रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)
Autobiography of Ram Prasad Bismil
पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंस्वदेश-प्रेम 45
पूड़ी लाने वाले पर गोली चलाई। ब्रह्मचारी जी का गोली चलाना था कि चारों
ओर से गोली चलने लगीं। पुलिस छिपी हुई थी। गोली चलने से ब्रह्मचारी जी को
कई गोलियाँ लगीं। तमाम शरीर घायल हो गया। पं. गेंदालालजी की आँख में
एक छर्रा लगा। बाईं आँख जाती रही। कुछ आदमी जहर के कारण मरे, कुछ
गोली से मारे गए। इस प्रकार 80 आदमियों में से 25-30 जान से मारे गए। सब
पकड़ कर ग्वालियर के किले में बंद कर दिए गए। किले में हम लोग जब पंडित
जी से मिले, तब चिट्ठी भेजकर उन्होंने हमको सब हाल बताया। एक दिन किले
में हम लोगों पर भी संदेह हो गया था, बड़ी कठिनता से एक अधिकारी की
सहायता से हम लोग निकल सके।
जब मैनपुरी षड्यंत्र का अभियोग चला, पंडित गेंदालालजी को सरकार ने
ग्वालियर राज्य से मँगाया। ग्वालियर के किले का जलवायु बड़ा ही हानिकारक
था। पंडितजी को क्षय (टी.बी.) रोग हो गया था। मैनपुरी स्टेशन से जेल जाते
समय ग्यारह बार रास्ते में बैठकर, जेल पहुँचे। पुलिस ने जब हाल पूछा तो उन्होंने
कहा- "बालकों को क्यों गिरफ्तार किया है ? मैं हाल बताऊँगा।" पुलिस को
विश्वास हो गया। आपको जेल से निकालकर दूसरे सरकारी गवाहों के निकट रख
दिया। वहाँ पर सब विवरण जान रात्रि के समय एक और सरकारी गवाह को
लेकर पंडितजी भाग खड़े हुए। भागकर एक गाँव में एक कोठरी में ठहरे। साथी
कुछ काम के लिए बाजार गया था। पंडितजी उसी कोठरी में तीन दिन बिना
अन्न-जल बंद रहे। समझे कि साथी किसी आपत्ति में फँस गया होगा, अंत में
किसी प्रकार जंजीर खुलवाई। रुपये वह सब साथ ही ले गया था। पास एक पैसा
भी न था। कोटा से पैदल आगरा आए। किसी प्रकार अपने घर पहुँचे। बहुत
बीमार थे। पिता ने यह समझकर कि घरवालों पर आपत्ति न आए, पुलिस को
सूचना देनी चाही। पंडितजी ने पिता से बड़ी विनय-प्रार्थना की और दो-तीन दिन
में घर छोड़ दिया। हम लोगों की बहुत खोज की। किसी का कुछ पता न पा
दिल्ली में एक प्याऊ पर पानी पिलाने की नौकरी कर ली। अवस्था दिनों-दिन