रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)
Autobiography of Ram Prasad Bismil
पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
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गिरफ्तार भी किया, किंतु ये लोग पुलिस को नियमपूर्वक चौथ देते रहते हैं और
इस कारण बचे रहते हैं।
चालबाजी
कई महानुभावों ने गुप्त समिति के नियम आदि बनाकर मुझे दिखाए। उनमें
एक नियम यह भी था कि जो व्यक्ति समिति का कार्य करें, उन्हें समिति की
ओर से कुछ मासिक दिया जाए। मैंने इस नियम को अनिवार्य रूप में मानना
अस्वीकार किया। मैं यहाँ तक सहमत था कि जो व्यक्ति समिति के कार्य में
अपना सारा समय व्यतीत करें, उनको केवल गुजारा-मात्र समिति की ओर से
दिया जा सकता है। जो लोग कोई व्यवस्था करते हैं, उन्हें किसी प्रकार का
मासिक भत्ता देना उचित न होगा। जिन्हें समिति के कोष में से कुछ दिया जाए,
उनको भी कुछ व्यवसाय करने का प्रबंध करना उचित है, ताकि ये लोग पूर्णतः
समिति की सहायता पर निर्भर रहकर निरे भाड़े के टट्टू न बन जाएँ। भाड़े के
टट्टुओं से समिति का कार्य लेना, जिसमें कतिपय मनुष्यों के प्राणों का उत्तरदायित्व
हो और थोड़ा-सा भेद खुलने से ही बड़ा भयंकर परिणाम हो सकता है, उचित
नहीं है। तत्पश्चात् उन महानुभावों की राय हुई कि एक निश्चित कोष समिति के
सदस्यों को देने के लिए स्थापित किया जाए, जिसकी आय का ब्यौरा इस प्रकार
हो कि डकैतियों से जितना धन प्राप्त हो उसका आधा समिति के कार्यों में व्यय
किया जाए और आधा समिति के सदस्यों को बराबर-बराबर बाँट दिया जाए। इस
प्रकार परामर्श से मैं सहमत न हो सका और मैंने इस प्रकार की गुप्त समिति में,
जिसका एक उद्देश्य पेट-पूर्ति हो, योग देने से इन्कार कर दिया। जब मेरी इस
प्रकार की दृष्टि देखी तो उन महानुभावों ने आपस में षड्यंत्र रचा।
जब मैंने उन महानुभावों की राय और उनके नियमों को स्वीकार न किया
तो वे चुप हो गए। मैं भी कुछ समझ न सका कि जो लोग मुझमें इतनी श्रद्धा
रखते थे, जिन्होंने कई प्रकार की आशाएँ देखकर मुझसे क्रांतिकारी दल का