रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
१५६ रंगनाथ रामायण
उस लोकवंद्य का उचित आदर-सत्कार किया। वसिष्ठ ने पुण्याह-वाचन कराया और पुष्य-
संकल्प-पूर्वक उपवास व्रत का प्रारंभ कराया। दक्षिणा के रूप में राम से दस हजार गायें
लेकर वसिष्ठ ने सारा समाचार राजा को कह सुनाया और घर चले गये।
राम ने बड़े प्रसन्नचित्त से सीता के साथ स्नान आदि से निवृत्त होकर विष्णु की
प्रीति के लिए हवन किया, हवन-शेष को ग्रहण किया और वसिष्ठ के आदेश के अनुसार
विष्णुगृह में कुशासन पर एकनिष्ठ हो विष्णु का ध्यान करते हुए उपवास करते रहे।
अयोध्या में लोग बड़े हर्ष से आनंदोत्सव की तैयारी में लग गये। कोई मोतियों
से चौक पूर रहा था, तो कोई अपने घरों का अलकार कर रहा था। कोई मणिमय तोरण
सजा रहा था, तो कोई फूलों से वितान बना रहा था। कुछ लोग झंडे लगा रहे थे।
कुछ जहाँ-तहाँ फूल-मालाएँ लटका रहे थे। कुछ एक दूसरे के अलकरण में मग्न थे। कही
लोग दशरथ की प्रशंसा कर रहे थे, तो कही इष्ट देवताओ की पूजा कर रहे थे। कुछ
दान-पुण्य कर रहे थे और पुण्य कथा-गोष्ठियो में भाग ले रहे थे। जहाँ-तहाँ लोगो की
भीड़ एकत्रित होकर राम के गुणों का गान कर रही थी। लोग उनकी सेवा करने के
लिए आतुरता प्रकट करते थे और भगवान् से राम को ही राजा बनाने की प्रार्थना कर
रहे थे।
२ 'मंथरा की कुमंत्रणा
उसी समय कैकेयी की दासी मथरा ने रनवास की छत पर से नगर का यह
आनंदोत्सव देखा। वह सोचने लगी—'क्या कारण है कि आज नगर अद्भुत साज-सज्जा से
परिपूर्ण है। सभी नगरवासी सजे-धजे तथा प्रफुल्ल दिखाई पड़ रहे हैं। कौसल्या के
अंत पुर की सभी स्त्रियाँ सुसज्जित होकर आनंद-मग्न हो रही हैं। जाने किस कारण से
आज कौसल्या अगणित धन व्यय कर रही है।' उसने आनंद में मग्न राम की धाय से
पूछकर यह जान लिया कि राम के राज-तिलक के लिए ही सारे नगर में उत्सव मनाया
जा रहा है। तब उसने निश्चय किया कि बाल्यावस्था में रामने जो मेरी टाँग तोड़ दी थी,
उसका बदला लेने का यही अच्छा अवसर है। इस प्रकार सोचकर वह रानी कैकेयी
को सारा वृत्तांत सुनाने के लिए उनके महल में गई। उस समय पद्मलोचना कैकेयी
अपने क्रीड़ा-घर में हिंडोले पर लेटी थी। मथरा ने उससे कहा—'उठिए महारानी, आपको
किसी बात की चिंता ही नहीं है।' यो कहते हुए उसने कैकेयी का हाथ पकड़कर उसे
उठाकर बैठाया और त्रिया-चरित्र रचती हुई बोली—'आप तो यह कहते हुए फूली न
समाती थी कि राजा मुझसे ही अधिक प्रेम रखते हैं। वह झूठा सिद्ध हो गया है।
महाराजा ने अपनी बड़ी रानी के भय से आपको भ्रम में डालकर, भरत को परदेश भेज
दिया है और रघुराम का राज-तिलक करने की बात सोच रहे हैं। यदि यही बात हुई, तो
आपका जीवन निरर्थक है। राजाओ का विश्वास कभी नहीं करना चाहिए। आप फूली-
फूली क्यो फिरती हैं? ऐसा क्रूर, वंचक और कपटी पुरुष मैने कही देखा नहीं है। वे
कैसे आपके पति हैं? वे तो आपके क्रूर शत्रु हैं। यदि आप अपनी सौत के पुत्र को
समस्त पृथ्वी का राजा बनने देंगी, तो आपको, आपके पुत्र को तथा मुझे, दुःख के सिवा
सुख नही मिलेगा । आपकी भलाई का विचार करके आपके पिता ने मुझे भेजा, तो स्नेह
के कारण मैं यहाँ आई हूँ । आपकी भलाई मेरी भलाई है, आपका अभाव मेरा अभाव है ।
मैने आपकी भलाई की बात आपसे कह दी । आप ऐसा कोई यत्न कीजिए जिससे कि
आपका पुत्र इस ससार में जीवित रहे ।'
कैकेयी ने ये बातें सुनी तो अत्यन्त हर्ष से उसकी प्रशसा करते हुए उसे गले से
लगा लिया और कहा--'हे सखी ! राम के राज-तिलक का शुभ समाचार देकर तुमने मेरे
कर्णपुटों में सुधावृष्टि-सी कर दी । तुम्हारे साथ मेरी मित्रता आज सफल हुई । अब तुम
अपने वक्र वचनों को छोड़ दो । भरत की अपेक्षा उसका अग्रज मेरे प्रति विशेष श्रद्धा
रखता है । तुमने यह शुभ-समाचार मुझे देकर बहुत अच्छा किया ।' इस प्रकार कहकर
उसने मथरा को नवरत्न-खचित अपने सोने का कडा उपहार के रूप में दिया । किन्तु, उस
कपट स्त्री ने उस कडे को दूर फेंककर अपने पापपूर्ण हृदय का क्रोध एव जलन प्रकट
करते हुए कहा--'हे कैकेयी । आप मन-ही-मन फूली हुई है, मानो कोई उत्तम कार्य
हो रहा है । आपने यह उपहार मुझे किसलिए दिया ? आपकी भलाई के लिए जो परामर्श
मैने दिया, उसके विषय में विचार किये बिना ही आप ऐसा प्रलाप क्यो करती है ? मै आपके
स्वभाव के बारे में क्या कहूँ ? क्या अपना अहित करनेवाला धर्म, कोई धर्म है ?
आँखो को हानि पहुँचानेवाला काजल किस काम का ? कही इस ससार में ऐसे भी लोग है,
जो सौत के पुत्रो के हित की कामना करते हैं ? यदि आपकी सौत का पुत्र साम्राज्य
का स्वामी हुआ, तो सभी राजा, नानेदार, प्रजा तथा मत्री राम की सेवा में लगे रहेंगे ।
गज, तुरग आदि सेना उनके वश में हो जायगी । उसके पश्चात् दशरथ भी स्वतन्त्र नही
रह सकेंगे । तब शशिमुखी कौसल्या समस्त ऐश्वर्य का उपभोग करेगी और आप उनकी सौत
होती हुई एक पगली की तरह कैसे रह पायेंगी । इतना ही नही, आपको उनकी आज्ञा
का पालन करते हुए उनकी दासी बनकर रहना पड़ेगा । भरत को उस रघुपति से भय
खाते हुए एक भृत्य के समान रहना पड़ेगा । आपकी पुत्रवधू को राज-रानी सीता की
सेवा करनी पड़ेगी । यदि यही हुआ, तो आपका जन्म निरर्थक हुआ । इसका उपाय यह है
कि राम को वनवास के लिए भिजवा दीजिए और भरत का राज-तिलक करवाइए ।'
तब कैकेयी बोली--'हाय, महाराज मुझे इतनी स्वतन्त्रता क्यो देने लगे ? मैं उनसे
ऐसी प्रार्थना कैसे करूँ ? करूँ भी तो वे मेरी प्रार्थना क्यो मानेंगे ? यह कैसी बात है ?
तुम जो भी कहो, यह काम नही होने का । मैं राम से कैसे कहूँ कि तुम वन में जाकर
निवास करो ।'
तब मथरा अपनी पाप-बुद्धि को प्रकट करती हुई बोली--'हे सुन्दरी, क्या आप
इस बात को भूल गई कि शवरासुर और इंद्र के युद्ध में इंद्र की सहायता करने के लिए
अपनी सेनाओ के साथ जाते समय राजा आपको भी अपने साथ ले गये थे । महाराजा
दशरथ ने रात्रि के समय उस राक्षस का सामना किया था । राक्षस ने क्रोध में आकर
विभिन्न प्रकार की मायाओ से राजा का वध करने का प्रयत्न किया था, किन्तु आपने
धवलाग नामक मुनि की कृपा से प्राप्त शक्ति की सहायता से उस राक्षस की मायाओ को
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दूर कर दिया था और राजा को उस राक्षस के तेज बाणो से आहत होने से बचाया था ।
राजा ने सतुष्ट होकर आपको दो वर दिये थे । आपने ही खुद यह सारा वृत्तात मुझे
सुनाया था । भले ही आप इसे भूल जायें, मैं कैसे भूल सकती हूँ ? अत आप राजा से
दो वर माँगिए—एक तो यह कि कौसल्या का पुत्र राज-पाट छोडकर चौदह वर्ष तक मुनियो
का-सा जीवन व्यतीत करते हुए भयकर वनो में रहे, और दूसरा, आपका पुत्र इस पृथ्त्री
पर शासन करे । आपके वर माँगने पर राजा बहुत गिडगिडायेंगे । फिर भी, आप मूर्ख
के समान मत रहें । सत्य की दुहाई देकर दृढ सकल्प से आप इस कार्य को सिद्ध
कर लीजिए । आपके पति असत्य से डरते हैं, उसपर भी आपसे उनका अत्यधिक प्रेम हैं।
इसलिए वे आपके वचनो का अतिक्रमण नही करेंगे । अवश्य आपकी बात मान लेंगे ।”
इन बातो से प्रसन्न होकर कैकेयी ने मथरा से कहा-'तुम्हारी जैसी सखी, साथिन
और गुणवती को मैंने कही नही देखा है । हे उत्तम नारी, जिन वरो के सबध में मैंने
तुमसे कहा था, उन्हें तो मै भूल ही गई थी । तुमने जैसे सोचा, वैसे मेरा पुत्र यदि इस
समस्त पृथ्दी का राजा बनेगा, तो मै तुम्हारे कूबड़ को शुद्ध स्वर्ण से अच्छी तरह सजाऊँगी,
तुम्हारे मुख-चन्द्र पर कस्तूरी-तिलक करूँगी और तुम्हारे शरीर पर असख्य आभूषण पहनाकर
तुम्हें अलकृत करूँगी । हे सखी ! इस प्रकार सज-धजकर तुम मन्मथ की स्त्री के समान
विचरोगी, तो सभी दासियाँ तुम्हारी आज्ञा का पालन करती रहेंगी । मैं ऐसी व्यवस्था
कर दूंगी ।'
इस प्रकार, मथरा से प्रिय वचन कहने के पश्चात् कैकेयी अपने कक्ष में चली गई ।
उसने अपने समस्त आभूषण उतार दिये, माथे पर कस्तूरी का गाढा लेप लगाया, मलिन
वस्त्र पहने और अत्यन्त क्रोध धारण किये फर्श पर पड़ी रही । अपनी मत्रणा की सफलता
से सतुष्ट होनेवाली मथरा को देखकर कैकेयी बोली—'जबतक राजा राम को बुलाकर
उसे वन में जाने की आज्ञा देकर नही भेजेंगे और भरत का राज-तिलक नही
करेंगे, तबतक मैं अन्न-जल नही ग्रहण करूँगी । जितने भी स्वर्णाभूषण दें, मै उन्हें नही
लूंगी और यहाँ से हटूंगी भी नही ।' यो कहते हुए वह मन-ही-मन बहुत क्रुद्ध होकर
पडी रही ।
३ कैकेयी के महल में दशरथ का आगमन
राघव के राज-तिलक का समाचार कैकेयी को सुनाने के उद्देश्य से दशरथ उस दिन
रात को वहाँ (कैकेयी के महल में) आये । स्वर्ण-रत्नजटित किवाड़ो तथा कक्षो, कस्तूरी,
चदन, कर्पूर की सुगधि से युक्त तथा नाना रत्नो की कान्ति से सुशोभित सौधो को पार
करके वे रग-महल के निकट पहुँचे । कैकेयी को वहाँ न देखकर दशरथ ने सेवक से पूछा ।
उसने दुःख प्रकट करते हुए हाथ जोडकर कहा—'देव ! देवी न जाने किस कारण से
कोप-भवन में चली गई हैं ।'
ये बातें दशरथ के कानो को धनुष की उग्र टकार की भाति भयकर लगी । उनका
मुँह पीला पड़ गया । कैकेयी के प्रति उनका प्रेम द्विगुण हो उठा । धीरे-धीरे उन्होने
कोप-भवन में प्रवेश किया और स्वर्ग-लोक से पृथ्वी पर उतरकर वहाँ लेटी हुई अप्सरा
अयोध्याकाण्ड ७६
की भाँति, केशो को फैलाये फर्श पर पडी हुई कमलमुखी कैकेयी को देखकर राजा सन्न
रह गये । उन्हें बडी वेदना का अनुभव हुआ । बडे दीन भाव से वे उसके निकट पहुँचे,
उसके शरीर का स्पर्श करके देखा और काम-पीडित होकर उससे प्रार्थना करने लगे—
“हे कमलाक्षी, हे चन्द्रवदनी, हे भ्रमरो के-से केशवाली, इतना कोप क्यो ? अत्यत मृदु
पर्यंक पर लेटनेवाली, तुम्हें लेटने के लिए यह कडी भूमि क्यो ? कोमल दुकूलो के रहते,
तुमने ऐसे मैले वस्त्र क्यो पहने हैं ? कनकशलाका-सी अपनी देह पर तुमने आभूषण धारण
क्यो नही किये ? उदधि-सुत चन्द्रमा की चाँदनी के समान उज्ज्वल तुम्हारे ललाट पर यह
लेप क्यो ? तुम्हारे मन में ऐसा विचार क्यो उत्पन्न हुआ ? प्रतिदिन की भाँति तुम अपने घने
तथा नीले केशो में माँग काढकर उन्हें सजाती क्यो नही ? पद्मराग मणि की लालिमा
को परास्त करनेवाले अपने अरुणाधरो को तांबूल-चवण स अलकृत क्यो नही करती ?
तुम्हारे मुख-चन्द्र में स्वर्ण-पुष्पो के समान प्रफुल्लित होनेवाली मुस्कान क्यो नही दीखती ?
हे प्रिये, किसलिए तुम मन छोटा किये हुए हो ? इतनी सतप्त क्यो हो ? क्रिसने तुम्हें
कटुवचन कहे ? किसने तुम्हारी बातो का विरोध किया ? हे कमलनयनी । उनके नाम
बताओ । चाहे वे कोई भा हो, में उन्हें दण्ड दूंगा ।” इस प्रकार कहते हुए आँखो में
उमडनेवाले आँसुओ को पोछते हुए वे बोले—“हे सुन्दरी, एक अनाथ की तरह तुम इस
प्रकार भूमि पर क्यो लोट रही हो ? बताओ कि यह काम-पीडा है अथवा किसी भयकर
रोग का प्रकोप है ? क्यो सकोच कर रही हो। कहो तो वैद्य आकर तुरत तुम्हें स्वस्थ करेंगे ।
हे ललितागी ! तुम्हारी कोई इच्छा हो तो कहो, मैं उसे पूरा करूँगा । तुम्हारे
लिए मै अवध्य पुण्यात्माओ का भी वध करूँगा । वध्य दुर्जनो को दण्ड देकर तुम्हारी
बात रखूँगा । यदि तुम चाहो, तो रक को राजा बनाऊँगा । तुम्हारे क्रोध का पात्र धनी को भी
दरिद्र बनाऊँगा । जब मैं और मेरे परिवार के अन्य लोग तुम्हारी इच्छा के अनुसार चलने
के लिए तैयार है, तब इस प्रकार क्यो रहती हो ? हे सुन्दरी ! मेरी बात सुनो, किंचित्
मुँह उठाकर मेरी ओर देखो, ताकि मुझे शांति मिल जाय । तुम चाहो तो मे अपने प्राण
भी देने को प्रस्तुत हूँ ।”
दशरथ की ये बातें सुनकर कैकेयी प्रसन्न हुई । वह अपने पति का प्रेम जानती
ही थी इसलिए उसने क्षीण स्वर में राजा से कहा—‘हे देव ! यदि मुझे यह वचन दें
कि आप मेरे कथन के अनुसार कार्य करेंगे, तो मैं अपने मन की इच्छा कहूँगी ।’
राजा ने कहा—‘जो धनुर्विद्या में असमान है, जो धर्म का पालन करता है, जिसे
बिना देखे मैं एक क्षण भी जी नही सकता और जिसको मैं निरंतर भक्ति से भजता
रहता हूँ, उस राघव की सौगंध खाकर कहता हूँ कि मै तुम्हारी इच्छा पूरी करूँगा ।’
कैकेयी ने पवन, अग्नि, शशि तथा नभ को साक्षी के रूप में मानते हुए दशरथ
के मन की आतुरता का ज्ञान रखते हुए निष्ठुर होकर कहा—‘हे राजन् ! आपने देवासुर-
युद्ध में मुझे दो वर दिये थे । कदाचित् आप उन्हें भूल गये हैं । मैं अब उन दोनो वरो
को माँगना चाहती हूँ ।’
६० रंगनाथ रामायण
४. दशरथ से कैकेयी का वर माँगना
'आप रविकुल में उत्पन्न महाराज हैं । उस कुल के प्रथम राजाओ की अपेक्षा आप
अधिक पुण्यात्मा है। आप असत्य नही कहेंगे और अपना वचन भी नही छोड़ेंगे । अत,
मुझे वे दोनो वर दीजिए । पहले वर से आप भरत का राज-तिलक कर दीजिए, और
दूसरे वर से आप राम को चौदह वर्ष तक तपस्वी के रूप में वन में निवास करने के लिए
भेज दीजिए ।'
इन वचनो को सुनते ही राजा स्तम्भित रह गये । दुख से वे तुरत मूर्च्छित
हो गये । बहुत समय के वाद उनकी चेतना लौटी तो वे बोले- "हे कोमलांगी, कैकय-वश
में जन्म लेकर इस प्रकार के वचन तुम्हारे मुंह से कैसे निकले ? राम ने तुम्हें क्या हानि
पहुँचाई है कि तुम राम को अरण्य-वास देना चाहती हो ? वह कौसल्या की अपेक्षा तुम्हें
अधिक मानता है, तुम्हारी सेवा करता है और तुम्हारा आदेश मानता है । ऐसे सद्गुण-
सपन्न राम को निष्ठुर होकर वन जाने का आदेश कैसे देती हो ? तुम्ही कहो, मै उसे वन
जाने का आदेश कैसे दे सकता हूँ ? ऐसे महापुरुष राम को जगल भेजने के वाद मेरे प्राण कैसे
टिके रहेंगे ? तुम राजपुत्री हो, ऐसा समझकर मैने तुम्हारा पाणिग्रहण किया था । किंतु
तुम काली नागिन सिद्ध हो रही हो । तुम चाहो, तो मैं अपना सारा राज्य और अपने
प्राण दे दूंगा, किंतु राम को वन जाने का आदेश न दे सकूंगा । इस वृद्ध, दीन, अनाथ
तथा दुर्बल को दुःख से बचाओ । मै तुम्हारे चरणो को प्रणाम करता हूँ। मैं राम के वियोग
में जीवित नही रहूँगा । इसलिए इस पाप-कल्पना को छोड़ दो ।"
तब कैकेयी क्रोध में आकर कहने लगी - "हे राजन् ! आप सत्यनिष्ठ, पराक्रमी
और ओजस्वी है । ऐसे आपको असत्य कहना क्या शोभा देता है ? आपने इतने सारे
देवताओ के समक्ष सौगध खाई है । आप कैसे राजा है ? एक कबूतर के लिए शिवि ने
अपने शरीर का सारा मास काटकर वाज को दे दिया था । क्या आप इसे नही जानते ?
क्या अलर्क नामक राजा ने वडे प्रेम से क्षोणिदेव को अपने नेत्र नही दिये थे ? क्या
उत्तुग लहरो से युक्त समुद्र, वेला की मर्यादा के भीतर आवद्ध नही हुआ ? उनको छोड़
दीजिए । आपके पूर्वज कौतुक के लिए भी, स्वप्न में भी, कभी झूठ नही बोले । आप
इक्ष्वाकु-वश के होते हुए भी कौसल्या के भय से असत्य-भाषण करते है । असत्यभाषी
कही पुरुष कहलाने योग्य है ? आपने असत्य कहा । अब आप मुझे पा नही सकते । मै
अब स्वतंत्र होकर विष-पान करूँगी और मर जाऊँगी । उसके पश्चात् आप भरत का वध
करा दीजिए और राम का तिलक करके कौसल्या के साथ सुख से रहिए ।"
इस प्रकार के कैकेयी के कटुवचनो से राजा अत्यत सतप्त हो गये । उनके मुख
की काति जाती रही, उनका विवेक जाता रहा । वे कैकेयी से बोले- "हे कैकेयी ! तुम्हारे
मन में ऐसी पाप-कल्पना और ऐसी मन्द बुद्धि कैसे उत्पन्न हुई । ज्येष्ठ के रहते हुए कही
कनिष्ठ अविनीत होकर पृथ्वी का पालन करेगा ? इतना क्यो, तुम्हारा धर्म-निरत भरत
तुम्हारे इस पाप-पूर्ण वचन को कैसे स्वीकार करेगा ? हमारे कुल की रीति का विचार करो ।
शोक-पीड़ित मुझे निष्ठुर होकर मत मारो । सतत गृहिणी-धर्म का पालन करते हुए,
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भक्ति और हित का विचार करते हुए सखी की तरह, माता के समान, दासी की
भाँति, बहन की-सी, भिन्न-भिन्न प्रकार से मेरी सेवा करनेवाली कौसल्या अपने पुत्र के
वियोग में कसे जीवित रह सकेंगी ? सौदामिनी तथा लता-सदृश शरीरवाली वैदेही किस
प्रकार यह दुख सह सकेगी ? सौमित्र तथा उसकी माँ इस दुःखद समाचार को कैसे सहन
कर सकेंगे ? राम के राज-तिलक की अपेक्षा करनेवाले नागरिक जब उत्सव मनाने में
संलग्न हैं, तब यदि मैं राम को वन भेज दूँ, तो क्या वे नागरिक मुझे अपशब्द नहीं कहेंगे ?
अपनी इस प्रार्थना से समस्त लोगो का अहित करते हुए तुम कौन-सा सुख भोगोगी ?
एक बात और है । हे रमणी ! तुम उसे अवश्य सुनो । कमल के-से नेत्रवाले, मधुर
मुस्कान से युक्त मुखवाले, बलिष्ठ, आजानुबाहु, चंद्र-सम सौंदर्यवाले, नीलोत्पल की-
सी शरीर-कान्तिवाले, शीतल दृष्टियो को विकीर्ण करनेवाले, सुधा-सम वचन बोलनेवाले,
सदा बुधजनो का हित ही सोचनेवाले, सतत मेरी सेवा में संलग्न रहनेवाले, धर्म-रूपी,
भार्गव राम को जीतनेवाले, सद्गुण-संपन्न, सौंदर्यवान्, शांतधाम, रवि-सम उज्ज्वल, राम को
छोड़कर मैं एक क्षण भी जीवित नहीं रह सकूँगा । हे कमलाक्षी ! ऐसे राम को क्या तुम
नहीं जानती ? उस उत्तम पुरुष को वन भेजते ही मेरे प्राण निकल जायेंगे । तुम कितनी
पापिन हो ? कितनी कठोर हो ? कितनी मूर्खा हो ? कितनी भयंकर राक्षसी हो ? हे
क्रूर नारी ! तुम्हारे मन में इतना कल्मष क्यों है ? साध्वी होते हुए मूर्खा की तरह क्यों
ऐसी इच्छा करती हो ? तुम प्राणापहरण करनेवाली काल-रात्रि हो, स्त्री नहीं ।
राम कैसे पैदल वन में जायगा ? सबसे विलग होकर वन में कैसे रहेगा ? सुकोमल
शय्या पर शयन करनेवाला पुरुष तृण-शय्या पर किस प्रकार सो सकेगा ? बंधुओ के साथ
पंक्ति में बैठकर अपना इच्छित भोजन करनेवाला राम, कंद-मूल का आहार कैसे पसंद
करेगा ? हे रमणी ! तुम अपने परम भक्त राम का बुरा मत सोचो । उसे क्षमा करो ।”
इस प्रकार प्रार्थना करते हुए दशरथ बडे दुख के साथ उसके पैरो पर गिर पड़े ।
लेकिन उसने अपने पैर हटाते हुए उनकी प्रार्थना स्वीकार नहीं की । तब राजा भूमि पर
गिर पड़े और लोटने लगे । किन्तु कैकेयी ने उसकी भी परवाह किये बिना ही राजा
दशरथ को देखकर कहा—'हे राजन् ! अब इन कपट-वचनों को बंद कीजिए । अब व्यर्थ
के छल-कपट से कोई लाभ नहीं होगा । धर्म को त्यागिए, सत्य को छोड़ दीजिए और
अपने निर्मल यश को मिट्टी में मिलाकर असत्य वचन कहिए कि मैंने तुम्हें वर नहीं दिये ।
उसके बाद आप अपने पुत्र तथा पत्नियों के साथ सुख से रहिए । मैं अपने पुत्र भरत
के साथ प्राण तजूँगी ।'
तब राजा बिना प्रत्युत्तर दिये, मन-ही-मन दुःखी होते हुए, सिर झुकाये बैठे रहे ।
इतने में प्रभात हो गया । मंगल-वाद्य बजने लगे । वन्दी-जन के स्तुति-पाठ होने लगे ।
राम-सीता ने कर्पूर-चन्दन की सुगन्धि से सुवासित जल में स्नान किया, दिव्य वस्त्राभरण
पहने और शची-समेत इन्द्र के समान पूर्ण तेजस्वी दिखाई देने लगे । अभिषेक-मण्डप में
वसिष्ठ आदि मुनि अरुंधती आदि सुमंगलियां, धीमान् मंत्री तथा अन्यान्य चक्रवर्त्ती राजा
विराजमान थे । वसिष्ठ ने पंचपल्लव, पंचवल्कल, पंचामृत, भद्रगज ( राजा का हाथी ),
११
८२ रंगनाथ रामायण
आठ कन्याएँ, हेम ऋक्ष, औदुम्बर (गूलर) की पीठिका, गङ्गादि तीर्थों का जल तथा अन्य मंगल-
वस्तुओ को मँगाया, श्रेष्ठ रत्नाभूषणो को वेद-विधि से दान कराया, एक लाख कन्याएँ,
एक लाख गायें, एक लाख ऊँट मँगाये, जप आदि कराया, गाति-पाठ कराया, हवन आदि
सम्पन्न किया और शुभ मुहूर्त को आसन्न देखकर राजा को लिवा लाने के लिए सुमंत्र को
भेजा ।
सुमंत्र कैकेयी के अंतःपुर में गया और शयन-कक्ष के किवाड़ के पास खड़े होकर
निवेदन किया —'हे देव ! सूर्योदय हो रहा है । श्रीराम के राज-तिलक का मुहूर्त निकट
आ रहा है । अतः आप शीघ्र पधारें । हे राजन् ! अभिषेक-मण्डप में मुनि, राजा तथा
अन्य महात्मा उपस्थित हैं । पुरजन विबुध तथा नातेदार आपके आगमन की प्रतीक्षा कर
रहे हैं ।'
इन बातो को सुनकर राजा सोचने लगे—'अब तुम भी मुझे दुःख पहुँचाने के लिए
आये हो, मानो अब तक मुझे कोई दुख ही नही है ।' यो सोचकर वे चुपचाप लेटे रहे ।
तब कैकेयी ने सुमंत्र से कहा—'तुम शीघ्र जाकर राम को यहाँ ले आओ । यह राजा
का आदेश है ।' तुरत सुमंत्र वहाँ से चला गया ।
सुमंत्र कैकेयी के अंतःपुर से उस राज-मार्ग से जाने लगा, जो शीतल चंदन-जल से
सिंचित आँगन, ध्वजाओ से अलंकृत गृहो, चंदन, अगरु तथा धूप से सुगंधित वायु, मंद पवन
से डोलनेवाली पुष्प-मालाओ, प्रत्येक गृहद्वार पर स्थापित कदली-वृक्षो, अतुलित मणि-तोरणो
और उत्साह-पूर्ण पुरजनो से भरा हुआ, दुर्गम दीख रहा था । उस मार्ग से होकर वह
रामचन्द्र के उस अंतःपुर के पास जा पहुँचा, जो इन्द्र-भवन का भी परिहास करता हुआ
कुवेर के महल के समान अतुल वैभव-लक्ष्मी से समन्वित था । वहाँ पहुँचकर उसने राम
को अपने आने का समाचार कहला भेजा और उनकी अनुमति पाकर भीतर गया । वहाँ
उसने तारा से सुशोभित शशि के समान दीखनेवाले, सीता से युक्त रामचंद्र को देखकर
उन्हें प्रणाम किया और कहा—'हे देव ! महाराज दशरथ देवी कैकेयी के गृह में आपको
लिवा लाने के लिए मुझे भेजा है ।'
राम मुस्कुराते हुए जानकी को वही छोड़कर लक्ष्मण के साथ रथ पर आरूढ़ होकर
कैकेयी के महल की ओर रवाना हुए । उनके पीछे चतुरगिणी सेना चली । अतुल वाद्य
बजने लगे, वन्दीजन स्तुति-पाठ करने लगे और सुमङ्गलियाँ पुष्प-वर्षा करने लगीं । नगर-
निवासी जयजयकार करने लगे । इस प्रकार, वे बड़े वेग से राजा के अंत पुर के पास जा
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अयोध्याकांड ५३
मेरी ओर देखते भी नही हैं। मेरा क्या अपराध हैं ? यह खिन्नता, यह चिंता और दुख
राजा को किस कारण से हो रहे हैं ?' तब कैकेयी ने कहा—'हे राम, यदि तुम मानोगे,
तो मैं राजा की इच्छा तुम्हें बतलाऊँ ।' रघुराम ने कहा—'हे माता, आप कृपया विस्तार
से सुनाइए कि वह कौन-सी बात है ? मैं पिता के आदेश से भयंकर अग्नि-ज्वालाओ में
या विष के समुद्र में कूद सकता हूँ या विष भी खा सकता हूँ । इसको सत्य मानें और
बिना संकोच के कहें ।'
तब कैकेयी राम को देखकर किंचित् भी ममता-मोह के बिना बोली—'देवासुर-
संग्राम में राजा ने दया करके मुझे दो वर दिये थे । अब मैंने उन दोनों वरों को देने की
प्रार्थना की । एक वर से मैंने अपने पुत्र भरत के लिए राज्य माँगा और दूसरे से तुम्हें
चौदह वर्ष तक वन-वास देने की प्रार्थना की । राजा ने वर देना तो स्वीकार किया,
किन्तु तुम्हें अपना आदेश सुनाने में हिचकते हैं । यदि तुम चाहते हो कि तुम्हारे पिता को
असत्य-भाषण का दोष न लगे, तो तुम तुरत राजकुमार का वेष त्याग दो और वल्कल
तथा जटाएँ धारण करके तपस्वी के रूप में वनवास के लिए चले जाओ ।'
इन बातों को सुनकर राम के मुखपर मंद हँसी लास्य करने लगी । उनके वचनों
म किसी भी प्रकार का मालिन्य नहीं आया । दया, त्याग और गरिमा दिखाते हुए परम
पुण्यात्मा रामचंद्र बोले—'हे माता, इस प्रकार की आज्ञा देनेवाले सूर्यवंश के तिलक मेरे
पिता हैं और राज्य का अधिकारी होगा मेरा भाई । फिर, आपकी इच्छा में बाधा क्यों पड़े ?
हाय ! आप कितनी भोली हैं ! इस छोटी-सी बात के लिए सूर्यवंशी राजा को मन
में चिंतित होने की क्या आवश्यकता है ? अपने पिता की आज्ञा का पालन नहीं करने-
वाला कहीं पुत्र कहलाने योग्य है ? वह तो एक जाति-विरोधी है । मेरे और मेरे भाई
में कोई भेद नहीं है । इस पृथ्वी का भार वहन करने के लिए जिस पुण्यात्मा को आपने
नियत किया है, उस भरत के लिए मैं अपने प्राण भी देने के लिए प्रस्तुत हूँ, इस राज्य
की क्या गिनती !'
राम की बातों से अत्यंत हर्षित होकर कैकेयी बोली—'हे राजकुमार, तब मैं भरत
को बुला भेजूँगी । तुम तुरंत वन के लिए रवाना हो जाओ । यहाँ से तुम्हारे जाने तक
महाराज न भोजन करेंगे, न बोलेंगे, न उठेंगे ही । वे इसी प्रकार पड़े रहेंगे ।'
कैकेयी के इस प्रकार कहते ही राजा ने कहा—'हाय, ऐसी कटूक्तियाँ भी क्या
उचित हैं ? और वे तुरंत मूर्च्छित हो गये । तब राम ने तुरंत उन्हें पकड़ लिया और
शैत्योपचारों के उपरान्त, जब उनकी चेतना लौटी, तब उन्हें अच्छी तरह समझाते हुए
कैकेयी की ओर देखकर अत्यंत हर्ष से बोले—'आपको इतनी चिंता क्यों हो रही हैं ?
मेरे लिए यह कौन बड़ा काम है ? आप मन में किसी प्रकार का संदेह मत कीजिए ।
मैं तो विवेक के साथ धर्म का पालन करूँगा, कभी धर्म का उल्लंघन नहीं करूँगा । राजा
की आज्ञा यदि मुझे नहीं मिलेगी, तो मैं आपकी आज्ञा का पालन करूँगा । यह सच
मानिए । शीघ्रगामी अश्वारोही दूतों को भेजकर इसी शुभ मुहूर्त में भरत को बुलवाकर
उसका राज-तिलक कर दीजिए । मैं अभी वन के लिए प्रस्थान करता हूँ ।'
इस प्रकार कहने के उपरान्त प्रफुल्ल-मुखचन्द्र से राम ने कैकेयी की परिक्रमा की
और कहा—'मै अपनी माता, माता सुमित्रा तथा जानकी को यह समाचार सुनाऊँगा और
उन्हें सान्त्वना देकर अवश्य वन में चला जाऊँगा । आप मन में संदेह न कीजिए ।' यो
कहकर उन्होने राजा तथा कैकेयी को प्रणाम किया और लक्ष्मण के साथ वहाँ से
चल पड़े ।
राम ने राज-तिलक के लिए संचित सभी मंगल-द्रव्यो की परिक्रमा करके उनको
प्रणाम किया । अचल तथा विकार-रहित चित्त से वे अपनी माता को यह समाचार सुनाने
के लिए चले । तबतक अन्त पुर में यह समाचार फैल गया कि लोकवद्य राम राज-पाट
छोड़कर वन जा रहे हैं । दशरथ की अन्य स्त्रियाँ आपस में कहने लगी—'राम अपनी
माता कौसल्या के प्रति जो भक्ति दिखाते हैं, वही भक्ति हमारे प्रति भी रखते हैं । ऐसे
सद्गुणालकार, महान् उदार-चेता, हिमाचल के समान धीर, उस महान् वीर पुत्र-रत्न को
हाय ! राजा ने वनवास की आज्ञा कैसे दी ? पागल की तरह राम को वनवास के दुखो
में भेजना कहाँ तक उचित है ।' इस प्रकार, महाराजा की निंदा करते हुए सभी स्त्रियाँ
शोक करने लगी ।
उसी समय राम ने कौसल्या के अत.पुर में प्रवेश किया । उससे पूर्व कौसल्या ने
अभिषेक के निर्विघ्न संपन्न होने के निमित्त जप, शांति, हवन आदि को एकनिष्ठ होकर पूरा
किया था और भक्ति-युक्त हो जनार्दन से प्रार्थना कर रही थी । राम के आगमन से वे
अत्यंत प्रसन्न हुईं । सुमगलियो के साथ फूल लिये हुए वे सामने आईं और विधिवत्
मंगलाचार आदि पूरे किये । रामचंद्र ने उनके चरण छुए । उन्होने राम को उठाकर गले से
लगा लिया और आशीर्वाद दिया—'हे पुत्र, तुम चिरायु, सुयश एव राज्य-लाभ करो ।'
६. कौसल्या का दुःख
अपनी माता कौसल्या को देखकर राम अत्यंत दीन होकर बोले—'हे माता, आपको,
माता सुमित्रा को तथा मैथिली को भय उत्पन्न करनेवाली एक घटना घटी है । मै उसे
आपको सुनाऊँगा । आप धैर्य के साथ सुनिए । किसी समय युद्ध में माता कैकेयी ने
महाराज से दो वर प्राप्त किये थे । उन्होने अभी वे दोनो वर राजा से माँगे हैं । एक वर
से उन्होने अपने पुत्र का राज-तिलक माँगा और दूसरे से मेरा वन-वास चाहा है । इस पर
महाराजा अत्यंत शोक-संतप्त हो गये हैं । पिता के वचनो की रक्षा के लिए मैने चौदह
वर्षों तक वन में रहने का निश्चय किया है ।'
इन बातो को सुनकर कौसल्या मन-ही-मन दुखी होकर, स्तंभित हो गईं । उनके
मुख की कान्ति उतर गई और गला रुँध गया । वे काष्ठ की तरह चेष्टाहिन हो गईं
और चीत्कार करती हुई जड़ से उखाडी हुई लता के समान मूर्च्छित होकर गिर पडी ।
राम ने घबड़ाकर बड़ी भक्ति से उन्हें उठाया, उनके शरीर पर लगी हुई धूल पोछी और
उन्हें एक सुन्दर आसन पर बिठाया । इसके पश्चात् लक्ष्मण और राम ने उनका उचित
उपचार किया । जब उनकी चेतना लौट आई, तब वे अपने ओठो को आर्द्र करती हुई
कहने लगी—"हे अनघ राघव ! तुम्हें वन में रहने का आदेश देना, मेरे कानो को अत्यंत
अयोध्याकांड ८५
विचित्र-सा मालूम होता है । महाराज तुम्हें बुलाकर इस प्रकार का आदेश कैसे दे सके ?
भले ही भरत का राज-तिलक करके उसे पृथ्वी का स्वामी बना दें, किन्तु काकुत्स्थ-वंशी
राजा को तुम्हें वन भेजने की आवश्यकता क्यों हुई ? न वे विवेक-शून्य हैं, न अधम हैं ।
फिर सौत की बातों में आना उन्हें कैसे शोभा देता है ? क्या हितैषी मन्त्री तथा कुल-गुरु
वसिष्ठ ने भी तुम्हारे हित का विचार करके यह नहीं कहा कि अमुक कार्य धर्म-संगत है
और अमुक कार्य उचित है ? मेरे प्राणनाथ ने इतना बड़ा अपराध कभी नहीं किया था
और कैकेयी ने कभी ऐसा पाप नहीं किया । तुम्हें देखकर वन जाने का आदेश देने के
लिए कैकेयी का मुख कैसे खुला ? हे राम, प्रेम से प्राण भी माँग लेनेवाली, महाराज
की प्रेम-पात्री कैकेयी के गर्भ से जन्म लेकर, पृथ्वी का पालन करने का सौभाग्य प्राप्त न
करके तुमने मेरे गर्भ से क्यों जन्म लिया ? यदि तुम मेरे गर्भ से जन्म नहीं लेते, तो तुम
पर यह विपत्ति क्यों आती ? हाय ! पुत्रहीन वन्ध्या की अपेक्षा भी मुझे आज अधिक दुःख
मिल रहा है । दीर्घ काल तक संतानहीना होकर रही और उसके पश्चात् ईश्वर की
कृपा से तुम्हें पुत्र के रूप में प्राप्त किया, तो मन को बड़ी शांति मिली, किन्तु मेरा सारा
तप आज व्यर्थ हो गया है । हे राजकुमार, जिस दिन तुम मुझे छोड़कर साहस के साथ
घोर वन में चले जाओगे, उस दिन मेरे लिए मृत्यु को छोड़कर अन्य कोई शरण नहीं
दीखती । तुम मुझे छोड़कर कैसे वन में जाओगे ? मैं कैसे अपने दुःख को शान्त कर
सकूँगी ? पच्चीस वर्ष तक मैंने तुम्हें बड़े प्रेम से पाला-पोसा । यह सारा संसार जानता है ।
तुम मुझे इस दशा में छोड़कर कैसे जाओगे ? हे पुत्र, मैंने तुम्हारे लिए जो विविध
व्रत रखे तथा विविध दान दिये, वे सब ऊसर भूमि में डाले गये बीजों की तरह निष्फल
हो गये । यदि भरत राजा बन जाय, तो परिजन क्रूर कैकेयी के भय से मेरी सेवा करने
के लिए कैसे आयेंगे ? राजा के प्रेम से वंचित तथा सब प्रकार के राजभोगों तथा वैभवों
से रहित होकर मैं अपनी सौतों के मध्य कौन-सा मुँह लेकर रहूँगी ? कैकेयी का अधिकार
मैं कैसे सहूँगी ? मैं नहीं जानती थी कि सारा कार्य इस प्रकार चौपट हो जायगा । इस
अशुभ समाचार के सुनने के पहले ही मैं क्यों नहीं मर गई ? हे सूर्यवंश-तिलक, भले ही
कैकेयी सारा राज्य लेकर अपने पुत्र को उसका अधिकारी बनाकर उसे भोग ले । हे तात,
तुम वनों में क्यों जाओगे ? तुम मेरे पास वैसे ही रहो । तुम्हारी बाल्यावस्था में वसिष्ठ
आदि मुनियों ने तुम्हारे चरण-कमलों में, पद्म, हल, वज्र, ध्वजा, कलश आदि चिह्नों
को देखकर कहा था कि यह बालक समस्त विश्व का पालन करेगा । आज कैकेयी ने
उनके वचन को असत्य सिद्ध कर दिया ।”
७ लक्ष्मण का क्रोध और राम का समझाना
इस प्रकार विविध प्रकार से विलाप करनेवाली कौसल्या को देखकर लक्ष्मण दुःख
और क्रोध से व्याकुल हो गये । उनका मुख तमतमाने लगा और उनकी भौंहें तन गईं ।
क्रोधाग्नि में जलते हुए तलवार चमकाते हुए वे राम तथा राम की माता से बोले-“हाय !
पौरुष तथा अभिमान को तिलांजलि देकर, क्षत्रिय-धर्म को त्यागकर, तेजोहत हो, ऐसे दीन
वचन आप क्यों कह रहे हैं ? मदमति पिता का आदेश आपको ठुकरा देना चाहिए ।
८६ रंगनाथ रामायण
कामातुर, पापकर्मी तथा वृद्ध का इतना आदर करने की क्या आवश्यकता है ? जब कैकेयी
को दिये हुए वचन का भग करना वे नही चाहते, तो आपको राज्य देने का वचन देकर
वे -कैसे मुकर रहे हैं ? वसिष्ठ आदि सब सज्जनो के समक्ष ही तो उन्होने कहा कि मै
राम को राज्य दूंगा । क्या इस वचन का पालन नही करना चाहिए । सबसे पहले यह
असत्य हुआ कि नही ? कहाँ के दशरथ और कहाँ के वर ? कौन भरत और कौन कैकेयी ?
यदि मै हाथ में धनुष लूँ, तो मेरा सामना करने की क्षमता किसमें है ? भरत से लेकर
मैं सभी शत्रुओ का वध करके इस नगर को मिट्टी में मिला दूंगा । हरि, हर, ब्रह्मा आदि
युद्ध में मेरा सामना करें, तो भी मै उनसे युद्ध करके उनपर विजय प्राप्त करूँगा। सुदर
केयूर-ककणो से अलकृत तथा चदन-चर्चित अपने इन हाथो से मै आपका राज-तिलक करूँगा
और सभी शत्रुओ का वध कर दूंगा । मेरे जैसे सेवक के रहते हुए आपको सारा साम्राज्य
त्यागने की क्या आवश्यकता है ? वन जाने का विचार छोड़ दीजिए और अपनी शक्ति
के प्रताप से राज्य ग्रहण करके प्रजा का पालन कीजिए और माता कौसल्या को प्रसन्न
कीजिए ।"
राघव ने अपने अनुज की बातो पर मन-ही-मन विचार करके बड़े स्नेह से उन्हें
देखकर कहा—'हे लक्ष्मण ! शौर्य-प्रदर्शन के लिए यह उचित अवसर नही है । इससे
हमारा कल्याण नही होगा । अब हमें राज्य-पालन करना नही है । हमें दूसरे काम करने हैं ।
शौर्य यहाँ दिखाने की क्या आवश्यकता है ? उसे तो शत्रुओ के प्रति दिखाना चाहिए ।'
तब कौसल्या ने राम से कहा—'हे वत्स ! तुम अपने अनुज की इन विमल वचनो
को सुनो । शौर्य का आश्रय लो और आर्य-सम्मत रीति से राज्य का पालन करते हुए
प्रजा की प्रशसा प्राप्त करो । क्या तुम्हें यह उचित है कि मेरी सौत की बातो के कारण
राज्य छोड़कर वन में निवास करो । मेरे यहाँ रहो, और मेरी सेवा-शुश्रूषा करो । इससे
बढ़कर इस पृथ्वी पर तुम्हारा कौन-सा धर्म है ? तुम पिता की आज्ञा का पालन करने के
लिए उद्यत हो, पर क्या, तुम्हें माता की आज्ञा कम मान्य हो गई है ?'
तब दुःखित होनेवाली माता को ढाढस बँधाते हुए राम उनसे बोले—"हे माता !
आप कैसी बातें कर रही हैं ? आप इतनी दुखी क्यो हो रही है ? क्या अपने पिता की
आज्ञा मानकर भार्गव ने अपनी माता का वध नही किया था ? क्या पिता की आज्ञा पाते
ही कुडिन ने एक गाय का वध नही किया था ? पुरुरवा ने अपना यौवन अपने पिता को
देकर बुढ़ापा ग्रहण नही किया था ? अपने पिता के आदेश से क्या सगर के पुत्रो ने
समुद्र-तल को खोद नही डाला था ? तब पिता की आज्ञा से वन में निवास करना मेरे
लिए कौन बड़ा काम है ? आपके पति के वचन का पालन करना आपके और मेरे लिए
परम धर्म है । लक्ष्मण तो अभी बच्चा है, वह वीरो के समान सोचने के सिवा दूसरा कुछ
नही जानता ।" इस प्रकार कहकर वे हँसते हुए अपने अनुज से बोले—"हे लक्ष्मण, तुम्हारे
भुजबल, पराक्रम, धनुर्विद्या, बुद्धि तथा पौरुष ये सब किस काम के हैं ? मेरे प्रति श्रद्धा
से प्रेरित होकर
दी है। मेरा भाई इस समस्त राज्य पर शासन करनेवाला है। अब तुम किसपर क्रोध
करते हो ? ऐसे समय में अपने बल का घमड दिखाना क्या तुम्हें उचित है ? पिता की
आज्ञा का पालन करने से बढकर दूसरा धर्म कौन-सा है ? पिता की आज्ञा का उल्लघन
करने से बढकर दूसरा पाप कौन-सा है ? चाहे तुम किसी भी रीति से विचार करो,
राजा की आज्ञा का पालन करना मेरे लिए, तुम्हारे लिए और माताओ के लिए धर्म-संगत है।'
उनकी आज्ञा के अनुसार मुझ वन जानेवाले को मत रोको । परम पवित्र रविकुल के
वशजो के चरित्र का तो तुम्हें विचार करना चाहिए। जो होना है, वह होकर ही रहेगा ।
विधि का लेख कौन मिटा सकता है ?" इन बानो को सुनकर लक्ष्मण ने अपना क्रोध-
शान्त कर लिया और रामचन्द्र का रुख देखकर भीत हो चुप रह गये ।
८. राम का कौसल्या को धैर्य देना
सती कौसल्या अपने पुत्र का त्याग देखकर अत्यत दुःखी हुईं और षोडश कलाओ से
युक्त, पूर्णचन्द्र के सदृश, प्रकाशमान राम का मुख देखकर बोली—'हे मेरे कुल-दीपक,
हे मेरे प्रिय पुत्र, हे मेरे तात, वत्स (बछडा) को खोनेवाली गाय की तरह मैं तुम्हें छोड़कर
चौदह साल तक यहाँ नहीं रह सकूंगी। मैं भी तुम्हारे साथ घने वन में आकर रहूँगी।'
इस प्रकार विलाप करती हुई_माता को सातवना देते हुए बड़े अनुनय-विनय से तथा अत्यंत
दीन भाव से राम बोले—
"हे माता, ऐसा कहना क्या आपको उचित है ? विचार करके देखिए । स्त्री के
लिए पति ही प्राण हैं, नातेदार हैं और देवता हैं। ऐसे पति को त्यागकर मेरे साथ जाने
के लिए जो आप कहती हैं, क्या यह आपको उचित है ? यदि महाराज ने राज-पाट
भरत को देने की आज्ञा दी है तो इसमें दोष क्या है ? राजा ने जो वर देने का वचन
दिया था, उन्हें माँगना क्या कैकेयी की भूल है ? असत्य कहने से डरकर राजा का वर
देना क्या अनुचित है ? अपने पिता की आज्ञा मानकर मेरा इस प्रकार वन जाने के लिए
प्रस्तुत होना क्या दोष है ? सत्य तो यह है कि पति के आज्ञा-पालन में बाधा देना आपकी
भूल कही जायगी । मेरे वन जाने के पश्चात् आपको दीन तथा दुःखी राजा की सतत
सेवा-परिचर्या करते हुए, उनके मन का दुःख दूर करते रहना चाहिए। पाप-रहित तथा
बंधु-प्रेमी भरत मुझसे अधिक भक्ति-युक्त होकर आपकी सेवा करेगा । आप शोक न करें ।
स्वप्न में भी महाराज दशरथ के सवध में कटु विचार मत लाइए । आप कैकेयी के साथ
स्नेहयुक्त होकर रहिए । मेरे कुशल का विचार करके आप मुझे वन जाने की आज्ञा
दीजिए ।"
इस प्रकार कहते हुए राम ने माता को प्रणाम किया । कौसल्या ने राम को हृदय
से लगा लिया । उनकी आँखों से दुःख के अश्रु उमड़-उमड़कर राम की पीठ पर गिरने लगे ।
उनकी पीठ पर हाथ फेरते हुए वे गद्गद स्वर से बोली—'हाय, तुम वन में जाओगे ?'
इसके पश्चात् उन्होंने किंचित् धैर्य धारण करके अपने कपोलों पर झरनेवाले अश्रुओं को
पोछ लिया । पवित्र जल से हाथ तथा मुंह का प्रक्षालन किया और पुण्याह-वाचन कराया और
कहा—'सुर, खेचर, यति, गिरि, वृक्ष, वेद, शान्ति, दान्ति, नदी, निधि, समुद्र आकाश, जल,
वायु, पृथ्वी, अग्नि, दिक्पाल, दश दिशाएँ, सूर्य-चन्द्र, तथा ब्रह्मा आदि सभी सदा तुम्हारा
कल्याण करते रहें।' इस प्रकार स्वस्ति-वचन कहकर कौसल्या ने देवताओ की पूजा करके
राम के दाहिने हाथ में रक्षा-कंकण बाँधा और कहा-'वृत्रासुर का वध करने के
लिए जानेवाले इन्द्र को देवताओ ने जो कल्याणप्रद कामनाएँ की थी, वे सब तुम्हें प्राप्त हो ।
स्वर्ग से अमृत लाने के लिए जानेवाले गरुड़ को विनता ने जो शुभ आशीर्वाद दिये थे,
हे राम, वे सब तुम्हें प्राप्त हो ।'
इस प्रकार, आशीर्वाद देकर कौसल्या ने राम को हृदय से लगा लिया, सिर सूंघा
और उन्हें जाने की अनुमति दी । तब माता का चरण-स्पर्श करके वे अनुज के साथ वहाँ
से अपने अंत पुर के लिए श्वेत छत्र-चामर-रहित हो पैदल रवाना हुए । अभिषेक में विघ्न
पड़ा हुआ जानकर राज-सभा के सभासद, सामंत राजा, मंत्री तथा नगर-निवासी अत्यंत दुःखी
होने लगे ।
९. राम का अभिषेक-भंग का वृत्तांत सीता को सुनाना
रामचंद्र अपने अंत पुर में पहुँच गये, तो सीता अपनी सहेलियो के साथ उनकी
अगवानी के लिए आई । सीता को देखकर राम का मुख मलिन हो गया । यह देखकर
सीता का मुख भी मलिन पड़ गया । उन्होने कहा—"हे प्राणनाथ, यह कैसी विचित्र बात है
कि आपका मुख-कमल आज मुरझाया हुआ है ? क्या राजा ने पुण्य-योग का मुहूर्त्त
बीतता जानकर आपका राज-तिलक कर दिया ? चंद्र-मंडल की समता करनेवाला श्वेत
छत्र आपके मुख-कुमुद पर क्यो छाया नही कर रहा है ? क्या कारण है कि चामरधारी
आपके पार्श्व-भाग में नही है ? भद्रगज क्यो नही दीख रहा है ? आपके सिर पर मंत्राक्षत
क्यो नही दीख रहे है ? नगर-जन आपकी सेवा में प्रवृत्त हो क्यो नही आ रहे हैं ? दुदुभी
तथा पटह-नाद क्यो नही सुनाई पड़ रहे है ? वंदी-मागधो के स्तुति-पाठ कहाँ ? हे प्रभु !
आज तो राज-तिलक का दिन है । आपमें कोई राज-चिह्न नही दीख रहा है ?
क्या कारण है कि सौमित्र का वदन प्रफुल्ल नही है ? इन सबका क्या कारण है, आप
कृपया बतलाइए ।"
सीता के ये भोले वचन सुनकर राम मन-ही-मन दुःखी हुए और उस मानिनी सीता
को देखकर बोले—"भला मुनियो को राज-चिह्नो से क्या मतलब ? सुनो, इसका कारण
बताता हूँ । माता कैकेयी ने पहले मेरे पिताजी की सेवा करके उनसे जो वर प्राप्त
किये थे, उन्हें आज माँग लिया है । एक वर से उन्होने भरत का राज-तिलक और दूसरे
वर से मेरा वन-वास माँगा है । अत राजा ने राज्य का पालन करने के लिए मेरे अनुज
का राज-तिलक करने का वचन दिया है और मुझे पिता की आज्ञा से चौदह साल तक वन
में रहना है । माता-पिता की आज्ञा का पालन करनेवाले वीर के हाथ में ही ऐश्वर्य,
यश, नाना लोक और नाना पुण्य रहेंगे । इसलिए हे कमलोचनी ! जबतक मैं महाराज
की आज्ञा के अनुसार वनवास पूरा करके न लौटूं, तबतक तुम दुख त्याग कर गुरुजनो
की भक्तिपूर्वक परिचर्या करती रहो । मन-ही-मन मेरे कुशल की कामना करती रहो और
उत्तम आचरण से अपने धर्म का पालन करती हुई मातायो के पास रहो ।"
अयोध्याकांड ८९
इन बातो को सुनकर जानकी सभ्रम-चित्त हो उठी । प्रचंड वायु से कपायमान
होनेवाली कदली के समान वह थरथर कांपने लगी और अत्यधिक दुख से कातिहीन
होकर गद्गद स्वर में बोली—‘हे प्राणेश, यदि यह सच है, तो मै भी अवश्य इसी क्षण
आपके साथ चलूंगी । मै आपके त्रियोग में जीवित नही रह सकूंगी । मेरे प्राण मुझमें
नही रहेंगे । आप मुझे अपने साथ अवश्य ले चलिए ।’
राघव बोले—‘हे कमलाक्षी, यह कैसे संभव है कि तुम जंगलो में कंद-मूल खाते,
पथरीले रास्तो में पैदल चलते, वल्कल पहने, कड़ी धूप तथा प्रचंड वायु को सहते तथा
कड़ी भूमि पर शयन करत हुए पर्णशाला में जीवन बिताओ । तुम तो कोमलागी हो और
कष्ट का नाम तक नही जानती । ऐसी कोमलागी तुम आश्चर्यजनक हाथी, बाघ, रीछ,
-भेडिये, हिरन, साँप तथा लाल चीटियो से पूर्ण गिरि, गुफा, तथा घाटियो में कैसे
रह सकोगी ? भयावने लता-मार्गों पर, अत्यंत दुर्गम, लता, कटक, वृक्षो से भरे हुए पथो से
युक्त भयंकर वनो
६० रंगनाथ रामायण
यो कहती हुई वे राम के चरणो पर गिरकर विलाप करने लगी । फिर भी राम
को विचलित होते नही देख अत्यत दीन स्वर में वे बोली—"हे नाथ यदि जान-बूझकर,
या अनजान में मैने कोई अपराध किया हो, तो आप मुझे क्षमा कर दीजिए । कर्कश
शिलाओ से आकीर्ण प्रदेशो में भी आपकी सेवा करते हुए मुझे कोई थकावट नही होगी ।
आप जो कद-मूल कृपा-पूर्वक देंगे, वे मेरे लिए अमृत-तुल्य होगे । आप ही मेरे आप्त-बधु हैं।
अतः, मै आपके साथ अवश्य चलूँगी । न मै अपने पिता का स्मरण करूँगी न माता
का, न इष्ट वधुजनो का ।। हे प्राणेश आपने अग्नि के समक्ष मेरे पिता से मुझे सह-धर्म-
चारिणी के रूप में ग्रहण किया था । आप लोकवद्य है, सत्यनिष्ठ है । मुझे यही छोडकर
वनवास के लिए आपका चला जाना क्या उचित है ? वहाँ जो भी कष्ट हो, वह आपकी
कृपा से मेरे लिए सुख ही सिद्ध होगा । आपके बिना ये राजभवन, ये वधु-वाधव, यह
ऐश्वर्य और जीवन भी सार-हीन हो जायेंगे । मै कैसे यहाँ रह सकूँगी ? जैसे पुण्य सती
सावित्री अपने पति की अनुगामिनी होकर रही, मै भी आपकी परछाई की तरह आपके
पीछे-पीछे चलूँगी । मेरी जैसी साध्वी के लिए यही धर्म है । आपको छोडकर मै यहाँ
एक क्षण भी नही रह सकती । आपके साथ चौदह वर्ष क्या, हजार वर्ष तक जंगलो में
रहकर आपकी सेवा करती रहूँगी । आप ऐसे आदर्श का पालन कीजिए, जो ससार में पति-
पत्नियो के लिए अनुकरणीय हो । इतना ही क्यो ? यदि आप मुझे छोडकर वन चले
जायेंगे, तो मेरे प्राण भी उड जायेंगे अथवा मै स्वय अग्नि, जल या विष से अपने प्राण
त्याग दूँगी । मुझे छोडकर मत जाइए, मेरी मृत्यु देखकर जाइए ।" यो अत्यत शोकार्त
हो जानकी विलाप करने लगी ।'
१०. राम का सीता तथा लक्ष्मण को भी साथ चलन की अनुमति देना
सीता की यह दशा देख राम का हृदय दया से पिघल गया । उन्होने अपने कर-
पल्लवो से उस सुदरी को उठाकर कहा—'हे सुदरी, तुम्हें यहाँ छोड़कर अकेले वन में निवास
करना मै भी नही चाहता । मै केवल तुम्हारा हृदय परखना चाहता था । तुम मेरे साथ
चलो, तो सब तरह से मेरा कुशल ही होगा । मै तुम्हें अपने साथ ले चलूँगा । तुम चलने
से पूर्व आवश्यक दान आदि कर लो ।' कृपालु राम के अनुमति देते ही सीता ने स्वर्ण-
रत्नादि आभूषण अपने प्रिय परिजनो को दान कर दिये ।
तत्पश्चात् राम ने सौमित्र को अपने पास बुलाकर कहा—'यदि तुम भी मेरे साथ
वन में चलोगे, तो मेरे साथ तुम्हें भी खोकर हमारी माताएँ कौसल्या तथा सुमित्रा
अत्यत दुखी होगी । उनका दुख कौन दूर करेगा ? हम दोनो चले जायें, तो पिताजी की
देख-भाल करनेवाले कौन हैं ? पहले से ही माता कैकेयी सौतिया डाह मे प्रेरित है ।
अब राज-मद भी उन्हें हो जाय, तो न जाने वे अपनी प्रभुता दिखाती हुई उन्हें दुख देंगी
या धर्म का विचार करके (चुप) रह जायेंगी । अतः मेरे लौटने तक तुम्हारा यहाँ रहना
सर्वथा उचित है ।
इन बातो से दुखी होकर लक्ष्मण ने अपने भाई से कहा—'मै आपके साथ
अवश्य वन चलूँगा । यदि आप मना करेंगे, तो यही अपने प्राण त्याग दूंगा । यह मेरा दृढ़
अयोध्याकांड
६९
निश्चय है।' अनुज का यह दृढ़ निश्चय सुनकर राम ने उन्हें अपने साथ चलने की
अनुमति दे दी।
११. राम-लक्ष्मण का संपत्ति-दान
फिर राम ने अपने अनुज लक्ष्मण को भेजकर वसिष्ठ के पुत्र उत्तम गुण-सम्पन्न सुयज्ञ
को बुलवाया और उचित रीति से उनका आदर-सत्कार करके उन्हें हार, कुडल, वलय,
अंगद आदि सभी आभूषण, मामा का दिया हुआ मत्त गज, ख्याति, शत्रुजय आदि नामवाले
सहस्र हाथी, सुन्दर वस्त्र आदि दान में दिये। इनके अतिरिक्त राम ने उन्हें दस करोड सुवर्ण-
मुद्राएँ तथा अन्य अनुपम वस्तुएँ भी बडी श्रद्धा मे दी। उन्हें ग्रहण करके सुयज्ञ ने हर्षित
होकर आश्चर्य-चकित हृदय से उस राज-दंपती को आशीर्वाद दिये। उसके पश्चात् उन्होने
अपने राज-कोष का समस्त धन मँगाकर, याचको, निर्धनो तथा दीन-जनो में वितरित
कर दिये। अगस्त्य तथा कौशिक मुनियो को रत्न-राशियाँ दान कर दी। वसिष्ठ आदि मुनियों,
तथा तपस्वियो को उचित दान दिया। बंदी-मागध आदि, परिजन तथा अन्य निर्धनों को
अमित धन दिया। तत्पश्चात् ब्राह्मणो तथा बंधु-मित्रो को भिन्न-भिन्न प्रकार के दान देकर
उन्होने सौमित्र की ओर देखकर कहा—'तुम भी दान करो।' तब उस राजकुमार ने बडे
आनंद से कौशिक, गार्ग्य तथा शांडिल्य को बुलवाकर उन्हें अमित धन दिया। जिस किसी ने
जो कुछ माँगा, उसे उन्होने दे दिया। सीता ने परम कल्याणी अरुंधती तथा सुयज्ञ की
पत्नी को अपने आभूषण, अपना धन, तथा अपने अंतःपुर के सभी वस्तु-समूह दान में
दे दिये। तब अरुंधती ने वसिष्ठ को देखकर कहा—'हाय। इक्ष्वाकु के वंशजो की ऐसी
दशा देखकर चुप रह जाना क्या आपको उचित लगता है?' मुनि ने अच्छी तरह विचार
करके कहा—'यह भगवान् की इच्छा है, किसी भी तरह यह टल नही सकती। तुम चुप-
चाप देखो।'
१२. त्रिजटाख्य को राम का गायों का दान देना
उस समय त्रिजटाख्य नामक एक विप्र अपनी जीविका चलाने के उद्देश्य से खेत
जोतते हुए मन-ही-मन अपने दारिद्र्य का विचार करके दुःखी हो रहा था। उसकी स्त्री
अपने बच्चो के साथ अपने पति के पास गई और काम में व्यस्त पति को देखकर कहा—
'हे नाथ, अभी आप हल चलाने में क्यो व्यस्त हैं, हल को वही छोडकर आइए, मै एक
बात कहती हूँ। आज रामचन्द्र बडे आनंद से सभी याचको को असंख्य धन दान कर रहे है।
जो कोई जो कुछ माँगता है, उसे वे दे रहे हैं। आप अपना कुल तथा अपना नाम
बतलाकर उस काकुत्स्थ पति से अपने इच्छानुसार धन प्राप्त कर लीजिए। आप शीघ्र
जाइए।'
यह सुनकर उस विप्र की इच्छाएँ प्रबल हो उठी। वह तुरत रामचन्द्र के निकट
पहुँचकर उन्हें आशीर्वाद देकर बोला—'हे राजन्, मै निपट दरिद्र हूँ। मेरे कई बाल-बच्चे हैं।
मैं अत्यन्त निर्धन हूँ। आप मेरी रक्षा करें। तब रघुराम बोले—'अभी मेरे पास
गायो के कई समूह हैं। आप अपनी सारी शक्ति लगाकर कोई ढेला फेंकिए। आपका
ढेला जितनी दूर तक जायगा, उतनी दूर तक की भूमि में जितनी गायें हैं, वे सब आपको
९२ रंगनाथ रामायण
मिल जायेंगी । मन-ही-मन हर्षित होते हुए उस विप्र ने अपनी धोती तथा शिखा कसकर
बाँध ली, सभी नाडियो को कस लिया, दाँत पीसे और हाथ में ढेला लिये हुए श्रीरमापति
विष्णु तथा श्रीराम का नाम-स्मरण करके अपनी मुट्ठी जोर से घुमाकर ढेला सरयू नदी
तक फेंक दिया । सरयू नदी तक की भूमि में जितनी गायें थीं, उन्हें ब्राह्मण ने ले लिया ।
ब्राह्मण के इस बाहुबल को देख राम को आश्चर्य हुआ । उन्होने ब्राह्मण से कहा कि यदि
आपकी इच्छा हो, तो मैं बिना किसी संकोच के आपको और एक हजार गायें
तथा वस्त्र आदि दूंगा । तब विप्र ने कहा- 'आप मुझे एक यज्ञ के लिए आवश्यक धन
दे सकें, तो अच्छा होगा ।' राम ने उसकी इच्छा के अनुसार उसे धन देकर संतुष्ट किया ।
ब्राह्मण धन आदि लेकर अपनी पत्नी के साथ संतुष्ट मन से घर लौट गया ।
तब रघुराम अपने-आपको कृत-कृत्य मानते हुए अतःपुर के भीतर आये और गृह-
देवताओ की पूजा की, भक्ति के साथ मुनियो को प्रणाम किया और याचको को मुंह-मांगा
दान दिया । उसके पश्चात् उन्होने अपने गुरु के घर में रखे हुए तथा धनुष-यज्ञ के समय
वरुण से प्राप्त कोदंड, तूणीर, खड्ग आदि अपने अनुज के द्वारा मँगवाये और उन्हें धारण
करके सीता तथा लक्ष्मण के साथ राजा के दर्शन करने चले । नगर की प्रजा उन्नत सौध-
शिखरो तथा चौपालो से राजचिह्न-रहित राम को जाते हुए देख अत्यंत शोक-संतप्त होकर
कहने लगी- 'क्या राम ऐसी दुर्दशा को प्राप्त होने योग्य हैं ? वे जहाँ जायँगे, हम भी
वहीं जायँगे ।' कुछ लोग कहते- 'हम सब इस राजकुमार के साथ वन चले जायँ और
उजड़े हुए नगर पर कैकेयी राज्य करे ।' इसी तरह कुछ दूसरे लोग कहते- 'यह नगर
धीरे-धीरे भालू, बाघ, सिंह, लोमड़ी, पिशाच तथा असंख्य भूत-प्रेतो का निवास-स्थान बन
जायगा और वन में जहाँ राम रहेंगे, वही एक नगर बस जायगा ।' इस प्रकार लोगो के
रोने-पीटने से सभी दिशाएँ गूंज उठीं ।
१३. सीता-लक्ष्मण-सहित राम का दशरथ के दर्शनार्थ जाना
लोगो की आर्त ध्वनियो को बडे धैर्य के साथ सुनते हुए राम महाराज के अंतःपुर
में पहुँचे । उन्होने सुमंत्र के द्वारा राजा को अपने आगमन की सूचना भेजी । सुमंत्र ने
शोक-संतप्त राजा को देखकर कहा- 'महाराज, राम-लक्ष्मण पूज्यशीला सीता के साथ
आये हैं ।' यह संवाद सुनते ही राजा मूर्च्छित हो गये । जब उनकी मूर्च्छा दूर हुई, तब वे
धीरे-धीरे उठकर आसन पर बैठ गये और धैर्य धरकर गद्गद कंठ से बोले- 'मेरी सभी
रानियाँ रघुराम को देखने के लिए आवें ।'
सुमंत्र राजा के वचन सुनकर रनवास में गये और राजा की तीन सौ पचास रानियो
को अत्यंत विनय के साथ बुला लाये । तत्पश्चात् वे महान् तेजस्वी रामचंद्र को सीता
और लक्ष्मण के साथ महाराजा के सामने ले गये । राजा राम को हृदय से लगा लेने
के लिए उठे, किन्तु उनके पैर आगे नहीं बढ़ सके । वे वही लड़खड़ाकर भूमि
पर गिर पड़े । तब राम ने उन्हें उठाया और उनका सिर अपनी गोद में रखकर दुःख प्रकट
करने लगे । थोड़ी देर बाद राजा की चेतना लौट आई और वे उठ बैठे । पिता
को एकटक अपनी ओर ताकते हुए देखकर लोकवन्द्य राम बोले- 'हे अनघ, आपके वचन
अयोध्याकांड [९३]
की रक्षा करने के हेतु मुझे वन-गमन के लिए उद्यत देखकर साध्वी जानकी तथा सौमित्र,
मेरे मना करने पर भी मेरे साथ वन जाने के लिए प्रस्तुत हो गये हैं । उन्हें भी वन जाने
की अनुमति प्रदान कीजिए ।'
इन वचनो को सुनकर राजा ने कहा—'मतिभ्रष्ट कैकेयी की बातो में आकर मैने
तुम्हें वन जाने का आदेश देकर बडी निर्दयता की है । किन्तु तुम्हें उसका पालन करने
की आवश्यकता ही क्या है ? तुम अपने ढंग से राज्य करो ।'
इस पर राम ने हाथ जोडकर कहा—'हे राजन्, आप मेरे गुरु हैं, पृथ्वीपति हैं,
प्रेम से मेरी रक्षा करनेवाले आप्त-बन्धु हैं । अतः, आप अपनी आज्ञा का पालन करने की अनु-
मति मुझे दीजिए और जाने की आज्ञा भी दीजिए । सत्यनिष्ठ होकर आप सदा समस्त
लोको का पालन कीजिए ।'
दशरथ बोले—'हे वत्स ! तुम चिरायु, अमितशुभ, सुयश, पराक्रम, निष्कलंक धर्म-
बुद्धि प्राप्त करो । तुम्हें किसी प्रकार का कष्ट न हो । हे पुत्र, तुम आज रात को यही
रहकर कल वन के लिए प्रस्थान करो ।' इस पर राम ने कहा—'हे महाराज, हमारा
अब यहाँ रहना उचित नही है । आज और कल में विशेष अंतर नही पडता । अतः, आप
हमें स्नेह से जाने की अनुमति दीजिए । मेरे अनुज भरत को राज्य-पालन करने दीजिए ।
अब आप शोक मत कीजिए ।'
राम की त्याग-बुद्धि देखकर महाराज दशरथ को अत्यधिक दुख हुआ । वे बोले—
'तुम्हारे जैसे सुपुत्र को घोर जंगलो में निवास करने की अनुमति मैं किस मुंह से दूँ ?
हाय ! कैकेयी की बातो में आकर मै धोखा खा गया ।' यो कहते हुए वे करुणोत्पादक ढंग
से विलाप करने लगे । अंतःपुर की सब नारियाँ भी रोने लगी । इसी समय कौसल्या
तथा सुमित्रा दुख-संतप्त हृदय से वहाँ आईं और राजा के साथ विलाप करने लगीं ।
उन रमणियो तथा राजा का विलाप सुनकर सुमंत्र अपार दुख से पीडित हुए और
क्रोध से कैकेयी की ओर देखकर कहने लगे—'आपके कारण ही राजा को तथा हम सबको
यह संताप हो रहा है । मैं आपको क्या कहूँ ? आप पति के हित का विचार न करने-
वाली राक्षसी है । आप भी अपनी माता के समान ही पति की हत्यारिन हैं । आपके
पिता सभी भाषाओ के ज्ञाता थे । एक दिन वे और आपकी माता शय्या पर लेटे हुए थे ।
तब उन्होने किन्ही कीडो को आपस में बोलते हुए सुना और उसका विचार करके
हँस दिया । तब तुम्हारी माँ ने अपने पति से कहा—'बतलाइए कि आप क्यो हँस रहे
रहे है ?' तब उन्होंने कहा—'यदि मैं इसका कारण तुम्हें बतला दूँ, तो मेरी मृत्यु हो
जायगी ।' किन्तु आपकी माँ ने कहा कि 'मै आपकी मृत्यु से नही घबराती, आप अवश्य
अपनी हँसी का कारण बतलाइए । तब उन्होने निर्दय होकर आपकी माता को नगर से
निर्वासित कर दिया । भला, ऐसी चंडी की पुत्री, आपको अपने पति के हित का विचार
कैसे होगा ?'
कैकेयी सिर झुकाकर थोडी देर तक सोचती रही और फिर दशरथ को देखकर
बोली—'हे राजन्, प्राचीन काल में आपके वंशज महाराज सगर महान् यशस्वी होकर
राज्य करते थे । क्या उन्होंने अपने ज्येष्ठ पुत्र अममजस को विना किसी झिझक के नगर
म बाहर नहीं कर दिया था ? तब आप भी यदि राम को वन में भेज दें, तो इसमें
दोप ही क्या है ?'
शोक-समुद्र में डूबे हुए दशरथ इसका प्रत्युत्तर नहीं दे सके । तब सिद्धार्थ नामक
मंत्री ने कपटी कैकेयी को देखकर कहा—'असमंजस दर्प से उद्धण्ड होकर नगर के बालकों
को वाँव-वाँधकर सरयू नदी में फेंक देता था । जब प्रजा ने राजा से इसकी शिकायत की,
तब जन-हित का विचार करके उन्होंने अपने पुत्र को नगर से निर्वासित कर दिया । क्या
रामचंद्र में कोई दोप है ? वे तो उत्तम गुण-सपन्न हैं ।'
तब कैकेयी बोली—'राम तो पिता के दिये हुए वचनो का पालन कर रहा है ।
वह सुकृति है ।' कैकेयी की निष्ठुरता देखकर दशरथ बहुत दुखी हुए और सुमंत्र को देखकर
बोले—'हे सुमंत्र, तुम राज्य के धन, मणियाँ, गोधन, बंधुजन, अत पुर के निवासी मित्र,
मंत्री तथा विजय-चिह्नो से अलंकृत गज, रथ, तुरग आदि सब को राम के साथ भेज दो ।
इस शून्य नगर पर ही कैकेयी का पुत्र राज्य करेगा ।'
इन वचनो को सुनते ही कैकेयी क्रोध से जल उठी । वह अपने पति को कोसती
हुई बोली—'हे राजन्, आप रामचंद्र को राज्य का ऐश्वर्य देकर उजड़ा हुआ नगर भरत
को क्यो देना चाहते हैं ? ऐसी वातें क्यो करते हैं ? यदि राम, सौमित्र तथा जानकी के
माथ वल्कल पहनकर संतुष्ट मन से सारे ऐश्वर्य को त्याग कर मेरे देखते हुए वनवाम के
लिए नहीं जायगा, तो आपका वचन पूरा नहीं होगा । आपका वचन भूठा होगा । हे राजन्,
में आपके वर नहीं चाहती । निश्चय ही आपका वचन भग हुआ ।'
कैकेयी की वातें सुनकर दशरथ मूर्च्छित होकर भूमि पर गिर पड़े । उस दगा में
पृथ्वी पर पड़े हुए पिता को देखकर घोर परिताप से पीड़ित होकर राघव बोले—
'हे माताजी ! आप वार-वार महाराज की निंदा क्यो करती हैं ? मेरे गुरु, महाराज, मेरे
पूज्य पिता, मेरे परमदेव, मुझे आज्ञा दें, तो मे प्रेम से विप-पान भी करूँगा । प्रचंड
अग्नि या विप के समुद्र में भी प्रविष्ट होऊँगा । वनो में जाकर मुनियों के साथ रहना
कौन-सा वडा कार्य है ?'
दशरथ उन वचनो को सुनकर कैकेयी को देखकर बोले—'सुनो, में भी राज्य छोड़-
कर राम के साथ वन में जाऊँगा । तुम समस्त वैभव के साथ भरत को अयोध्या का राजा
वनाकर राज्य करो । अब अधिक विवाद क्यो ?' तब राम ने राजा से कहा—'महाराज,
निर्जन वन मेरे लिए योग्य रहेगा । मेरे साथ और कोई क्यो आये ? मेरे लिए वल्कल
मँगाइए । में उन्हें धारण कर चौदह वप तक वन में रहते हुए आपकी आज्ञा का पालन
करूँगा । माता, आप शीघ्र हमें वल्कल दीजिए ।'
तब कैकेयी निर्लज्ज होकर मन-ही-मन प्रसन्न होती हुई सबके सामने वल्कल ले
आई और उन्हें राम को देकर बोली—'हे राजकुमार ! इन्हें धारण कर लो ।'
राम ने वडी प्रसन्नता से माता से वल्कल ले लिये और अपने कपड़े उतारकर
वल्कल पहन लिये । राम के ममान ही लक्ष्मण ने भी वल्कल पहने । कैकेयी ने मीता को
अयोध्याकांड ६५
दो वल्कल दिये । तब सीता ने मन-ही-मन व्याकुल होकर राम से कहा—'वन में रहने-
वाले मुनि, न जाने इन वल्कलो को कैसे पहनते होगे ।' उन्होने एक वस्त्र को अपने कवे
पर डाल लिया और दूसरे को हाथ में लिये पहनने में असमर्थ हो खडी रही । राम ने
यह ढग देखा तो उन्होने स्वय सीता को वह वल्कल पहना दिया । सभी रानियो ने राघव
को देखकर कहा--'हे राजकुमार ! इस श्रेष्ठ राजकुमारी सीता को इतना निष्ठुर होकर
तपस्विनी की तरह घने जगलो में क्यो ले जा रहे हो ? हमारी बात मानकर तुम सीता
को हमारे पास छोड़ दो और लक्ष्मण के साथ तुम वन जाओ।'
१४. कैकेयी पर वसिष्ठ का क्रोध
तब वसिष्ठ कैकेयी को देखकर अत्यत क्रोध से बोले—"तुम कुलनाशिनी हो ।
तुमने राजा को धोखा दिया है । तुमने जैसा पाप किया, वैसा पाप कही भी किसी ने नही
किया है । रघुराम की आज्ञा से जानकी को रानियो के साथ रहने दो । तुम इसे स्वीकार
क्यो नही करती हो ? यदि वैदेही वन में चली जायगी, तो हम भी नगर-निवासियो के
साथ वन चले जायेंगे । इतना ही नही, भरत तथा शत्रुघ्न अत्यत प्रसन्न मन से रामचन्द्र
की सेवा करने के लिए वन जायेंगे । तब तुम इस निर्जन नगर में रहोगी । राम पुण्यशील हैं ।
उसके रहने से इस नगर की शोभा है । उसके चले जाने के बाद यह नगर उजडा
हुआ दीखेगा । पाप-पूर्ण मन से तुमने पति को धोखा दिया । अधिक लोभ से प्रेरित हो,
तुम राम को वन में भेजकर भरत का राज-तिलक करके चिर काल तक राज्य करने की
बात सोच रही हो । भरत कभी अपने पिता की आज्ञा नही टालेगा । वह अपने भाई
रामचन्द्र को पितृ-तुल्य मानता है । तुम्हारी बात सुनकर, धर्म-निष्ठा को त्यागकर, रामचन्द्र
को ठुकराकर क्या वह राज्य ग्रहण करेगा ? वह दशरथ का पुत्र है । तुम्हारा दोष
सिद्ध होने पर, क्या वह तुम्हे मन से माता मानेगा ? क्या राम के वन में रहते हुए वह
साम्राज्य का भार वहन करेगा ? तुम भरत का हृदय नही जानती । अगर उसे यह बात
मालूम हो जाय, तो वह तुम पर क्रुद्ध होगा । किसके लिए तुम इतने निष्ठुर बन रही हो ?
क्या भरत इसके लिए अपनी स्वीकृति देगा ? कदापि नही । इसलिए इसे तुम
शुभप्रद मत समझो । इतना ही नही, राम तथा सीता को वल्कल देने के लिए तुम्हारे
हाथ कैसे आगे आये ? वल्कल छोड़कर नवरत्न-खचित आभूषण तथा चीनाम्बर पहने जानकी
परिचारिकाओ के साथ वन में जाय ।"
इस प्रकार कहते हुए उस सयमीश्वर ने सीता को सुन्दर वस्त्र तथा आभूषण दिये ।
सीता ने उन्हें ग्रहण किया और वल्कल वही छोड़ दिये । सब लोग कैकेयी की निंदा करने लगे ।
राजा सबकी निंदा सुनते रहे और अत में कैकेयी को देखकर बोले—'तुमने मन
में पाप का सकल्प करके राम के लिए वनवास माँगा था । लेकिन क्या तुमने मुझसे
यह भी माँगा था कि सीता को वल्कल पहनने चाहिए ? क्या यह मानवती इसके लिए
योग्य है ? मैने क्या पाप किया, जो तुम इतनी क्रूर बनी हुई हो ? विनयाभिराम राम को
तपस्वी के रूप में वन भेजने से बढकर कोई और पाप है ? उसे यहाँ से भगाकर भी तुम्हें
चैन क्यो नही मिलता ? ऐसी पापिनी का पति मेरे पापो का अत ही नही है क्या ?'