रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 142, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ेंअनुभव करती हुई सोचने लगी—'हाय ! मैने ऐसे पुण्य-चरित को क्यो कोसा ?' फिर
उन्होंने भरत तथा शत्रुघ्न को हृदय से लगा लिया और परिताप से विलाप करने लगी ।
तब सयमी वसिष्ठ उन्हें लेकर राजा के अत पुर में गये । वहाँ रत्न-पीठ पर राजा
का शव रखा था । राजा की आँखें बन्द थी, मानो राजा ने यह विचार कर लिया हो कि
यह पापिन कैकेयी का पुत्र है, इसे नही देखना चाहिए । पिता का शव देखकर भरत
मूर्च्छित हो गये । थोडी देर में सँभलकर अत्यधिक पीडित हो आर्तनाद करने लगे—
'हे राजन्, मैं कैकेयराज के यहाँ से अनुपम मणि-भूषण आपके लिए ले आया हूँ । इन्हें
स्वीकार क्यो नही करते ? आप नेरी ओर देखते क्यो नही हैं ? मेरा दोष क्या है ?
पापिन कैकेयी का पुत्र हूँ, क्या इसलिए आप मुझे देखना नहीं चाहते ? हे महाराज !
इस सुमित्रा-पुत्र को तो देखिए । वह दुख से कैसे तडप रहा है। शत्रुघ्न को उठाकर उसके
शरीर पर लगी धूल को आप पोछने क्यो नहीं ? इस पर कृपा कीजिए । इससे बोलिए ।
इसने क्या किया है ? इसे अपने हृदय से लगा लीजिए । आपके सद्गुण, आपकी दया
और आपका स्नेह कहाँ छिप गये हैं। हे पिता, क्या कैकेयी ने आपकी बुद्धि को कलुषित
कर दिया है ? क्या ऐसी मृत्यु ही आपके भाग्य में लिखी थी ? राजाओ की मृत्यु तो
होती ही है, किन्तु ऐसी मृत्यु कही नही होती । मै इन कष्टो से कैसे पार पाऊँगा ?
हाय, में क्या करूँ ?'
इस प्रकार विलपते हुए भरत को देखकर वसिष्ठ ने कहा—'तुम्हारे पिता ने साठ
सहस्र वर्ष तक पृथ्वी पर शासन किया और मनु के धर्म-पथ पर चलते हुए समस्त धर्मों
का पालन किया । अत में तुम जैसे पुत्रो को प्राप्त किया । इसलिए तुम शोक मत करो।
इनकी देह का अग्नि-सस्कार करो ?'
मुनि की आज्ञा शिरोधारण कर भरत ने दूसरे दिन, मुनियो, राजाओ तथा अन्य
महात्माओ को बुलाया । दशरथ के शव को तीर्थ-जलो से स्नान कराया और श्रेष्ठ वस्त्र,
तथा भूषणो से उसे सजाया । वेदोक्त विधि से दान आदि देने के पश्चात् उस शव को
अरथी पर रखा । इसके उपरान्त मन्त्र-पूत अग्नि को लिये हुए वे (भरत) अनुज तथा मुनिजनो के
साथ अरथी के आगे-आगे चलने लगे । अरथी के अगल-बगल में उच्च स्वर में रुदन करती
हुई कौसल्या आदि रानियाँ लड़खडाती हुई चलने लगीं । सरयू के निकट श्मशान में चिता
सजाई गई । उसमें त्रेताग्नियो को प्रतिष्ठित करके वेद-विधि से (भरत ने) महाराज
दशरथ के शव का अग्नि-सस्कार किया, तिलोदक दिया, पिंडदान किया और फिर अत पुर
में लौट आये । उन्होंने बारह दिन तक विधि-युक्त क्रिया करते हुए ब्राह्मणो को दान आदि
देकर सतुष्ट किया ।
अन्त्येष्टि-क्रियाओ की समाप्ति के पश्चात् इक्ष्वाकुओ के कुलगुरु मुनि वसिष्ठ आगे
होने योग्य कार्यों का विचार करके, सामत राजाओ तथा मत्रियो को साथ लिये भानु-सम
उज्ज्वल भरत के निकट पहुँचकर बोले—'हे वत्स, तुम्हारे पिता परलोक सिधार गये हैं।
और तुम्हारे भाई राम वनवास के लिए गये हैं । राज्य में कोई राजा नही-रहे, तो राज-
काज चल नही सकते । प्रजा उच्छृङ्खल हो जायगी, पृथ्वी विचलित होगी और समस्त