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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 134, कुल 508 में से

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पृष्ठ 134

१०४ रंगनाथ रामायण
करके कहा—'हे राजन्, आपके पुत्र-रत्न सत्यनिष्ठ राम तथा लक्ष्मण, दोनो ने जटाएँ
धारण किये, गंगा को पार किया और पैदल चित्रकूट पर्वत की ओर चले गये हैं ।'
इन वचनों को सुनकर राजा अत्यधिक शोक करने लगे । उन्होंने सुमंत्र को अपने
निकट बुलाकर अपने पुत्र का समाचार विस्तार-पूर्वक जान लिया और उसके पश्चात्
बोले—'हे अनघ, सुमंत्र, हे मतिमान्, तुम्हारे कारण मैं अपने रामभद्र का कुशल-समाचार
जान पाया । नेत्रों का दुःख तथा मन का शोक दूर करनेवाले उसे (राम को) जी भरकर
देखे बिना मेरे ये प्राण शरीर में रहते नहीं दीखते । तुम मुझे राम के पास
ले चलो ।' तब सुमंत्र बोले—'राजन्, यदि आप श्रीराम के पीछे जायेंगे, तो प्रजा को दुख होगा
और कैकेयी आपकी निंदा करेंगी । अत यह आपके लिए उचित नही है ।' हे
मानवेंद्र, आप इतना दुःख मत कीजिए, धैर्य धारण कर धर्म का पालन करते हुए पुण्यवान्
बनिए । समस्त दुःख भूलकर बिना किसी अभाव का अनुभव किये आपके पुत्र कानन में
सुख-पूर्वक रहते हैं ।'
इसके पश्चात् सुमंत्र ने लक्ष्मण के वचन राजा को सुनाये, तो राजा अत्यधिक ग्लानि
का अनुभव करते हुए बोले—'सौमित्र के वचन सत्य हैं । मैं वैसा ही कामांध हूँ । क्रूर-
कर्मी तथा पापी हूँ ।' इस प्रकार कहते हुए राजा ने सुमंत्र को भेज दिया और स्वयं मन-
ही-मन कुढ़ने लगे । उन्हें देखकर कौसल्या बोलीं—'हे राजन्, अब 'हे राम, हे राम, का
आर्त्तनाद करते हुए चिंतित क्यों हो रहे हैं ? क्यों ऐसा स्वांग भरते हैं ? इस तरह शोक
का अभिनय क्यों कर रहे हैं ? क्या मैं सब बातें नहीं जानती ? लोक-निंदा के भय से
आपने स्वयं कैकेयी को सारी बातें सिखा दी थीं । फिर अपने राम का राज-तिलक करके
उसे समस्त पृथ्वी का पालन कराऊँगा, ऐसी घोषणा करके आपने उसे वन भेज दिया है ।
आप महादुष्ट हैं । आप का भी कोई धर्म है ? निंदा के भय से आपने मेरे पुत्र का राज-तिलक
रोकने के लिए उसे वन भेज दिया है । निस्संकोच होकर यदि कैकेयी राम का वध
करने के लिए भी कहे, तो आप उसका वध भी कर देंगे । बहुत समय तक संतानहीन
होकर मैं दुःखी रहती थी । निदान कितने ही जप-तप और व्रतों के उपरांत मैंने इस इकलौते
पुत्र को प्राप्त किया था और इससे मेरा चित्त कुछ शांत हुआ था । आपने मुझे शांत
रहने भी नही दिया ।'
इस प्रकार निंदा करनेवाली कौसल्या को देखकर राजा अपनी पूर्व-कथा उन्हें
सुनाने का विचार करके बोले—'हे कौसल्ये ! तुम जो कुछ कह रही हो वह सत्य ही है ।
मैं निश्चय ही पापकर्मी हूँ । अब बहुत समय तक मेरे शरीर में प्राण नहीं रहेंगे, इसलिए
चिढ़ा-चिढ़ाकर मुझे मत मारो । मैंने जो पाप-कर्म पहले किये थे, वे वैसे ही नहीं टलेंगे ।
देवताओं को भी अपने कर्म का फल अवश्य भोगना ही पड़ता है । मैं अपनी एक कथा
सुनाऊँगा । तुम उसे सुनो ।'
२३. दशरथ का कौसल्या को अपने शाप का वृत्तांत सुनाना
“यह मेरी युवावस्था की बात है । मैं सारे राज्य पर शासन करता था । एक दिन
अर्धरात्रि के समय मैं मृगया की इच्छा से धनुष-बाण लिये सरयू नदी के किसी अनुपम