रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 126, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ें९६ रंगनाथ रामायण
तब राम ने दशरथ से कहा—'महाराज, मेरे वियोग से शोक-सन्तप्त मेरी माता
कौसल्या को सांत्वना देते हुए आप उनकी रक्षा करते रहें।'
तब दशरथ ने अत्यन्त दुःखी होकर कहा—'हे राम, न जाने मैने पूर्व जन्म में कौन-सा
पाप किया था ? उसका फल तो मुझे भोगना ही चाहिए। माताओ से पुत्रो को अलग करके
तुम्हारे हृदयो को दुःख देना पड रहा है। हाय, कैकेयी के वचनो के कारण तुम्हें वन में कष्टो को
सहने के लिए निष्ठुर होकर भेजना पड रहा है। हे पुत्र, हे राम, यह कैसा अनर्थ है।'
यो कहकर दशरथ मूर्च्छित हो गये। उपचार के उपरात जब वे कुछ सँभले, तब
उन्होने चौदह वर्ष के लिए आवश्यक श्रेष्ठ वस्त्र तथा आभूषण सीता को दिलवाये।
सीता ने उन श्रेष्ठ वस्त्रो तथा आभूषणो को धारण किया।
१५. राम का दशरथ को सांत्वना देना
तब दशरथ को देखकर राम ने कहा—'महाराज में चौदह वर्ष की अवधि चौदह
दिन की तरह बिताकर शीघ्र ही लौट आऊँगा। मेरी अपेक्षा भरत आपका प्रिय भक्त है।
आप दुख मत कीजिए। भरत का राज-तिलक कर दीजिए। माता कैकेयी के कृत्य को
सोचते हुए आप मन-ही-मन क्षुब्ध मत होइए। मेरी माँ आपकी सेवा अच्छी तरह करती
रहेगी। उन पर आप भी कृपा-दृष्टि रखिए।'
यो कहकर उन्होने सीता तथा लक्ष्मण के साथ उनकी परिक्रमा की और प्रणाम
किया। तब राजा ने अपने पुत्रो तथा बहू को आशीर्वाद दिया—'तुम वन जाकर कुशल-
पूर्वक लौटो।' उसके पश्चात् उन तीनो ने कौसल्या के चरण-कमलो का स्पर्श किया।
राघव की वेश-भूषा देखकर माता ने क्रूर विधि की निंदा करती हुई विलाप किया और
फिर राम तथा लक्ष्मण को आशीर्वाद दिये।
१६. सीता को सीख देना
फिर जानकी को देखकर कौसल्या अत्यन्त दुःखी होकर बोलीं—'राम को योग्य राज-
पुत्र समझकर बिना हमारे माँगे ही तुम्हारे पिता ने तुम्हारा विवाह उसके साथ कर दिया।
किन्तु आज दैव-योग से तुम्हारी यह दशा हो गई। तुम्हें तापस-वृत्ति ग्रहण कर अपने
पति के साथ वनो में निवास करना पड रहा है। इसके लिए चिन्ता मत करो। राघव
अवश्य बाद को पृथ्वी का पालन करेगा। चाहे पति निर्धन ही क्यो न हो जाय, फिर भी
स्त्री को उसे त्यागना नहीं चाहिए। यही सती स्त्रियो का धर्म है। पति की आज्ञा पालन
करनेवाली स्त्रियो का दोनो लोको में शुभ होगा।'
तब सीता ने कौसल्या को देखकर कहा—'हे माताजी, मैं अवश्य पति के अनुकूल
होकर भक्ति के साथ उनकी सेवा करूँगी और धर्म के मार्ग पर चलूँगी। पति की प्रसन्नता
जिस रमणी को प्राप्त नही है, वह चक्र-हीन रथ के समान और तार-हीन वीणा के समान है।
वह पुत्रोवाली पुण्यवती होने पर भी अत्यन्त दुःखी रहेगी। अत, यदि पति को प्रिय हो,
तो मै अपने प्राणो को भी बडे हर्ष से निछावर कर दूँगी।'
तब कौसल्या ने सीता से कहा—'भू-माता की पुत्री होकर तुम्हारे ये गुण तुम्हारे
अनुकूल ही हैं। लक्ष्मण, उज्ज्वल गुण-सम्पन्न तुम्हारे पति का आप्त-बन्धु है। उसके प्रति