रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)
Autobiography of Ram Prasad Bismil
पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंस्वतंत्र जीवन 55
पुनर्संगठन करने की प्रार्थनाएँ की थीं, अनेक प्रकार की उम्मीदें बँधाई थीं, सब
कार्य स्वयं करने के वचन दिए थे, वे लोग ही मुझसे इस प्रकार के नियम बनाने
की माँग करने लगे। मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ। प्रथम प्रयत्न में, जिस समय मैं
मैनपुरी षड्यंत्र के सदस्यों सहित कार्य करता था, उस समय हममें से कोई भी
अपने व्यक्तिगत (प्राइवेट) खर्च में समिति का धन व्यय करना पूर्ण पाप समझता
था। जहाँ तक हो सकता अपने खर्च के लिए माता-पिता से कुछ लाकर प्रत्येक
सदस्य समिति के कार्यों में धन व्यय किया करता था। इस कारण मेरा साहस
इस प्रकार के नियमों में सहमत होने का न हो सका। मैंने विचार किया कि यदि
कोई समय आया और किसी प्रकार अधिक धन प्राप्त हुआ, तो कुछ सदस्य ऐसे
स्वार्थी हो सकते हैं, जो अधिक धन लेने की इच्छा करें, और आपस में शत्रुता
बढ़े। उसके परिणाम बड़े भयंकर हो सकते हैं। अतः इस प्रकार के कार्य में योग
देना मैंने उचित न समझा।
मेरी यह अवस्था देख इन लोगों ने आपस में षड्यंत्र रचा, कि जिस प्रकार
मैं कहूँ वे नियम स्वीकार कर लें और विश्वास दिलाकर जितने अस्त्र-शस्त्र मेरे
पास हों, उनको मुझसे लेकर सब पर अपना कब्ज़ा जमा लें। यदि अस्त्र-शस्त्र
माँगूँ तो मुझसे युद्ध किया जाए, और आवश्यकता पड़े तो मुझे कहीं लेजाकर
जान से मार दिया जाए। तीन सज्जनों ने इस प्रकार का षड्यंत्र रचा और मुझसे
चालबाज़ी करनी चाही। भगवान की कृपा से उनमें से एक सदस्य के मन में कुछ
दया आ गई। उसने आकर मुझसे सब भेद कह दिया। मुझे सुनकर बड़ा खेद
हुआ कि जिन व्यक्तियों को मैं पिता तुल्य मानकर श्रद्धा करता हूँ, वे ही मेरे
नाश करने के लिए इस प्रकार नीचता का कार्य करने को तैयार हैं। मैं सँभल
गया। मैं उन लोगों से सतर्क रहने लगा कि पुनः प्रयाग जैसी घटना न घटे। जिन
महाशय ने मुझसे भेद कहा था, उनकी उत्कट इच्छा थी कि वह एक रिवाल्वर
रखें और इस इच्छा-पूर्ति के लिए उन्होंने मेरा विश्वासपात्र बनने के कारण मुझसे
भेद कहा था। मुझसे एक रिवाल्वर माँगा कि मैं उन्हें कुछ समय के लिए रिवाल्वर
दे दूँ। यदि मैं उन्हें रिवाल्वर दे देता तो उसे वह हजम कर जाते। मैं कर ही