रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)
Autobiography of Ram Prasad Bismil
पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंस्वतंत्र जीवन 51
नेता ने उन्हें गोली से मार दिया। उस नेता को भी समय पाकर उसके साथी ने
गोली से मार दिया। इस प्रकार सब दल छिन्न-भिन्न हो गया। जो पकड़े गए उन
पर कई डकैतियों के मुकदमे चले। किसी को तीस साल, किसी को पचास साल,
किसी को बीस साल की सज़ाएँ हुईं। एक बेचारा, जिसका किसी डकैती से कोई
संबंध न था, केवल शत्रुता के कारण फँसा दिया गया। उसे फाँसी हो गई और
जो सब प्रकार डकैतियों में सम्मिलित था, जिसके पास डकैती का माल तथा कुछ
हथियार पाए गए, पुलिस से गोली भी चली, उसे पहले फाँसी की सज़ा की आज्ञा
हुई, पर पैरवी अच्छी हुई, अतएव हाईकोर्ट से फाँसी की सज़ा माफ़ हो गई, केवल
पाँच वर्ष की सजा रह गई। जेल वालों से मिलकर उसने डकैतियों में शिनाख्त न
होने दी थी। इस प्रकार इस दल की समाप्ति हुई। भगवान की कृपा से हमारे
अस्त्र बच गए। केवल एक ही रिवाल्वर पकड़ा गया।
नोट बनाना
इसी बीच मेरे एक मित्र की एक नोट बनाने वाले महाशय से भेंट हुई।
उन्होंने बड़ी-बड़ी आशाएँ बाँधीं। बड़ी लंबी-लंबी स्कीम बाँधने के पश्चात् मुझसे
कहा कि एक नोट बनाने वाले से भेंट हुई है। बड़ा दक्ष पुरुष है। मुझे भी बना
हुआ नोट देखने की बड़ी तीव्र इच्छा थी। मैंने उन सज्जन के दर्शन की इच्छा
प्रकट की। जब उक्त नोट बनाने वाले महाशय मुझे मिले तो बड़ी-बड़ी बातें कीं।
मैंने कहा कि मैं स्थान तथा आर्थिक सहायता दूँगा, नोट बनाओ। जिस प्रकार
उन्होंने मुझसे कहा, मैंने सब प्रबंध कर दिया, किंतु मैंने कह दिया था कि नोट
बनाते समय मैं वहाँ उपस्थित रहूँगा, मुझे बताना कुछ मत, पर मैं नोट बनाने की
रीति अवश्य देखना चाहता हूँ। पहले-पहल उन्होंने दस रुपये का नोट बनाने का
निश्चय किया। मुझसे एक दस रुपये का नया साफ नोट मँगाया। नौ रुपये दवा
खरीदने के बहाने से ले गए। रात्रि में नोट बनाने का प्रबंध हुआ। दो शीशे
लाए। कुछ कागज भी लाए। दो-तीन शीशियों में कुछ दवाई थी। दवाइयों को