रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 131, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ेंलक्ष्मण ने चौदह वर्ष तक अपने भाई की रक्षा में सलग्न रहने के उद्देश्य से दिन-
रात कभी नहीं सोने की प्रतिज्ञा की और धनुष-बाण धारण किये अपने भाई की शय्या से
थोड़ी दूर पर खड़े हो गये। उस रात को निद्रा देवी स्त्री का रूप धारण करके आईं
और लक्ष्मण से बोली—'हे मानधनी, में निद्रादेवी हूँ। विधि के निर्देश का पालन तो मुझे करना ही
होगा। आप मेरे लिए क्या व्यवस्था देते हैं, जिससे मैं आपको छोड़कर चली जाऊँ ?'
तब लक्ष्मण बोले—'तुम दिन-रात ऊर्मिला पर हावी होकर रहो। अवधि पूरा
करके मैं तुम्हें ग्रहण करूँगा।' उनका आदेश शिरोधार्य करके निद्रा चली गई और लक्ष्मण
भी निद्रा देवी की कृपा प्राप्त करके संतुष्ट हो गये।
इसके पश्चात् लक्ष्मण ने सुकुमार यौवन-शोभा-सपन्न तथा धीरचेता राम एवं
सीता के दुख का वृत्तांत गुह को कह सुनाया और कहा—'हंस-तूलिका-तल्प (हंसों के
पंखों से बनाई हुई कोमल गद्दी) पर शयन करनेवाले (भोगी) आज खुरदरे पत्थरों पर
बिछी पल्लव-शय्या पर पत्थरों के चुभते रहने से परेशान होते हुए किसी तरह गाढ निद्रा
में खर्राटे भर रहे हैं।' इसके पश्चात् उन्होंने गुह को माता कौसल्या और सुमित्रा के
शोक का वृत्तांत सुनाया और दोनों अत्यंत शोकमग्न हो गये।
इतने में अरुणोदय हुआ। राघव ने निष्ठा से प्रातःकाल के सब विधि-विधान
पूरा किये। उसके पश्चात् उन्होंने गुह के द्वारा वट का दूध मँगाया, लक्ष्मण तथा अपने
कोमल तथा दीर्घ केश खोलकर उन्हें उस दूध से जहाँ-तहाँ भिगोकर उनकी जटाएँ बनाईं।
वैदेही विवश तथा क्षुब्ध हो देखती रही। फिर अनुज के साथ राम ने बड़ी निष्ठा से वैखानस-
वृत्ति (वानप्रस्थ की एक शाखा) ग्रहण की।
तत्पश्चात् राम ने सुमंत्र को पास बुलाकर कहा—'हे सुमंत्र अब हमें रथ पर चढ़ना
नहीं चाहिए। अतः, तुम रथ को लेकर अयोध्या को लौट जाओ और राजा की सेवा में
प्रवृत्त हो जाओ। महाराज को तथा माताओं को हमारे प्रणाम कहना। तब सौमित्र ने
क्रोध से कहा—'अब भी ऐसी बातें क्यों ? (शान्तिपूर्ण वचन क्यों ?) उनमें मेरी ओर
से कहना कि अपनी स्त्री की प्रेरणा से उन्होंने नीति-भ्रष्ट होकर, किसी बात का विचार
किये बिना ही हमारी ऐसी दशा कर दी। अब वे अपनी स्त्री तथा प्रिय पुत्र के साथ
राज-भोग का अनुभव करें। अब तुम जा सकते हो।' लक्ष्मण की बातों से अप्रसन्न होकर
राम ने कहा—'सौमित्र, तुम अपनी बातें बन्द करो।' और, सुमंत्र को संबोधित करके
कहा—'तुम ये बातें राजा से मत कहना। यदि वे ये बातें सुनेंगे, तो और अधिक दुख से
पीड़ित होंगे।' तब सुमंत्र ने अत्यधिक शोक-संतप्त तथा अत्यंत भीत होकर कहा—
'हे देव, आपको वन में छोड़कर मैं दीन की तरह अयोध्या कैसे जाऊँ ? मैं प्रजा से यह
समाचार कैसे कहूँ ? मैं यह रिक्त रथ किस मुँह से ले जाऊँ ? कौसल्या को मैं कैसे
सांत्वना दूँ ? कैकेयी का मुँह मैं कैसे देखूं ? नहीं, यह मुझसे नहीं हो सकता। मैं भी
आपके साथ चलूँगा।'
तब राम हँसकर बोले—'हमने गंगा पार करके वन में प्रवेश किया है, यह समाचार
तुम जब जाकर कैकेयी से कहोगे, तभी वे उसे सत्य मानेंगी। इसलिए तुम शोक न