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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 140, कुल 508 में से

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पृष्ठ 140

११० रंगनाथ रामायण
भेजा है । तुम उन्हें अपने साथ अवश्य लिवा लाना, शीघ्र जाओ । वे मंत्री घोड़ों पर सवार हो
रथ की गति से चलने हुए विभिन्न नगरों, जनपदों, नदियों, काननों, पहाड़ों तथा झाड़ियों
को पार करते हुए केकयराज के नगर में जा पहुँचे । दशरथ की मृत्यु के सातवें दिन
रात को वहाँ उन्होंने (भरत और शत्रुघ्न) स्वप्न में देखा कि उनके पिता गोबर तथा
कीचड़ में भरे विशाल गड्ढे में गिर पड़े हैं । समुद्र सूख गया है, चन्द्र पृथ्वी पर गिर गया है,
भद्रगज का एक दाँत टूट गया है । ऐसे दुःस्वप्न देखकर वे जाग पड़े और अत्यंत
भीत होकर अपने इष्ट-मित्रों को स्वप्न का वृत्तांत सुनाकर, उसका फल जानना चाहा ।
इसी समय अयोध्या के दूत वहाँ पहुँचे और भरत को प्रणाम करके साथ लाई हुई भेंट उन्हें
देकर अत्यंत विनीत भाव से बोले—'हे देव, किसी कार्यवश वसिष्ठजी ने आपको शीघ्र
लिवा लाने के लिए हमें भेजा है । अतः आप शीघ्र प्रस्थान कीजिए ।'
दूतों के कृत्रिम हाव-भाव देखकर वे और भी भीत हो गए । उन्होंने अपने
मामा से सारा वृत्तांत कह सुनाया और सादर उनकी आज्ञा प्राप्त करके रथ पर आरूढ़ हो,
मंत्री तथा चतुरंगिणी सेना के साथ चल पड़े । अत्यंत वेग से यात्रा करते हुए वे सात
दिनों में अयोध्या पहुँच गये ।
२४. भरत का अयोध्या में प्रवेश
अयोध्या में प्रवेश करते ही उन्होंने देखा कि सारा नगर पतिहीना पत्नी के समान
तथा चन्द्रहीन रात्रि के समान श्रीहीन होकर उजड़ा हुआ दीख रहा है । यह ढंग देखकर
वे मन-ही-मन व्याकुल होकर सोचने लगे कि आज सारा नगर शून्य-सा लग रहा है ।
नगर-निवासी मुझे देखकर आँखों से आँसू बहा रहे हैं । मुझसे कतराते हुए जा रहे हैं ।
क्या कारण है कि दुकानों में कोई भी चीज सजाकर नहीं रखी गई है ? यों सोचते
हुए अंतःपुर के फाटक पर वे रथ से उतर गये और आप और शत्रुघ्न शून्य-से दीखनेवाले
अंतःपुर में पहुँचे । उनको देखते ही कैकेयी बड़े प्रेम से उनके सामने आई और उन्हें
हृदय से लगा लिया । तब उन्होंने बड़ी भक्ति से उनको प्रणाम किया और अपने मामा
की दी हुई भेंट उन्हें देकर उनका कुशल-समाचार कह सुनाया । उसके उपरांत भरत ने
माता से पूछा—'हे माता, यह कैसा आश्चर्य है कि सारा अंतःपुर वैभवहीन होकर शून्य-सा
लग रहा है । राम-लक्ष्मण और महाराज सकुशल तो हैं ?' तब बहुत चिंतित होती हुई
कैकेयी ने भरत के संभ्रम को बढ़ाती हुई मंद हास के साथ कहा—'हे वत्स, किसी दिन
तुम्हारे पिताजी ने बड़े प्रेम से मुझे दो वर दिये थे । मैंने एक वर से भरत का राज-
तिलक और दूसरे वर से राम के वनवास की प्रार्थना की । पिता की आज्ञा के अनुसार
राम, जानकी-लक्ष्मण-समेत वन-वास के लिए चला गया । पुत्र के वियोग से महाराज
स्वर्ग सिधारे । ईर्ष्यावश मैंने तुम्हारे लिए यह व्यवस्था कर ली । अब राज्य सँभालो, प्रजा
का पालन करो, ऐश्वर्य प्राप्त करो और अपने बाहुबल से राज्य की रक्षा करो । इसके
विपरीत कुछ मत कहो ।'
इन बातों को सुनते ही भरत मूर्च्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़े । थोड़ी देर के
बाद सँभलकर उन्होंने अत्यंत क्रोध से कैकेयी को देखकर कहा—"हे माता ! मेरी माता