर्मनिष्ठ, दानी, पर-दुःखनिवारण करनेवाले, अन्न आदि महादान
करनेवाले जो पुण्य लोक प्राप्त करते हैं, वही तुम भी प्राप्त करो ।'
“इस प्रकार शोक करते हुए उन्होंने अपने पुत्र का यथाविधि अग्नि-संस्कार किया ।
यज्ञदत्त ने देवताओ के विमान में आरूढ हो आकाश की ओर प्रस्थान करते हुए कहा—
'हे गृहजनो, मैंने स्वर्गलोक का भोग प्राप्त किया है आपकी सतत सेवा करते हुए पुण्य-
वान् हुआ हूँ । अब मेरी मृत्यु का आप शोक मत कीजिए । जिस समय जो होना चाहिए,
वह हुए बिना नहीं रहता । होनहार होकर ही रहता है । आप इन पर (राजा पर)
क्रोध न कीजिए ।' इस प्रकार कह उसके स्वर्गलोक चले जाने के बाद, उन्होंने पुत्र-प्रेमजन्य
दुःख से प्रेरित होकर मुझे शाप दिया—‘हे राजन् ! लो, हम पुत्र-शोक से मर रहे हैं,
तुम भी हमारे समान ही पुत्र-शोक के कारण मृत्यु को प्राप्त करोगे ।’ इस प्रकार, कहकर
उन्होंने वहीं अपने प्राण छोड़ दिये ।”
२३. दशरथ का स्वर्गवास
'यही मेरा कर्म-फल है, जिसे भोगने का समय आसन्न है । अग्निसम पवित्र उन
तपस्वियो का अग्नि-संस्कार करके मैं नगर में लौट आया । मेरा धैर्य छूट गया है । मेरी
बुद्धि भ्रमित हो रही है, कंठ सूख रहा है, आँखें देखने में असमर्थ हो रही हैं, दूसरे के
शब्द सुनाई नहीं पड़ रहे हैं, अब मेरे प्राण रोकने पर भी इस शरीर में नहीं रुकेंगे ।
मेरे लिए कल्पतरु, बुद्धिमान्, पराक्रमी, गुणवान्, मेरा भाग्य-प्रद, शुभ-गुण-संयुक्त राम को
इस समय मैं नहीं देख पा रहा हूँ । आज सात दिन हुए, मैंने राम को नहीं देखा । राम
को छोड़कर मैं कैसे रह सकता हूँ ?’ इस प्रकार 'हा राम ! हा राम !' का आर्तनाद
करते हुए दशरथ का स्वर्गवास हो गया ।
शोक से अत्यधिक पीड़ित होकर राजा सो गये हैं, ऐसा सोचकर कौसल्या भी
सो गई । प्रभात होते ही बंदी तथा मागध स्तुति-पाठ करने लगे, मंगल-वाद्य बजने लगे और
नगर-निवासी एकत्रित होकर राजा के दर्शनार्थ उत्कंठा से प्रतीक्षा करने लगे । प्रतिदिन
की तरह राजा अबतक जगे क्यों नहीं, यह सोचते हुए परिचारक राजा की शय्या के
निकट गये और राजा को सोई हुई दशा में देख उन्हें कुछ भय हुआ । लंबी साँस भरते हुए