रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 127, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ेंस्नेह रखना ।' 'आपकी आज्ञा शिरोधार्य है'—सीता ने कहा और उन्हें प्रणाम किया ।
कौसल्या ने उन्हें हृदय से लगा लिया और आशीर्वाद दिये ।
फिर कौसल्या ने राम को संबोधित करके कहा—'हे राजकुमार, मैथिली तथा
सौमित्र का सतत ध्यान रखना ।' राम बोले—'माता, आपकी आज्ञा का पालन अवश्य
करूँगा । लक्ष्मण तो मेरा दाहिना हाथ हैं और सीता मेरी गति के समान हैं । क्या में
कभी इनके प्रति असावधान रह सकता हूँ ? यदि में धनुष धारण करूँ, तो (इन्हें) कौन-सा
भय हो सकता हैं । चाहे त्रिनयन ही क्यो न आ जायें । अब आप शोक मत कीजिए ।
हम तीनो, आपको, पिताजी को और सब माताओ को प्रणाम करते हैं, आप हमें आशीर्वाद
दीजिए ।'
इस प्रकार कहते हुए उन्होने सीता तथा लक्ष्मण के साथ तीन सौ पचास माताओ
की प्रदक्षिणा की । यह दृश्य देखकर सभी माताओ का हृदय पिघल गया और वे विलाप
करने लगी ।
जब तीनो ने माता सुमित्रा को प्रणाम किया, तब उन्होने उन्हें हृदय से लगा लिया
और राम तथा सीता को आशीर्वाद दिये । उसके पश्चात् वे महाराज के अनुचित कार्य
का विचार करके दुःखी हुई और लक्ष्मण को पास बुलाकर अत्यंत गंभीर स्वर में बोली—
'हे वत्स ! तुम राम को ही अपने पिता दशरथ के समान और जानकी को मेरे समान
मानना । वन को ही अयोध्या समझना और अत्यंत भक्तियुक्त होकर राम की सेवा करते हुए
अत्यधिक विजय तथा उन्नति प्राप्त करो ।' उसके बाद वे राम को देखकर बोली—
'हे रघुवीर, लक्ष्मण सतत तुम्हारे कल्याण का विचार करनेवाला, कल्मष-रहित सखा तथा
अनुज है । वन में तुम इसकी रक्षा करते रहना ।' राम ने माता की आज्ञा को बड़ी नम्रता
से स्वीकार किया ।
१७. राम का वन-गमन
तत्पश्चात् राम ने गृह-देवताओ, मुनियो तथा माताओ को प्रणाम किया और सीता
तथा लक्ष्मण के साथ शर-चाप-तूणीर से युक्त हो वे वन के लिए रवाना हुए । तब दशरथ ने
मन-ही-मन दुःखी होते हुए सुमंत्र को देखकर कहा—'वह देखो, राम वन जा रहा है,
उसके लिए रथ ले जाओ ।'
राजा की आज्ञा मानकर सुमंत्र रथ को लिये राम के पास पहुँचे और भक्ति से
प्रणाम करके बोले--'हे रघुराम, राजा ने यह रथ भेजा है । इस पर आरूढ होकर आप
वन के लिए प्रस्थान कीजिए ।' राजा की आज्ञा को मानकर राम ने सीता को पहले रथ
पर बिठाया, फिर अपने शस्त्रो को रखने के बाद लक्ष्मण के साथ स्वयं भी उस विशाल
रथ पर चढ़कर वन के लिए रवाना हुए ।
नागरिक, वृद्ध, आप्त, मंत्री, स्त्रियाँ, बालक, मित्र, आश्रित, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य
तथा शूद्र अत्यधिक दुःख प्रकट करते हुए रथ के आगे-पीछे तथा दोनो ओर भीड लगाकर
चलने लगे । कुछ लोग मथरा को कोस रहे थे कि उसने इक्ष्वाकु-वंश के गौरव को नष्ट
कर दिया, कुछ कैकेयी की निंदा करते हुए कह रहे थे कि क्या रघुराम को तपस्वी का
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