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रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)

रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)

Autobiography of Ram Prasad Bismil

पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

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40 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
गया था। फिर भी उन्होंने यह कार्य किया। मैं भी सामना करने को प्रस्तुत हुआ।
तीसरा फायर करके वह भाग खड़े हुए। उनके साथ प्रयाग में ठहरे हुए दो सदस्य
और भी थे। वे तीनों भाग गए। मुझे देर इसलिए हुई कि मेरा रिवाल्वर चमड़े के
खोल में रखा था। यदि आधा मिनट और उनमें कोई भी खड़ा रह जाता तो मेरी
गोली का निशाना बन जाता। जब सब भाग गए, तब मैं गोली चलाना व्यर्थ
जान, वहाँ से चला आया। मैं बाल-बाल बच गया। मुझसे दो गज के फासले पर
से माउजर पिस्तौल से गोलियाँ चलाई गईं और उस अवस्था में जबकि मैं बैठा
हुआ था। मेरी समझ में नहीं आया कि मैं बच कैसे गया। पहला कारतूस फटा
नहीं। तीन फायर हुए। मैं गद्गद् होकर परमात्मा को स्मरण करने लगा। खुशी में
मुझे मूर्छा आ गई। मेरे हाथ से रिवाल्वर तथा खोल दोनों गिर गए। यदि उस
समय कोई निकट होता तो मुझे आराम से मार सकता था। मेरी यह दशा
लगभग एक मिनट तक रही होगी कि मुझसे किसी ने कहा, “उठ!” मैं उठा।
रिवाल्वर उठा लिया। खोल उठाने का स्मरण ही न रहा। 22 जनवरी की घटना
है। मैं केवल एक कोट और एक तहमद पहने था। बाल बढ़ रहे थे। नंगे सिर,
पैर में जूता भी नहीं। ऐसी हालत में कहाँ जाऊँ ? अनेक विचार उठ रहे थे।
इन्हीं विचारों में डूबा यमुना-तट पर बड़ी देर तक घूमता रहा। ध्यान आया
कि धर्मशाला चलकर ताला तोड़ सामान निकाल लूँ। फिर सोचा कि धर्मशाला
जाने से गोली चलेगी, व्यर्थ में खून होगा। अभी ठीक नहीं। अकेले बदला लेना
उचित नहीं। और कुछ साथियों को लेकर फिर बदला लिया जाएगा। मेरे एक
साधारण मित्र प्रयाग में रहते थे। उनके पास जाकर बड़ी मुश्किल से एक चादर
ली और रेल से लखनऊ आया। लखनऊ आकर बाल बनवाए। धोती-जूता खरीदे,
क्योंकि मेरे पास रुपये थे। रुपये न भी होते तो भी मैं सदैव जो चालीस-पचास
रुपये की सोने की अंगूठी पहने रहता था, उसे काम में ला सकता था। वहाँ से
आकर अन्य सदस्यों से मिलकर सब विवरण कह सुनाया। कुछ दिन जंगल में
रहा। इच्छा थी कि संन्यासी हो जाऊँ। संसार कुछ नहीं। बाद में फिर माताजी के