रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)
Autobiography of Ram Prasad Bismil
पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंस्वदेश-प्रेम 41
पास गया। उन्हें सब कह सुनाया। उन्होंने मुझे ग्वालियर जाने का आदेश दिया।
थोड़े दिनों में माता-पिता सभी दादीजी के भाई के यहाँ आ गए। मैं भी वहाँ
पहुँच गया।
मैं हर वक्त यही विचार किया करता कि मुझे बदला अवश्य लेना चाहिए।
एक दिन प्रतिज्ञा करके रिवाल्वर लेकर शत्रु की हत्या करने की इच्छा से गया भी,
किन्तु सफलता न मिली। इसी प्रकार की उधेड़बुन में मुझे ज्वर आने लगा। कई
महीनों तक बीमार रहा। माताजी मेरे विचारों को समझ गई। माताजी ने बड़ी
तसल्ली दी। कहने लगीं कि, प्रतिज्ञा करो कि तुम अपनी हत्या की चेष्टा करने
वालों को जान से न मारोगे। मैंने प्रतिज्ञा करने में आनाकानी की, तो वह कहने
लगीं कि मैं मातृऋण के बदले में प्रतिज्ञा कराती हूँ, क्या जवाब है ? मैंने कहा-
“मैं उनसे बदला लेने की प्रतिज्ञा कर चुका हूँ।” माताजी ने मुझे बाध्य कर मेरी
प्रतिज्ञा भंग करवाई। अपनी बात पक्की रखी। मुझे ही सिर नीचा करना पड़ा।
उस दिन से मेरा ज्वर कम होने लगा और मैं अच्छा हो गया।
भाग जाने की दशा
मैं गाँव में गाँववासियों की भाँति उसी प्रकार के कपड़े पहनकर रहने लगा।
खेती भी करने लगा। देखने वाले अधिक-से-अधिक इतना समझ सकते थे कि मैं
शहर में रहा हूँ, सम्भव है कुछ पढ़ा भी होऊँ। खेती के कामों में मैंने विशेष
ध्यान दिया। शरीर तो हृष्ट-पुष्ट था ही, थोड़े ही दिनों में अच्छा-खासा किसान
बन गया। उस कठोर भूमि में खेती करना कोई सरल काम नहीं। बबूल, नीम के
अतिरिक्त कोई एक-दो आम के वृक्ष कहीं भले ही दिखाई दे जाएँ। बाकी वह
नितांत मरुभूमि (रेगिस्तान) है। खेत में जाता था। थोड़ी देर में ही झरबेरी के
काँटों से पैर भर जाते। पहले-पहले तो बड़ा कष्ट प्रतीत हुआ। कुछ समय बाद
अभ्यास हो गया। जितना खेत उस क्षेत्र का एक बलिष्ठ पुरुष दिन-भर में जोत
सकता था, उतना मैं भी जोत लेता था। मेरा चेहरा बिल्कुल काला पड़ गया।