रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)
Autobiography of Ram Prasad Bismil
पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें50 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
व्यक्तियों से कभी कोई काम न पड़ा था। मैं दो-एक महानुभावों को साथ ले इन
लोगों का कार्य देखने के लिए गया।
थोड़े दिनों बाद इस दल के नेता महाशय एक वैश्या को भी ले आए। उसे
रिवाल्वर दिखाया कि यदि कहीं गई तो गोली से मार दी जाएगी। यह समाचार
सुन उसी दल के दूसरे सदस्य बहुत नाराज़ हुए। और मेरे पास खबर भेजने का
प्रबंध किया। उसी समय एक दूसरा आदमी पकड़ा गया, जो नेता महाशय को
जानता था। नेता महाशय रिवाल्वर तथा कुछ सोने के आभूषणों-सहित गिरफ्तार
हो गए। उनकी वीरता की बड़ी प्रशंसा सुनी थी, जो इस प्रकार प्रकट हुई कि
कई आदमियों के नाम पुलिस को बताए और इक़बाल कर लिया। लगभग
तीस-चालीस आदमी पकड़े गए।
एक दूसरा व्यक्ति जो बहुत वीर था। पुलिस उसके पीछे पड़ी थी। एक दिन
पुलिस कप्तान ने सवार तथा तीस-चालीस बंदूक़ वाले सिपाही लेकर उसके घर में
उसे घेर लिया। उसने छत पर चढ़कर दो-नाली बंदूक़ से लगभग तीन सौ फ़ायर
किए। बंदूक़ गरम होकर गल गई। पुलिस वाले समझे कि घर में कई आदमी हैं।
सब पुलिस वाले छिपकर आड़ में से सुबह की प्रतीक्षा करने लगे। उसने मौका
पाया। मकान के पीछे से कूद पड़ा, एक सिपाही ने उसे देख लिया। उसने
सिपाही की नाक पर रिवाल्वर का कुंदा मारा। सिपाही चिल्लाया। सिपाही के
चिल्लाते ही मकान में से एक फ़ायर हुआ। पुलिस वालों ने समझा मकान ही में
है। सिपाही को धोखा हुआ होगा। बस, वह जंगल में निकल गया। जंगल में
जाकर एक दूसरे दल से मिला। जंगल में भी एक समय पुलिस कप्तान से सामना
हो गया। गोली चली। उसके भी पैर में छर्रे लगे थे। अब यह बड़े साहसी हो
गए थे। समझ गए थे कि पुलिसवाले किस प्रकार समय पर आड़ में छिप जाते
हैं। इन लोगों का दल छिन्न-भिन्न हो गया था। अतः उन्होंने मेरे पास आश्रय
लेना चाहा। मैंने बड़ी कठिनाई से अपना पीछा छुड़वाया। तत्पश्चात् जंगल में
जाकर ये दूसरे दल से मिल गए। वहाँ पर दुराचार के कारण जंगल के दल के