रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)
Autobiography of Ram Prasad Bismil
पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
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आया। और अतिशीघ्र अपने ठहरने का स्थान बदल लिया। उस समय हम लोगों
के पास दो राइफलें, चार रिवाल्वर तथा दो पिस्तौल खरीदे हुए मौजूद थे। किसी
प्रकार उस खुफिया पुलिस वाले को एक कारीगर से, जहाँ पर हम अपने हथियारों
की मरम्मत कराते थे, मालूम हुआ कि हम में से एक व्यक्ति उसी दिन जाने
वाला था, उसने चारों ओर स्टेशन पर तार दिलवाए। रेलगाड़ियों की तलाशी ली
गई। पर पुलिस की असावधानी के कारण हम बाल-बाल बच गए।
रुपये की चपत बुरी होती है। एक पुलिस सुपरिटेंडेंट के पास एक राइफल
थी। मालूम हुआ वह बेचते हैं। हम लोग पहुँचे। अपने आप को रियासत का
रहने वाला बतलाया। उन्होंने निश्चय करने के लिए बहुत से प्रश्न पूछे, क्योंकि
हम लड़के तो थे ही। पुलिस सुपरिटेंडेंट पेंशनभोगी मुसलमान थे। हमारी बातों पर
उन्हें पूर्ण विश्वास न हुआ। कहा कि अपने थानेदार से लिखा लाओ कि वह तुम्हें
जानता है। मैं गया। जिस स्थान का रहने वाला बताया था, वहाँ के थानेदार का
नाम मालूम किया, और एक-दो जमींदारों के नाम मालूम किए। फिर एक पत्र
लिखा कि मैं उस स्थान के रहने वाले अमुक जमींदार का पुत्र हूँ और वे लोग
मुझे भली-भाँति जानते हैं। उसी पत्र पर जमींदारों के हिन्दी में और पुलिस के
दारोगा के अंग्रेजी में हस्ताक्षर बना, पत्र ले जाकर पुलिस कप्तान को दिया। बड़े
गौर से देखने के बाद वह बोले, "मैं थाने में दर्याफ्त कर लूँ। तुम्हें भी थाने
चलकर इत्तला देनी होगी कि राइफल खरीद रहे हैं।" हम लोगों ने कहा कि
हमने आपके इत्मीनान के लिए इतनी मुसीबत झेली, दस-बारह रुपये खर्च किए,
अगर अब भी विश्वास न हो तो मजबूरी है। हम पुलिस में नहीं जाएँगे। राइफल
के दाम लिस्ट में 180 रुपये लिखे थे, वह 250 रुपये माँगते थे, साथ में दो सौ
कारतूस भी दे रहे थे। कारतूस भरने का सामान भी देते थे, जो लगभग 50
रुपये का होता था। इस प्रकार पुरानी राइफल के नई के समान दाम माँगते थे।
हम लोग भी 250 रुपये देते थे। पुलिस कप्तान ने भी सोचा कि पूरे दाम मिल
रहे हैं। स्वयं वृद्ध हो चुके थे। कोई पुत्र भी नहीं था। अतएव 250 रुपये लेकर
स्वदेश-प्रेम 37
राइफल दे दी। पुलिस में कुछ पूछने न गए। उन्हीं दिनों राज्य के एक उच्च
पदाधिकारी के नौकर से मिलकर उनके यहाँ से रिवाल्वर चोरी कराया। जिसके
दाम लिस्ट में 75 रुपये थे, उसे 100 रुपये में खरीदा। एक माउजर पिस्तौल भी
चोरी कराया, जिसके दांम लिस्ट में उस समय 200 रुपये थे। हमें माउजर
पिस्तौल की प्राप्ति की बड़ी इच्छा थी। बड़े भारी प्रयत्न के बाद यह माउजर
पिस्तौल मिला, जिसका मूल्य 300 रुपये देना पड़ा। कारतूस एक भी न मिला।
हमारे पुराने मित्र कबाड़ी महोदय के पास माउजर पिस्तौल के पचास कारतूस पड़े
थे। उन्होंने बड़ा काम दिया। हममें से किसी ने भी पहले माउजर पिस्तौल देखा
भी न था। कुछ न समझ सके कि कैसे प्रयोग किया जाता है। बड़े कठिन
परिश्रम से उसका प्रयोग समझ में आया।
हमने तीन राइफलें, एक बारह बोर की दोनाली कारतूसी बंदूक, दो टोपीदार
बंदूकें, तीन टोपीदार रिवाल्वर और पाँच कारतूसी रिवाल्वर खरीदे। प्रत्येक हथियार
के साथ पचास या सौ कारतूस भी ले लिए। इन सब में लगभग चार हजार रुपये
व्यय हुए। कुछ कटार तथा तलवारें इत्यादि भी खरीदीं थीं।
मैनपुरी षड्यंत्र
इधर तो हम लोग अपने कार्य में व्यस्त थे, उधर मैनपुरी के एक सदस्य पर
लीडरी का भूत सवार हुआ। उन्होंने अपना पृथक संगठन किया। कुछ अस्त्र-शस्त्र
भी एकत्रित किए। धन की कमी की पूर्ति के लिए एक सदस्य से कहा कि अपने
किसी परिवार के सदस्य के यहाँ डाका डलवाओ। उस सदस्य ने कोई उत्तर न
दिया। उसे आज्ञापत्र दिया गया और मार डालने की धमकी दी गई। वह पुलिस
के पास गया। मामला खुला। मैनपुरी में धर-पकड़ शुरू हो गई। हम लोगों को
भी समाचार मिला। दिल्ली में कांग्रेस का अधिवेशन होने वाला था। विचार किया
गया कि "अमेरिका को स्वाधीनता कैसे मिली" नामक पुस्तक, जो यू.पी. सरकार
ने जब्त कर ली थी, कांग्रेस के अवसर पर बेच दी जाए। कांग्रेस के अधिवेशन
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के उत्सव पर मैं शाहजहाँपुर की सेवा-समिति के साथ अपनी एम्बुलेंस की टोली
लेकर गया था। एम्बुलेंस वालों को प्रत्येक स्थान पर बिना रोक जाने की आज्ञा
थी। अधिवेशन पंडाल के बाहर खुले रूप में नवयुवक यह कह कर पुस्तक बेच
रहे थे- “यू.पी. में जब्त किताब “अमेरिका को स्वाधीनता कैसे मिली”।”
खुफिया पुलिस वालों ने कांग्रेस का कैम्प घेर लिया। सामने ही आर्यसमाज का
कैम्प था। वहाँ पर पुलिस ने पुस्तक विक्रेताओं की तलाशी लेनी आरंभ कर दी।
मैंने कांग्रेस कैम्प पर अपने स्वयंसेवक इसलिए छोड़ दिए कि वे बिना स्वागत
समिति के मंत्री या प्रधान की आज्ञा पाए किसी पुलिस वाले को कैम्प में न
घुसने दें। आर्यसमाज के कैम्प में गया। सब पुस्तकें एक टेंट में जमा थीं। मैंने
अपने ओवरकोट में सब पुस्तकें लपेटीं, जो लगभग दो सौ होंगी और उन्हें कंधे
पर डालकर पुलिस वालों के सामने से निकला। मैं वर्दी पहने था, टोप लगाए हुए
था। एम्बुलेंस का बड़ा-सा लाल बिल्ला मेरे हाथ पर लगा हुआ था, किसी ने कोई
सन्देह भी न किया और पुस्तकें बच गईं।
दिल्ली कांग्रेस से लौटकर शाहजहाँपुर आए। वहाँ भी पकड़-धकड़ शुरु हुई।
हम लोग वहाँ से चलकर दूसरे शहर के एक मकान में ठहरे हुए थे। रात्रि के
समय मकान मालिक ने बाहर से मकान में ताला लगा दिया। ग्यारह बजे के
लगभग हमारा एक साथी बाहर से आया। उसने बाहर से ताला पड़ा देख पुकारा।
हम लोगों को भी संदेह हुआ। सबके सब दीवार पर से उतर कर मकान छोड़कर
चल दिए। अंधेरी रात थी। थोड़ी दूर गए थे कि जोर की आवाज़ आई, “खड़े
हो जाओ कौन जाता है ?” हम लोग सात-आठ थे। समझे कि घिर गए। कदम
उठाना ही चाहते थें कि फिर आवाज़ आई, “खड़े हो जाओ, नहीं तो गोली मारते
हैं।” हम लोग खड़े हो गए। थोड़ी देर में एक पुलिस के दारोगा बंदूक हमारी
तरफ किए हुए, रिवाल्वर कंधे में लटकाए, कई सिपाहियों को लिए हुए आ
पहुँचे। पूछा- “कौन हो ? कहाँ जाते हो ?” हम लोगों ने कहा- “विद्यार्थी हैं,
स्टेशन जाते हैं।” “कहाँ जाओगे ?” “लखनऊ।” उस समय रात के दो बजे थे।
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स्वदेश-प्रेम ३९
लखनऊ की गाड़ी पाँच बजे जाती थी। दारोगा जी को शक हुआ। लालटेन आई,
हम लोगों के चेहरे रोशनी में देखकर उनका शक जाता रहा। कहने लगे- "रात
के समय लालटेन लेकर चला कीजिए। गलती हुई, माफ कीजिए।" हम लोग भी
सलाम झाड़कर चलते बने। एक बाग में फूँस की मड़ैया पड़ी थी। उसमें जा बैठे।
पानी बरसने लगा। मूसलाधार पानी गिरा। सब कपड़े भीग गए। जमीन पर भी
पानी भर गया। जनवरी का महीना था। खूब जाड़ा पड़ रहा था। रातभर भीगते
और ठिठुरते रहे। बड़ा कष्ट हुआ। प्रातःकाल धर्मशाला में जाकर कपड़े सुखाए।
दूसरे दिन शाहजहाँपुर आकर, बंदूकें जमीन में गाड़कर प्रयाग पहुँचे।
विश्वासघात
प्रयाग (इलाहाबाद) की एक धर्मशाला में दो-तीन दिन निवास करके विचार
किया गया कि एक व्यक्ति बहुत कमजोर है, यदि वह पकड़ा गया तो सब भेद
खुल जाएगा, अतः उसे मार दिया जाए। मैंने कहा- "मनुष्य-हत्या ठीक नहीं।"
पर अंत में निश्चय हुआ कि कल चला जाए और उसकी हत्या कर दी जाए। मैं
चुप हो गया। हम लोग चार सदस्य साथ थे। हम चारों तीसरे पहर झूँसी का
किला देखने गए। जब लौटे तब संध्या हो चुकी थी। उसी समय गंगा पार करके
यमुना-तट पर गए। शौचादि से निवृत्त होकर मैं संध्या समय उपासना करने के
लिए रेती पर बैठ गया। एक महाशय ने कहा- "यमुना के निकट बैठो।" मैं
तट से दूर एक ऊँचे स्थान पर बैठा था। मैं वहीं बैठा रहा। वे तीनों भी मेरे
पास ही आकर बैठ गए। मैं आँखें बंद किए ध्यान कर रहा था। थोड़ी देर में
खट से आवाज़ हुई। समझा कि साथियों में से कोई कुछ कर रहा होगा। तुरंत
ही फायर हुआ। गोली सन से मेरे कान के पास से निकल गई। मैं समझ गया
कि मेरे ऊपर ही फायर हुआ है। मैं रिवाल्वर निकालता हुआ आगे को बढ़ा।
पीछे फिर कर देखा, वह महाशय माउज़र हाथ में लिए मेरे ऊपर गोली चला रहे
हैं। कुछ दिन पहले मुझसे उनका झगड़ा हो चुका था, किन्तु बाद में समझौता हो
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गया था। फिर भी उन्होंने यह कार्य किया। मैं भी सामना करने को प्रस्तुत हुआ।
तीसरा फायर करके वह भाग खड़े हुए। उनके साथ प्रयाग में ठहरे हुए दो सदस्य
और भी थे। वे तीनों भाग गए। मुझे देर इसलिए हुई कि मेरा रिवाल्वर चमड़े के
खोल में रखा था। यदि आधा मिनट और उनमें कोई भी खड़ा रह जाता तो मेरी
गोली का निशाना बन जाता। जब सब भाग गए, तब मैं गोली चलाना व्यर्थ
जान, वहाँ से चला आया। मैं बाल-बाल बच गया। मुझसे दो गज के फासले पर
से माउजर पिस्तौल से गोलियाँ चलाई गईं और उस अवस्था में जबकि मैं बैठा
हुआ था। मेरी समझ में नहीं आया कि मैं बच कैसे गया। पहला कारतूस फटा
नहीं। तीन फायर हुए। मैं गद्गद् होकर परमात्मा को स्मरण करने लगा। खुशी में
मुझे मूर्छा आ गई। मेरे हाथ से रिवाल्वर तथा खोल दोनों गिर गए। यदि उस
समय कोई निकट होता तो मुझे आराम से मार सकता था। मेरी यह दशा
लगभग एक मिनट तक रही होगी कि मुझसे किसी ने कहा, “उठ!” मैं उठा।
रिवाल्वर उठा लिया। खोल उठाने का स्मरण ही न रहा। 22 जनवरी की घटना
है। मैं केवल एक कोट और एक तहमद पहने था। बाल बढ़ रहे थे। नंगे सिर,
पैर में जूता भी नहीं। ऐसी हालत में कहाँ जाऊँ ? अनेक विचार उठ रहे थे।
इन्हीं विचारों में डूबा यमुना-तट पर बड़ी देर तक घूमता रहा। ध्यान आया
कि धर्मशाला चलकर ताला तोड़ सामान निकाल लूँ। फिर सोचा कि धर्मशाला
जाने से गोली चलेगी, व्यर्थ में खून होगा। अभी ठीक नहीं। अकेले बदला लेना
उचित नहीं। और कुछ साथियों को लेकर फिर बदला लिया जाएगा। मेरे एक
साधारण मित्र प्रयाग में रहते थे। उनके पास जाकर बड़ी मुश्किल से एक चादर
ली और रेल से लखनऊ आया। लखनऊ आकर बाल बनवाए। धोती-जूता खरीदे,
क्योंकि मेरे पास रुपये थे। रुपये न भी होते तो भी मैं सदैव जो चालीस-पचास
रुपये की सोने की अंगूठी पहने रहता था, उसे काम में ला सकता था। वहाँ से
आकर अन्य सदस्यों से मिलकर सब विवरण कह सुनाया। कुछ दिन जंगल में
रहा। इच्छा थी कि संन्यासी हो जाऊँ। संसार कुछ नहीं। बाद में फिर माताजी के
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पास गया। उन्हें सब कह सुनाया। उन्होंने मुझे ग्वालियर जाने का आदेश दिया।
थोड़े दिनों में माता-पिता सभी दादीजी के भाई के यहाँ आ गए। मैं भी वहाँ
पहुँच गया।
मैं हर वक्त यही विचार किया करता कि मुझे बदला अवश्य लेना चाहिए।
एक दिन प्रतिज्ञा करके रिवाल्वर लेकर शत्रु की हत्या करने की इच्छा से गया भी,
किन्तु सफलता न मिली। इसी प्रकार की उधेड़बुन में मुझे ज्वर आने लगा। कई
महीनों तक बीमार रहा। माताजी मेरे विचारों को समझ गई। माताजी ने बड़ी
तसल्ली दी। कहने लगीं कि, प्रतिज्ञा करो कि तुम अपनी हत्या की चेष्टा करने
वालों को जान से न मारोगे। मैंने प्रतिज्ञा करने में आनाकानी की, तो वह कहने
लगीं कि मैं मातृऋण के बदले में प्रतिज्ञा कराती हूँ, क्या जवाब है ? मैंने कहा-
“मैं उनसे बदला लेने की प्रतिज्ञा कर चुका हूँ।” माताजी ने मुझे बाध्य कर मेरी
प्रतिज्ञा भंग करवाई। अपनी बात पक्की रखी। मुझे ही सिर नीचा करना पड़ा।
उस दिन से मेरा ज्वर कम होने लगा और मैं अच्छा हो गया।
भाग जाने की दशा
मैं गाँव में गाँववासियों की भाँति उसी प्रकार के कपड़े पहनकर रहने लगा।
खेती भी करने लगा। देखने वाले अधिक-से-अधिक इतना समझ सकते थे कि मैं
शहर में रहा हूँ, सम्भव है कुछ पढ़ा भी होऊँ। खेती के कामों में मैंने विशेष
ध्यान दिया। शरीर तो हृष्ट-पुष्ट था ही, थोड़े ही दिनों में अच्छा-खासा किसान
बन गया। उस कठोर भूमि में खेती करना कोई सरल काम नहीं। बबूल, नीम के
अतिरिक्त कोई एक-दो आम के वृक्ष कहीं भले ही दिखाई दे जाएँ। बाकी वह
नितांत मरुभूमि (रेगिस्तान) है। खेत में जाता था। थोड़ी देर में ही झरबेरी के
काँटों से पैर भर जाते। पहले-पहले तो बड़ा कष्ट प्रतीत हुआ। कुछ समय बाद
अभ्यास हो गया। जितना खेत उस क्षेत्र का एक बलिष्ठ पुरुष दिन-भर में जोत
सकता था, उतना मैं भी जोत लेता था। मेरा चेहरा बिल्कुल काला पड़ गया।
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थोड़े दिनों के लिए मैं शाहजहाँपुर की ओर घूमने आया तो कुछ लोग मुझे
पहचान भी न सके। मैं रात को शाहजहाँपुर पहुँचा। गाड़ी छूट गई। दिन के
समय पैदल जा रहा था कि एक पुलिस वाले ने पहचान लिया। वह और पुलिस
वालों को लेने के लिए गया। मैं भागा, पहले दिन का ही थका हुआ था। लगभग
बीस मील पहले दिन पैदल चला था। उस दिन भी पैतीस मील पैदल चलना
पड़ा।
मेरे माता-पिता ने सहायता की। मेरा समय अच्छी प्रकार व्यतीत हो गया।
माताजी की पूँजी तो मैंने नष्ट कर दी। पिताजी से सरकार की ओर से कहा गया
कि लड़के की गिरफ्तारी वारंट की पूर्ति के लिए लड़के का हिस्सा, जो उसके दादा
की जायदाद होगी, नीलाम किया जाएगा। पिताजी घबराकर दो हजार रुपये का
मकान आठ सौ में तथा और दूसरी चीजें भी थोड़े दामों में बेचकर शाहजहाँपुर
छोड़कर भाग गए। दो बहनों का विवाह हुआ। जो कुछ रहा-बचा था, वह भी
व्यय हो गया। माता-पिता की हालत फिर निर्धनों-जैसी हो गई। समिति के जो
दूसरे सदस्य भागे हुए थे उनकी बहुत बुरी दशा हुई। महीनों चनों पर ही समय
काटना पड़ा। दो-चार रुपये जो मित्रों तथा सहायकों से मिल जाते थे, उन्हीं पर
गुजर होता था। पहनने के कपड़े तक न थे। विवश होकर रिवाल्वर तथा बंदूकें
बेचीं, तब दिन कटे। किसी से कुछ कह भी न सकते थे और गिरफ्तारी के भय
के कारण कोई प्रबंध या नौकरी भी न कर सकते थे।
उसी दशा में मुझे व्यवसाय करने की सूझी। मैंने अपने सहपाठी तथा मित्र
श्री सुशील चंद्र सेन, जिनका देहांत हो चुका था, की स्मृति में बंगला भाषा का
अध्ययन किया। मेरे छोटे भाई का जन्म हुआ तो मैंने उसका नाम सुशील चंद
रखा। मैंने विचारा कि एक पुस्तकमाला निकालूँ। लाभ भी होगा। कार्य भी सरल
है। बंगला से हिन्दी में पुस्तकों का अनुवाद करके प्रकाशित करवाऊँगा। अनुभव
कुछ भी नहीं था। बंगला पुस्तक "निहिलिस्ट रहस्य" का अनुवाद प्रारंभ कर
दिया। जिस प्रकार अनुवाद किया, उसका स्मरण कर कई बार हँसी आ जाती है।
स्वदेश-प्रेम 43
कई बैल, गाय तथा भैंस लेकर ऊसर में चराने के लिए जाया करता था। खाली
बैठा रहना पड़ता था, अतएव कापी-पेंसिल साथ ले जाता और पुस्तक का अनुवाद
किया करता था। पशु जब कहीं दूर निकल जाते तब अनुवाद छोड़ लाठी लेकर
उन्हें हकारने जाया करता था। कुछ समय के लिए एक साधु की कुटी पर जाकर
रहा। वहाँ अधिक समय अनुवाद करने में व्यतीत करता था। खाने के लिए आटा
ले जाता था। चार-पाँच दिन के लिए इकट्ठा आटा रखता था। भोजन स्वयं पका
लेता था। जब पुस्तक ठीक हो गई, तो "सुशील माला" के नाम से ग्रंथमाला
निकाली। पुस्तक का नाम "बोलशेविकों की करतूत" रखा। दूसरी पुस्तक "मन
की लहर" छपवाई। इस व्यवसाय में लगभग पाँच सौ रुपये की हानि हुई। जब
राजकीय घोषणा हुई और राजनैतिक कैदी छोड़े गए, तब शाहजहाँपुर आकर कोई
व्यवसाय करने का विचार हुआ, ताकि माता-पिता की कुछ सेवा हो सके। विचार
किया करता था कि इस जीवन में अब फिर कभी आजादी से शाहजहाँपुर विचरण
न कर सकूँगा, पर परमात्मा की लीला अपार है। वे दिन आए। मैं पुनः
शाहजहाँपुर का निवासी हुआ।
पंडित गेंदालाल दीक्षित
आपका जन्म यमुना-तट पर बटेश्वर के निकट "मई" गाँव में हुआ था।
आपने दसवाँ दर्जा अंग्रेजी का पास किया था। आप जब औरैया जिला इटावा में
डी.ए.वी. स्कूल में अध्यापक थे, तब आपने शिवाजी समिति की स्थापना की थी,
जिसका उद्देश्य था शिवाजी की भाँति दल बनाकर धन एकत्र करना और उससे
हथियार खरीदना और उसे दल में बाँटना। इसकी सफलता के लिए आप रियासत
से हथियार ला रहे थे जो कुछ नवयुवकों की असावधानी के कारण आगरा में
स्टेशन के निकट पकड़ लिए गए थे। आप बड़े वीर तथा उत्साही थे। शांत बैठना
जानते ही न थे। नवयुवकों को सदैव कुछ-न-कुछ उपदेश देते रहते थे। एक-एक
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सप्ताह तक बूट तथा वर्दी न उतारते थे।
जब आप ब्रह्मचारी जी के पास सहायता
लेने गए, तो दुर्भाग्यवश गिरफ़्तार कर लिए
गए। ब्रह्मचारी के दल ने अंग्रेजी राज्य में
कई डाके डाले थे। डाके डालकर ये लोग
चंबल के बीहड़ों में छिप जाते थे। सरकारी
राज्य की ओर से ग्वालियर महाराज को
लिखा गया। इस दल के पकड़ने का प्रबंध
किया गया। सरकार ने तो हिन्दुस्तानी
फौज भी भेजी थी, जो आगरा जिले में
चंबल के किनारे बहुत दिनों तक पड़ी रही।
पुलिस सवार तैनात किए, फिर भी ये लोग
भयभीत न हुए। विश्वासघात से पकड़े गए।
इन्हीं का एक आदमी पुलिस ने मिला लिया।
डाका डालने के लिए दूर एक स्थान निश्चय
किया गया, जहाँ तक जाने के लिए एक
पड़ाव देना पड़ता था। चलते-चलते सब थक
[चित्र-परिचय: गेंदालाल दीक्षित] गए, पड़ाव दिया गया। जो आदमी पुलिस
से मिला हुआ था, उसने भोजन लाने को कहा, क्योंकि उसके किसी संबंधी का
मकान निकट था। वह पूड़ी बनवाकर लाया। सब पूड़ी खाने लग गए। ब्रह्मचारी
जी जो सदैव अपने हाथ से बनाकर भोजन करते थे या आलू अथवा घुइयाँ
भूनकर खा लेते थे, उन्होंने भी उस दिन पूड़ी खाना स्वीकार किया। सब भूखे तो
थे ही, खाने लगे। ब्रह्मचारी जी ने भी एक पूड़ी ही खाई। उनकी जबान ऐंठने
लगी और जो अधिक खा गए थे, वे गिर गए। पूड़ी लाने वाला पानी लेने के
बहाने चल दिया। पूड़ियों में विष मिला हुआ था। ब्रह्मचारी जी ने बंदूक उठाकर
स्वदेश-प्रेम 45
पूड़ी लाने वाले पर गोली चलाई। ब्रह्मचारी जी का गोली चलाना था कि चारों
ओर से गोली चलने लगीं। पुलिस छिपी हुई थी। गोली चलने से ब्रह्मचारी जी को
कई गोलियाँ लगीं। तमाम शरीर घायल हो गया। पं. गेंदालालजी की आँख में
एक छर्रा लगा। बाईं आँख जाती रही। कुछ आदमी जहर के कारण मरे, कुछ
गोली से मारे गए। इस प्रकार 80 आदमियों में से 25-30 जान से मारे गए। सब
पकड़ कर ग्वालियर के किले में बंद कर दिए गए। किले में हम लोग जब पंडित
जी से मिले, तब चिट्ठी भेजकर उन्होंने हमको सब हाल बताया। एक दिन किले
में हम लोगों पर भी संदेह हो गया था, बड़ी कठिनता से एक अधिकारी की
सहायता से हम लोग निकल सके।
जब मैनपुरी षड्यंत्र का अभियोग चला, पंडित गेंदालालजी को सरकार ने
ग्वालियर राज्य से मँगाया। ग्वालियर के किले का जलवायु बड़ा ही हानिकारक
था। पंडितजी को क्षय (टी.बी.) रोग हो गया था। मैनपुरी स्टेशन से जेल जाते
समय ग्यारह बार रास्ते में बैठकर, जेल पहुँचे। पुलिस ने जब हाल पूछा तो उन्होंने
कहा- "बालकों को क्यों गिरफ्तार किया है ? मैं हाल बताऊँगा।" पुलिस को
विश्वास हो गया। आपको जेल से निकालकर दूसरे सरकारी गवाहों के निकट रख
दिया। वहाँ पर सब विवरण जान रात्रि के समय एक और सरकारी गवाह को
लेकर पंडितजी भाग खड़े हुए। भागकर एक गाँव में एक कोठरी में ठहरे। साथी
कुछ काम के लिए बाजार गया था। पंडितजी उसी कोठरी में तीन दिन बिना
अन्न-जल बंद रहे। समझे कि साथी किसी आपत्ति में फँस गया होगा, अंत में
किसी प्रकार जंजीर खुलवाई। रुपये वह सब साथ ही ले गया था। पास एक पैसा
भी न था। कोटा से पैदल आगरा आए। किसी प्रकार अपने घर पहुँचे। बहुत
बीमार थे। पिता ने यह समझकर कि घरवालों पर आपत्ति न आए, पुलिस को
सूचना देनी चाही। पंडितजी ने पिता से बड़ी विनय-प्रार्थना की और दो-तीन दिन
में घर छोड़ दिया। हम लोगों की बहुत खोज की। किसी का कुछ पता न पा
दिल्ली में एक प्याऊ पर पानी पिलाने की नौकरी कर ली। अवस्था दिनों-दिन
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बिगड़ रही थी। रोग भीषण रूप धारण कर रहा था। छोटे भाई तथा पत्नी को
बुलाया। भाई किंकर्त्तव्यविमूढ़। वह क्या कर सकता था ? सरकारी अस्पताल में
भर्ती कराने ले गया। पंडितजी की धर्मपत्नी को दूसरे स्थान में भेजकर जब वह
अस्पताल आया, तो जो देखा उसे लिखते हुए लेखनी काँपने लगती है।
पंडितजी शरीर त्याग चुके थे। केवल उनका मृत शरीरमात्र ही पड़ा हुआ था।
स्वदेश की कार्य सिद्धि में पं. गेंदालालजी दीक्षित ने जिस निःसहाय अवस्था में
अंतिम बलिदान दिया, उसकी स्वप्न में भी आशंका न थी। पंडितजी की प्रबल
इच्छा थी कि उनकी मृत्यु गोली लगकर हो। भारतवर्ष की एक महान आत्मा
विलीन हो गई और देश में किसी ने जाना भी नहीं। आपकी विस्तृत जीवनी
"प्रभा" मासिक पत्रिका में प्रकाशित हो चुकी है। मैनपुरी षड्यंत्र के मुख्य नेता
आप ही समझे गए थे। इस षड्यंत्र में खास बात यह हुई कि नेताओं में से
केवल दो व्यक्ति पुलिस के हाथ आए, जिनमें गेंदालाल दीक्षित एक सरकारी
गवाह को लेकर भाग गए, श्री शिवकृष्ण जेल से भाग गए, फिर हाथ न आए।
छः मास के बाद जिन्हें सजा हुई वे भी राजकीय घोषणा से मुक्त कर दिए
गए। खुफिया पुलिस विभाग का क्रोध पूर्णतया शांत न हो सका और उनकी
बदनामी भी इस केस में बहुत हुई।
तृतीय खण्ड
स्वतंत्र जीवन
राजकीय घोषणा के पश्चात् जब मैं शाहजहाँपुर आया तो शहर की अद्भुत
दशा देखी। कोई पास तक खड़े होने का साहस न करता था। जिसके पास मैं
जाकर खड़ा हो जाता था, वह नमस्ते कर चल देता था। पुलिस का बड़ा प्रकोप
था। प्रत्येक समय वह छाया की भाँति पीछे-पीछे फिरा करती थी। इस प्रकार का
जीवन कब तक व्यतीत किया जाए ? मैंने कपड़ा बुनने का काम सीखना आरंभ
किया। जुलाहे बड़ा कष्ट देते थे। कोई काम सिखाना नहीं चाहता था। बड़ी
कठिनता से मैंने कुछ काम सीखा। उसी समय एक कारखाने में मैनेजरी का
स्थान खाली हुआ। मैंने उस स्थान के लिए प्रयत्न किया। मुझसे पाँच सौ रुपये
की जमानत माँगी गई। मेरी दशा बड़ी शोचनीय थी। तीन-तीन दिवस तक भोजन
प्राप्त नहीं होता था, क्योंकि मैंने प्रतिज्ञा की थी कि किसी से कुछ सहायता न
लूँगा। पिताजी से बिना कुछ कहे मैं चला आया था। मैं पाँच सौ रुपये कहाँ से
लाता ? मैंने दो-एक मित्रों से केवल दो सौ रुपये की जमानत देने की प्रार्थना
की। उन्होंने साफ इन्कार कर दिया। मेरे हृदय पर वज्रपात हुआ। संसार अंधकारमय
दिखाई देता था। पर बाद में एक मित्र की कृपा से नौकरी मिल गई। अब
अवस्था कुछ सुधरी। मैं भी सभ्य पुरुषों की भाँति समय व्यतीत करने लगा। मेरे
पास भी चार पैसे हो गए। वे ही मित्र, जिनसे मैंने दो सौ रुपये की जमानत देने
की प्रार्थना की थी, अब मेरे पास चार-चार हजार रुपयों की थैली, अपनी बंदूक,
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लाइसेंस इत्यादि सब डाल जाते थे कि मेरे यहाँ उनकी वस्तुएँ सुरक्षित रहेंगी।
समय के इस फेर को देखकर मुझे हँसी आती थी।
इस प्रकार कुछ समय बीता। दो-चार ऐसे पुरुषों से भेंट हुई, जिनको पहले
मैं बड़ी श्रद्धा की दृष्टि से देखता था। उन लोगों ने मेरी पलायनावस्था के संबंध
में कुछ समाचार सुने थे। मुझसे मिलकर वे बड़े प्रसन्न हुए। मेरी लिखी हुई
पुस्तकें भी देखीं। इस समय मैं तीसरी पुस्तक "कैथेराइन" लिख चुका था। मुझे
पुस्तकों के व्यवसाय में बहुत घाटा हो चुका था। मैंने माला का प्रकाशन स्थगित
कर दिया। "कैथेराइन" एक पुस्तक-प्रकाशक को दे दी। उन्होंने बड़ी कृपा कर
उस पुस्तक को थोड़े से हेर-फेर के साथ प्रकाशित कर दिया। "कैथेराइन" को
देखकर मेरे इष्ट मित्रों को बड़ा हर्ष हुआ। उन्होंने मुझे पुस्तक लिखते रहने के
लिए बड़ा उत्साहित किया। मैंने "स्वदेशी रंग" नामक एक और पुस्तक लिखकर
एक पुस्तक-प्रकाशक को दी। वह भी प्रकाशित हो गई।
बड़े परिश्रम के साथ मैंने एक पुस्तक "क्रांतिकारी जीवन" लिखी। "क्रांतिकारी
जीवन" को कई पुस्तक-प्रकाशकों ने देखा, पर किसी का साहस न हो सका कि
उसको प्रकाशित करे। आगरा, कानपुर, कलकत्ता आदि कई स्थानों में घूमकर
पुस्तक मेरे पास लौट आई। कई मासिक पत्रिकाओं में "राम" तथा "अज्ञात"
नाम से मेरे लेख प्रकाशित हुआ करते थे। लोग बड़े चाव से उन लेखों का पाठ
करते थे। मैंने किसी स्थान पर लेखन शैली का नियमपूर्वक अध्ययन न किया
था। बैठे-बैठे खाली समय में ही कुछ लिखा करता और प्रकाशनार्थ भेज दिया
करता था। अधिकतर बंगला तथा अंग्रेजी की पुस्तकों से अनुवाद करने का ही
विचार था। थोड़े समय के पश्चात् श्री अरविन्द घोष की बंगला पुस्तक "योगिक
साधन" का अनुवाद किया। दो-एक पुस्तक-प्रकाशकों को दिखाया पर वे बहुत
कम धन देकर पुस्तक लेना चाहते थे। आजकल के समय में हिन्दी के लेखकों
तथा अनुवादकों की अधिकता के कारण पुस्तक-प्रकाशकों को भी बड़ा अभिमान
हो गया है। बड़ी कठिनाई से बनारस के एक प्रकाशक ने "योगिक साधन"
स्वतंत्र जीवन 49
प्रकाशित करने का वचन दिया। पर थोड़े दिनों में वह स्वयं ही अपने साहित्य
मंदिर में ताला डालकर कहीं पधार गए। पुस्तक का अब तक कोई पता न लगा।
पुस्तक अति उत्तम थी। प्रकाशित हो जाने से हिन्दी साहित्य-सेवियों को अच्छा
लाभ होता। मेरे पास जो “बोलशेविक करतूत” तथा “मन की लहर” की प्रतियाँ
बची थीं, वे मैंने लागत से भी कम मूल्य पर कलकत्ता के एक व्यक्ति श्री
दीनानाथ सगतिया को दे दीं। वहुत थोड़ी पुस्तकें मैंने बेची थीं। दीनानाथ महाशय
पुस्तकें हड़प कर गए। मैंने नोटिस दिया। नालिश की। लगभग चार सौ रुपये की
डिग्री भी हुई, किन्तु दीनानाथ महाशय का कहीं पता न चला। वह कलकत्ता
छोड़कर पटना गए। पटना भी कई गरीबों का रुपया मारकर कहीं छिप गए।
अनुभव-हीनता' से इस प्रकार ठोकरें खानी पड़ीं। कोई पथ-प्रदर्शक तथा सहायक
नहीं था, जिससे परामर्श करता। व्यर्थ के उद्योग धंधों तथा स्वतंत्र कार्यों में शक्ति
का व्यय करता रहा।
पुनर्संगठन
जिन महानुभावों को मैं पूजनीय दृष्टि से देखता था, उन्हीं ने अपनी इच्छा
प्रकट की कि मैं क्रांतिकारी दल का पुनः संगठन करूँ। गत जीवन के अनुभव से
मेरा हृदय अत्यंत दुखी था। मेरा साहस न देखकर इन लोगों ने बहुत उत्साहित
किया और कहा कि हम आपको केवल निरीक्षण का कार्य देंगे, बाकी सब कार्य
स्वयं करेंगे। कुछ मनुष्य हमने पहले जुटा लिए हैं, धन की कमी न होगी, आदि।
मान्य पुरुषों की प्रवृत्ति देखकर मैंने भी स्वीकृति दे दी। मेरे पास जो अस्त्र-शस्त्र
थे, मैंने दिए। जो दल उन्होंने एकत्रित किया था, उसके नेता से मुझे मिलाया।
उसकी वीरता की बड़ी प्रशंसा की। वह एक अशिक्षित ग्रामीण पुरुष था। मेरी
समझ में आ गया कि यह बदमाशों का या स्वार्थी जनों का कोई संगठन है।
मुझसे उस दल के नेता ने दल का कार्य निरीक्षण करने की प्रार्थना की। दल में
कई फौज तथा लड़ाई पर से वापस किए गए व्यक्ति थे। मुझे इस प्रकार के
50 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
व्यक्तियों से कभी कोई काम न पड़ा था। मैं दो-एक महानुभावों को साथ ले इन
लोगों का कार्य देखने के लिए गया।
थोड़े दिनों बाद इस दल के नेता महाशय एक वैश्या को भी ले आए। उसे
रिवाल्वर दिखाया कि यदि कहीं गई तो गोली से मार दी जाएगी। यह समाचार
सुन उसी दल के दूसरे सदस्य बहुत नाराज़ हुए। और मेरे पास खबर भेजने का
प्रबंध किया। उसी समय एक दूसरा आदमी पकड़ा गया, जो नेता महाशय को
जानता था। नेता महाशय रिवाल्वर तथा कुछ सोने के आभूषणों-सहित गिरफ्तार
हो गए। उनकी वीरता की बड़ी प्रशंसा सुनी थी, जो इस प्रकार प्रकट हुई कि
कई आदमियों के नाम पुलिस को बताए और इक़बाल कर लिया। लगभग
तीस-चालीस आदमी पकड़े गए।
एक दूसरा व्यक्ति जो बहुत वीर था। पुलिस उसके पीछे पड़ी थी। एक दिन
पुलिस कप्तान ने सवार तथा तीस-चालीस बंदूक़ वाले सिपाही लेकर उसके घर में
उसे घेर लिया। उसने छत पर चढ़कर दो-नाली बंदूक़ से लगभग तीन सौ फ़ायर
किए। बंदूक़ गरम होकर गल गई। पुलिस वाले समझे कि घर में कई आदमी हैं।
सब पुलिस वाले छिपकर आड़ में से सुबह की प्रतीक्षा करने लगे। उसने मौका
पाया। मकान के पीछे से कूद पड़ा, एक सिपाही ने उसे देख लिया। उसने
सिपाही की नाक पर रिवाल्वर का कुंदा मारा। सिपाही चिल्लाया। सिपाही के
चिल्लाते ही मकान में से एक फ़ायर हुआ। पुलिस वालों ने समझा मकान ही में
है। सिपाही को धोखा हुआ होगा। बस, वह जंगल में निकल गया। जंगल में
जाकर एक दूसरे दल से मिला। जंगल में भी एक समय पुलिस कप्तान से सामना
हो गया। गोली चली। उसके भी पैर में छर्रे लगे थे। अब यह बड़े साहसी हो
गए थे। समझ गए थे कि पुलिसवाले किस प्रकार समय पर आड़ में छिप जाते
हैं। इन लोगों का दल छिन्न-भिन्न हो गया था। अतः उन्होंने मेरे पास आश्रय
लेना चाहा। मैंने बड़ी कठिनाई से अपना पीछा छुड़वाया। तत्पश्चात् जंगल में
जाकर ये दूसरे दल से मिल गए। वहाँ पर दुराचार के कारण जंगल के दल के
स्वतंत्र जीवन 51
नेता ने उन्हें गोली से मार दिया। उस नेता को भी समय पाकर उसके साथी ने
गोली से मार दिया। इस प्रकार सब दल छिन्न-भिन्न हो गया। जो पकड़े गए उन
पर कई डकैतियों के मुकदमे चले। किसी को तीस साल, किसी को पचास साल,
किसी को बीस साल की सज़ाएँ हुईं। एक बेचारा, जिसका किसी डकैती से कोई
संबंध न था, केवल शत्रुता के कारण फँसा दिया गया। उसे फाँसी हो गई और
जो सब प्रकार डकैतियों में सम्मिलित था, जिसके पास डकैती का माल तथा कुछ
हथियार पाए गए, पुलिस से गोली भी चली, उसे पहले फाँसी की सज़ा की आज्ञा
हुई, पर पैरवी अच्छी हुई, अतएव हाईकोर्ट से फाँसी की सज़ा माफ़ हो गई, केवल
पाँच वर्ष की सजा रह गई। जेल वालों से मिलकर उसने डकैतियों में शिनाख्त न
होने दी थी। इस प्रकार इस दल की समाप्ति हुई। भगवान की कृपा से हमारे
अस्त्र बच गए। केवल एक ही रिवाल्वर पकड़ा गया।
नोट बनाना
इसी बीच मेरे एक मित्र की एक नोट बनाने वाले महाशय से भेंट हुई।
उन्होंने बड़ी-बड़ी आशाएँ बाँधीं। बड़ी लंबी-लंबी स्कीम बाँधने के पश्चात् मुझसे
कहा कि एक नोट बनाने वाले से भेंट हुई है। बड़ा दक्ष पुरुष है। मुझे भी बना
हुआ नोट देखने की बड़ी तीव्र इच्छा थी। मैंने उन सज्जन के दर्शन की इच्छा
प्रकट की। जब उक्त नोट बनाने वाले महाशय मुझे मिले तो बड़ी-बड़ी बातें कीं।
मैंने कहा कि मैं स्थान तथा आर्थिक सहायता दूँगा, नोट बनाओ। जिस प्रकार
उन्होंने मुझसे कहा, मैंने सब प्रबंध कर दिया, किंतु मैंने कह दिया था कि नोट
बनाते समय मैं वहाँ उपस्थित रहूँगा, मुझे बताना कुछ मत, पर मैं नोट बनाने की
रीति अवश्य देखना चाहता हूँ। पहले-पहल उन्होंने दस रुपये का नोट बनाने का
निश्चय किया। मुझसे एक दस रुपये का नया साफ नोट मँगाया। नौ रुपये दवा
खरीदने के बहाने से ले गए। रात्रि में नोट बनाने का प्रबंध हुआ। दो शीशे
लाए। कुछ कागज भी लाए। दो-तीन शीशियों में कुछ दवाई थी। दवाइयों को
52 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
मिलाकर एक प्लेट में सादे कागज पानी में भिगोए। मैं जो साफ़ नोट लाया था,
उस पर एक सादा कागज लगाकर दोनों को दूसरी दवा डालकर धोया। फिर दो
सादे कागजों में लपेट एक पुड़िया-सी बनाई और अपने एक साथी को दी कि
उसे आग पर गरम कर लाए। आग वहाँ से कुछ दूर पर जलती थी। कुछ समय
तक वह आग पर गरम करता रहा और पुड़िया लाकर वापस दे दी। नोट बनाने
वाले ने पुड़िया खोलकर दोनों शीशों में दबाकर शीशों को दवा में धोया और
फीते से शीशों को बाँधकर रख दिया और कहा कि दो घंटे में नोट बन जाएगा।
शीशे रख दिए। बातचीत होने लगी। कहने लगा, "इस प्रयोग में बड़ा व्यय होता
है। छोटे-छोटे नोट बनाने से कोई लाभ नहीं। बड़े नोट बनाने चाहिए, जिससे
पर्याप्त धन की प्राप्ति हो।" इस प्रकार मुझे भी सिखा देने का वचन दिया। मुझे
कुछ कार्य था। मैं जाने लगा तो वह भी चला गया। दो घंटे के बाद आने का
निश्चय हुआ।
मैं विचारने लगा कि किस प्रकार एक नोट के ऊपर दूसरा सादा कागज
रखने से नोट बन जाएगा। मैंने प्रेस का काम सीखा था। थोड़ी बहुत फ़ोटोग्राफी
भी जानता था। साइंस (विज्ञान) का भी अध्ययन किया था। कुछ समझ में न
आया कि नोट सीधा कैसे छपेगा। सबसे बड़ी बात यह थी कि नंबर कैसे छपेंगे।
मुझे बड़ा भारी संदेह हुआ। दो घंटे बाद मैं जब गया तो रिवाल्वर भरकर जेब में
डालकर ले गया। यथासमय वह महाशय आए। उन्होंने शीशे खोलकर कागज
निकालकर उन्हें फिर एक दवा से धोया। अब दोनों कागज खोले। एक मेरा
लाया हुआ नोट और दूसरा एक दस रुपये का नोट उसी के ऊपर से उतारकर
सुखाया। कहा- "कितना साफ़ नोट है।" मैंने हाथ में लेकर देखा। दोनों नोटों
के नंबर मिलाए। नंबर नितांत भिन्न-भिन्न थे। मैंने जेब से रिवाल्वर निकाल नोट
बनाने वाले महाशय की छाती पर रख, कहा, "बदमाश ! इस तरह ठगता फिरता
है ?" वह काँपकर गिर पड़ा ! मैंने उसको उसकी मूर्खता समझाई कि यह ढोंग
गाँववासियों के सामने चल सकता है, अनजान पढ़े-लिखे भी धोखे में आ सकते
हैं। किन्तु तू मुझे धोखा देने आया है। अंत में मैंने उससे प्रतिज्ञा-पत्र लिखाकर,
स्वतंत्र जीवन 53
उस पर उसके हाथों की दसों अंगुलियों के निशान लगवाए कि वह ऐसा काम
फिर नहीं करेगा। दसों अंगुलियों के निशान देने में उसने कुछ ढील की। मैंने
रिवाल्वर उठाकर कहा कि गोली चलती है, उसने तुरंत दसों अंगुलियों के निशान
बना दिए। बुरी तरह काँप रहा था। मेरे उन्नीस रुपये खर्च हो चुके थे। मैंने
दोनों नोट रख लिए और शीशे, दवाएँ आदि सब छीन लिए कि मित्रों को तमाशा
दिखाऊँगा। तत्पश्चात् उन महाशय को विदा किया। उसने किया यह था कि जब
अपने साथी को आग पर गरम करने के लिए कागज की पुड़िया दी थी, उसी
समय वह साथी सादे कागज की पुड़िया बदलकर दूसरी पुड़िया ले आया जिसमें
दोनों नोट थे। इस प्रकार नोट बन गया।
इस प्रकार का एक बड़ा भारी दल है, जो सारे भारत में ठगी का काम
करके हज़ारों रुपये पैदा करता है। मैं एक सज्जन को जानता हूँ जिन्होंने इसी
प्रकार पचास हज़ार से अधिक रुपये पैदा किए हैं। होता यह है कि ये लोग
अपने एजेंट रखते हैं। वे एजेंट साधारण पुरुषों के पास जाकर नोट बनाने की
कथा कहते हैं। आता धन किसे बुरा लगता है ? वे नोट बनवाते हैं। इस
प्रकार पहले दस का नोट बनाकर दिया, वे बाज़ार में बेच आए। सौ रुपये का
बनाकर दिया वह भी बाज़ार में चलाया, और चल क्यों न जाए ? इस प्रकार
के सब नोट असली होते हैं। वे तो केवल चाल से रख दिए जाते हैं। इसके
बाद कहा कि हज़ार या पाँच सौ का नोट लाओ तो कुछ धन भी मिले।
जैसे-तैसे करके बेचारा एक हज़ार का नोट लाया। सादा कागज रखकर शीशे में
बाँध दिया। हज़ार का नोट जेब में रखा और चंपत हुए। नोट के मालिक
रास्ता देखते हैं, वहाँ नोट बनाने वालों का पता ही नहीं। अंत में विवश हो
शीशों को खोला जाता है, तो दो सादे कागजों के अलावा कुछ नहीं मिलता।
वे अपने सिर पर हाथ मारकर रह जाते हैं। इस डर से कि यदि पुलिस को
मालूम हो गया तो और लेने के देने पड़ेंगे, किसी से कुछ कह भी नहीं सकते।
कलेजा मसोसकर रह जाते हैं। पुलिस ने इस प्रकार के कुछ अभियुक्तों को
Uploaded By Rajesh Tanti.
54 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
गिरफ्तार भी किया, किंतु ये लोग पुलिस को नियमपूर्वक चौथ देते रहते हैं और
इस कारण बचे रहते हैं।
चालबाजी
कई महानुभावों ने गुप्त समिति के नियम आदि बनाकर मुझे दिखाए। उनमें
एक नियम यह भी था कि जो व्यक्ति समिति का कार्य करें, उन्हें समिति की
ओर से कुछ मासिक दिया जाए। मैंने इस नियम को अनिवार्य रूप में मानना
अस्वीकार किया। मैं यहाँ तक सहमत था कि जो व्यक्ति समिति के कार्य में
अपना सारा समय व्यतीत करें, उनको केवल गुजारा-मात्र समिति की ओर से
दिया जा सकता है। जो लोग कोई व्यवस्था करते हैं, उन्हें किसी प्रकार का
मासिक भत्ता देना उचित न होगा। जिन्हें समिति के कोष में से कुछ दिया जाए,
उनको भी कुछ व्यवसाय करने का प्रबंध करना उचित है, ताकि ये लोग पूर्णतः
समिति की सहायता पर निर्भर रहकर निरे भाड़े के टट्टू न बन जाएँ। भाड़े के
टट्टुओं से समिति का कार्य लेना, जिसमें कतिपय मनुष्यों के प्राणों का उत्तरदायित्व
हो और थोड़ा-सा भेद खुलने से ही बड़ा भयंकर परिणाम हो सकता है, उचित
नहीं है। तत्पश्चात् उन महानुभावों की राय हुई कि एक निश्चित कोष समिति के
सदस्यों को देने के लिए स्थापित किया जाए, जिसकी आय का ब्यौरा इस प्रकार
हो कि डकैतियों से जितना धन प्राप्त हो उसका आधा समिति के कार्यों में व्यय
किया जाए और आधा समिति के सदस्यों को बराबर-बराबर बाँट दिया जाए। इस
प्रकार परामर्श से मैं सहमत न हो सका और मैंने इस प्रकार की गुप्त समिति में,
जिसका एक उद्देश्य पेट-पूर्ति हो, योग देने से इन्कार कर दिया। जब मेरी इस
प्रकार की दृष्टि देखी तो उन महानुभावों ने आपस में षड्यंत्र रचा।
जब मैंने उन महानुभावों की राय और उनके नियमों को स्वीकार न किया
तो वे चुप हो गए। मैं भी कुछ समझ न सका कि जो लोग मुझमें इतनी श्रद्धा
रखते थे, जिन्होंने कई प्रकार की आशाएँ देखकर मुझसे क्रांतिकारी दल का
स्वतंत्र जीवन 55
पुनर्संगठन करने की प्रार्थनाएँ की थीं, अनेक प्रकार की उम्मीदें बँधाई थीं, सब
कार्य स्वयं करने के वचन दिए थे, वे लोग ही मुझसे इस प्रकार के नियम बनाने
की माँग करने लगे। मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ। प्रथम प्रयत्न में, जिस समय मैं
मैनपुरी षड्यंत्र के सदस्यों सहित कार्य करता था, उस समय हममें से कोई भी
अपने व्यक्तिगत (प्राइवेट) खर्च में समिति का धन व्यय करना पूर्ण पाप समझता
था। जहाँ तक हो सकता अपने खर्च के लिए माता-पिता से कुछ लाकर प्रत्येक
सदस्य समिति के कार्यों में धन व्यय किया करता था। इस कारण मेरा साहस
इस प्रकार के नियमों में सहमत होने का न हो सका। मैंने विचार किया कि यदि
कोई समय आया और किसी प्रकार अधिक धन प्राप्त हुआ, तो कुछ सदस्य ऐसे
स्वार्थी हो सकते हैं, जो अधिक धन लेने की इच्छा करें, और आपस में शत्रुता
बढ़े। उसके परिणाम बड़े भयंकर हो सकते हैं। अतः इस प्रकार के कार्य में योग
देना मैंने उचित न समझा।
मेरी यह अवस्था देख इन लोगों ने आपस में षड्यंत्र रचा, कि जिस प्रकार
मैं कहूँ वे नियम स्वीकार कर लें और विश्वास दिलाकर जितने अस्त्र-शस्त्र मेरे
पास हों, उनको मुझसे लेकर सब पर अपना कब्ज़ा जमा लें। यदि अस्त्र-शस्त्र
माँगूँ तो मुझसे युद्ध किया जाए, और आवश्यकता पड़े तो मुझे कहीं लेजाकर
जान से मार दिया जाए। तीन सज्जनों ने इस प्रकार का षड्यंत्र रचा और मुझसे
चालबाज़ी करनी चाही। भगवान की कृपा से उनमें से एक सदस्य के मन में कुछ
दया आ गई। उसने आकर मुझसे सब भेद कह दिया। मुझे सुनकर बड़ा खेद
हुआ कि जिन व्यक्तियों को मैं पिता तुल्य मानकर श्रद्धा करता हूँ, वे ही मेरे
नाश करने के लिए इस प्रकार नीचता का कार्य करने को तैयार हैं। मैं सँभल
गया। मैं उन लोगों से सतर्क रहने लगा कि पुनः प्रयाग जैसी घटना न घटे। जिन
महाशय ने मुझसे भेद कहा था, उनकी उत्कट इच्छा थी कि वह एक रिवाल्वर
रखें और इस इच्छा-पूर्ति के लिए उन्होंने मेरा विश्वासपात्र बनने के कारण मुझसे
भेद कहा था। मुझसे एक रिवाल्वर माँगा कि मैं उन्हें कुछ समय के लिए रिवाल्वर
दे दूँ। यदि मैं उन्हें रिवाल्वर दे देता तो उसे वह हजम कर जाते। मैं कर ही