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रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)

रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)

Autobiography of Ram Prasad Bismil

पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

पृष्ठ 50, कुल 128 में से

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38 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
के उत्सव पर मैं शाहजहाँपुर की सेवा-समिति के साथ अपनी एम्बुलेंस की टोली
लेकर गया था। एम्बुलेंस वालों को प्रत्येक स्थान पर बिना रोक जाने की आज्ञा
थी। अधिवेशन पंडाल के बाहर खुले रूप में नवयुवक यह कह कर पुस्तक बेच
रहे थे- “यू.पी. में जब्त किताब “अमेरिका को स्वाधीनता कैसे मिली”।”
खुफिया पुलिस वालों ने कांग्रेस का कैम्प घेर लिया। सामने ही आर्यसमाज का
कैम्प था। वहाँ पर पुलिस ने पुस्तक विक्रेताओं की तलाशी लेनी आरंभ कर दी।
मैंने कांग्रेस कैम्प पर अपने स्वयंसेवक इसलिए छोड़ दिए कि वे बिना स्वागत
समिति के मंत्री या प्रधान की आज्ञा पाए किसी पुलिस वाले को कैम्प में न
घुसने दें। आर्यसमाज के कैम्प में गया। सब पुस्तकें एक टेंट में जमा थीं। मैंने
अपने ओवरकोट में सब पुस्तकें लपेटीं, जो लगभग दो सौ होंगी और उन्हें कंधे
पर डालकर पुलिस वालों के सामने से निकला। मैं वर्दी पहने था, टोप लगाए हुए
था। एम्बुलेंस का बड़ा-सा लाल बिल्ला मेरे हाथ पर लगा हुआ था, किसी ने कोई
सन्देह भी न किया और पुस्तकें बच गईं।
दिल्ली कांग्रेस से लौटकर शाहजहाँपुर आए। वहाँ भी पकड़-धकड़ शुरु हुई।
हम लोग वहाँ से चलकर दूसरे शहर के एक मकान में ठहरे हुए थे। रात्रि के
समय मकान मालिक ने बाहर से मकान में ताला लगा दिया। ग्यारह बजे के
लगभग हमारा एक साथी बाहर से आया। उसने बाहर से ताला पड़ा देख पुकारा।
हम लोगों को भी संदेह हुआ। सबके सब दीवार पर से उतर कर मकान छोड़कर
चल दिए। अंधेरी रात थी। थोड़ी दूर गए थे कि जोर की आवाज़ आई, “खड़े
हो जाओ कौन जाता है ?” हम लोग सात-आठ थे। समझे कि घिर गए। कदम
उठाना ही चाहते थें कि फिर आवाज़ आई, “खड़े हो जाओ, नहीं तो गोली मारते
हैं।” हम लोग खड़े हो गए। थोड़ी देर में एक पुलिस के दारोगा बंदूक हमारी
तरफ किए हुए, रिवाल्वर कंधे में लटकाए, कई सिपाहियों को लिए हुए आ
पहुँचे। पूछा- “कौन हो ? कहाँ जाते हो ?” हम लोगों ने कहा- “विद्यार्थी हैं,
स्टेशन जाते हैं।” “कहाँ जाओगे ?” “लखनऊ।” उस समय रात के दो बजे थे।