रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)
Autobiography of Ram Prasad Bismil
पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें42 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
थोड़े दिनों के लिए मैं शाहजहाँपुर की ओर घूमने आया तो कुछ लोग मुझे
पहचान भी न सके। मैं रात को शाहजहाँपुर पहुँचा। गाड़ी छूट गई। दिन के
समय पैदल जा रहा था कि एक पुलिस वाले ने पहचान लिया। वह और पुलिस
वालों को लेने के लिए गया। मैं भागा, पहले दिन का ही थका हुआ था। लगभग
बीस मील पहले दिन पैदल चला था। उस दिन भी पैतीस मील पैदल चलना
पड़ा।
मेरे माता-पिता ने सहायता की। मेरा समय अच्छी प्रकार व्यतीत हो गया।
माताजी की पूँजी तो मैंने नष्ट कर दी। पिताजी से सरकार की ओर से कहा गया
कि लड़के की गिरफ्तारी वारंट की पूर्ति के लिए लड़के का हिस्सा, जो उसके दादा
की जायदाद होगी, नीलाम किया जाएगा। पिताजी घबराकर दो हजार रुपये का
मकान आठ सौ में तथा और दूसरी चीजें भी थोड़े दामों में बेचकर शाहजहाँपुर
छोड़कर भाग गए। दो बहनों का विवाह हुआ। जो कुछ रहा-बचा था, वह भी
व्यय हो गया। माता-पिता की हालत फिर निर्धनों-जैसी हो गई। समिति के जो
दूसरे सदस्य भागे हुए थे उनकी बहुत बुरी दशा हुई। महीनों चनों पर ही समय
काटना पड़ा। दो-चार रुपये जो मित्रों तथा सहायकों से मिल जाते थे, उन्हीं पर
गुजर होता था। पहनने के कपड़े तक न थे। विवश होकर रिवाल्वर तथा बंदूकें
बेचीं, तब दिन कटे। किसी से कुछ कह भी न सकते थे और गिरफ्तारी के भय
के कारण कोई प्रबंध या नौकरी भी न कर सकते थे।
उसी दशा में मुझे व्यवसाय करने की सूझी। मैंने अपने सहपाठी तथा मित्र
श्री सुशील चंद्र सेन, जिनका देहांत हो चुका था, की स्मृति में बंगला भाषा का
अध्ययन किया। मेरे छोटे भाई का जन्म हुआ तो मैंने उसका नाम सुशील चंद
रखा। मैंने विचारा कि एक पुस्तकमाला निकालूँ। लाभ भी होगा। कार्य भी सरल
है। बंगला से हिन्दी में पुस्तकों का अनुवाद करके प्रकाशित करवाऊँगा। अनुभव
कुछ भी नहीं था। बंगला पुस्तक "निहिलिस्ट रहस्य" का अनुवाद प्रारंभ कर
दिया। जिस प्रकार अनुवाद किया, उसका स्मरण कर कई बार हँसी आ जाती है।