रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 136, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ें१०६ रंगनाथ रामायण
"इस प्रकार मैं अपना दुःख प्रकट कर रहा था कि मुनि-कुमार ने आँखें खोलीं ।
उसने अपनी ओर, फिर मेरी ओर देखा, और मेरे भय को देखकर कहा—'हे राजन् !
आप क्या करेंगे ? आप क्यों दुःखी होते हैं ? मुझे मारने की शक्ति आपमें कहाँ है ?
दैवयोग से ही मेरी ऐसी गति हुई है । इसके लिए आप क्यों शोक करते हैं ? आपने
तो हाथी समझकर बाण चलाया था । जान-बूझकर तो नहीं चलाया । ब्रह्म-हत्या का दोष
भी आपको नहीं लगेगा; क्योंकि मैं ब्राह्मण नहीं हूँ । मैं वैश्य-पिता और शूद्र-माता से उत्पन्न
हुआ हूँ । मेरी मृत्यु देखकर आप विचलित मत होइए । आप मेरे माता-पिता को मेरी
मृत्यु का संवाद न भी दें, तो भी वे योग-दृष्टि से सभी बातें जान लेंगे । तब यदि वे
क्रुद्ध होकर आपको शाप देंगे, तो उसमें रघुकुल का क्षय हो सकता है । हे राजेन्द्र, इस
पहाड़ के निकट पश्चिमी कोने में एक वटवृक्ष है । उसी वटवृक्ष के पास में एक काँवर में
बिठाकर बड़ी श्रद्धा से उनकी सेवा-शुश्रूषा में लगा रहता हूँ । आज रात भी मैं उन्हें
उस वृक्ष के कोटर में बिठाकर आया हूँ । आप शीघ्र इस कलश का जल लेकर वहाँ
जाइए और उन्हें सावधानी से नीचे उतारकर निर्भय होकर उन्हें सारा वृत्तांत सुनाइए ।
हे राजन् ! इस अस्त्र के साथ मेरी मृत्यु अनुचित है । इसलिए धीरे-धीरे यह बाण निकाल
दीजिए । शरीर की पीड़ा अब मुझसे सही नहीं जाती । मेरे प्राण अब नहीं रहेंगे ।'
"मुनि कुमार के इन वचनों को सुनकर मैं धीरे-धीरे उनके निकट पहुँचा । अत्यधिक
आत्म-ग्लानि से पीड़ित होते हुए मैंने उस शर को निकालने के लिए हाथ बढ़ाया, किन्तु
भय से मेरा हाथ रुक गया । फिर साहस बटोरकर काँपते तथा दुःखी होते हुए मैंने उस
शर को निकाल दिया । उसी क्षण मुनिकुमार की मृत्यु हो गई ।
"मन-ही-मन दुःखी होते हुए मैं जल-कलश लेकर मुनि के आश्रम में पहुँच गया और
वहाँ अपने सुत की प्रतीक्षा करते हुए पर-कटे पक्षियों की तरह पड़े हुए वृद्ध तथा अंधे
पुण्यात्माओं को देखा । निकट सुनाई पड़नेवाली आहट सुनकर मुनि कहने लगे—'हे पुत्र,
इस प्रकार कहीं विलम्ब किया जाता है ? मैं तुम्हारी माता के साथ यही सोच रहा था
कि इतना विलंब करने का क्या कारण है ? क्या तुम एक ही स्थान में इतने समय
तक ठहर सकते हो ? तुमने कहाँ इतनी देर लगाई ? तुम्ही तो हमारी आँखें हो ।
हम अत्यंत वृद्धों के लिए तुम्ही आधार हो । हम गतिहीनों के लिए तुम्ही सद्गति हो ।
भला, तुम बोलते क्यों नहीं ? मैंने तुम्हें कहा ही क्या है ? हे पुत्र, मैं तो केवल जल
माँग रहा हूँ ।'
"मुनि के ये वचन मेरे मन के भय और शोक को बढ़ाने लगे । मैंने शीघ्र वृक्ष पर
चढ़कर काँवर नीचे उतारा और अत्यंत दीन होकर थर-थर काँपते हुए, एक क्षण तक इस
दुविधा में पड़ा रहा कि सारा समाचार कहूँ या न कहूँ । फिर यह सोचकर कि किसी
भी तरह मुझे कहना ही पड़ेगा, मैंने गद्गद स्वर से कहा—'हे उत्तम तपस्वी, मैं राजा
दशरथ हूँ । मैं आपका पालक हूँ, पुत्र नहीं हूँ । मैंने आज एक ऐसा नीच कर्म किया है,
जिसे सुनकर नीच व्यक्ति भी मेरी निंदा करेंगे । किसी भी युग में किसी और ने जो पाप
नहीं किया होगा, वैसा पाप करके मैं आज आपके पास आया हूँ । मैं कैसे कहूँ ? विधि ने