रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)
Autobiography of Ram Prasad Bismil
पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA), काकोरी एक्शन व गिरफ्तारी
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कार्यकर्त्ताओं की दुर्दशा
इस समय समिति के सदस्यों की बड़ी दुर्दशा थी। चने मिलना भी कठिन
था। सब पर कुछ-न-कुछ कर्ज हो गया था। किसी के पास साबुत कपड़े तक न
थे। कुछ विद्यार्थी वनकर धार्मिक स्थानों तक में भोजन कर आते थे। चार-पाँच
ने अपने-अपने केन्द्र त्याग दिए। पाँच सौ से अधिक रुपये मैं कर्ज़ लेकर व्यय
कर चुका था। यह दुर्दशा देख मुझे वड़ा कष्ट होने लगा। मुझसे भी भर पेट
भोजन न किया जाता था। सहायता के लिए कुछ सहानुभूति रखने वालों का द्वार
खटखटाया किंतु कोरा उत्तर मिला। किंकर्त्तव्यविमूढ़ था (समझ में नहीं आ रहा
था कि क्या करूँ)। कुछ समझ में न आता था। कोमल-हृदय नवयुवक मेरे चारों
ओर बैठकर कहा करते, “पंडितजी, अब क्या करें?” मैं उनके सूखे-सूखे मुख
देख अक्सर रो पड़ता कि स्वदेश-सेवा का व्रत लेने के कारण फकीरों से भी बुरी
दशा हो रही है। एक-एक कुर्ता तथा धोती भी ऐसी नहीं थी जो साबुत होती।
लंगोट बाँधकर दिन व्यतीत करते थे। अंगोछे पहनकर नहाते थे, एक समय क्षेत्र
में भोजन करते थे, एक समय दो-दो पैसे के सत्तू खाते थे। मैं पंद्रह वर्ष से एक
समय दूध पीता था। इन लोगों की यह दशा देखकर मुझे दूध पीने का साहस
न होता था। मैं सबके साथ बैठकर सत्तू खा लेता था। मैंने विचार किया कि
इतने नवयुवकों के जीवन को नष्ट करके उन्हें कहाँ भेजा जाए? जब समिति का
सदस्य वनाया था, तो लोगों ने बड़ी-बड़ी आशाएँ बँधाई थीं। कइयों का पढ़ना-लिखना
छुड़ाकर काम में लगा दिया था। पहले से मुझे यह हालत मालूम होती तो मैं
कदापि इस प्रकार की समिति में योग न देता। बुरा फँसा। क्या करूँ, कुछ
समझ में नहीं आता था। अंत में धैर्य धारण कर दृढ़तापूर्वक कार्य करने का
निश्चय किया।
इसी बीच में बंगाल आर्डिनेंस निकला और गिरफ्तारियाँ हुईं। इनकी गिरफ्तारियों
ने यहाँ तक असर डाला कि कार्यकर्त्ताओं में निष्क्रियता के भाव आ गए। क्या
प्रबंध किया जाए, कुछ निर्णय नहीं कर सके। मैंने प्रयत्न किया कि किसी तरह
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एक सौ रुपये मासिक का कहीं से प्रबंध हो जाए। प्रत्येक केन्द्र के प्रतिनिधि से
हर प्रकार से प्रार्थना की थी कि समिति के सदस्यों से कुछ सहायता लें, मासिक
चंदा वसूल करें, पर किसी ने कुछ न सुनी। कुछ सज्जनों से व्यक्तिगत प्रार्थना की
कि वे अपने वेतन में से कुछ मासिक दे दिया करें। किसी ने कुछ ध्यान न
दिया। सदस्य रोज मेरे द्वार पर खड़े रहते थे। पत्रों की भरमार थी कि कुछ धन
का प्रबंध कीजिए, भूखों मर रहे हैं। दो-एक को व्यवसाय में लगाने का भी
इंतजाम किया। दो-चार जिलों में काम बंद कर दिया, वहाँ के कार्यकर्त्ताओं से
स्पष्ट शब्दों में कह दिया कि हम मासिक शुल्क नहीं दे सकते। यदि निर्वाह का
कोई दूसरा मार्ग हो, और उस पर ही निर्भर रहकर कार्य कर सकते हो तो करो।
हमसे जिस समय हो सकेगा देंगे, किन्तु मासिक वेतन देने के लिए हम बाध्य
नहीं। कोई बीस रुपये कर्ज के माँगता था, कोई पचास का बिल भेजता था, और
कइयों ने असंतुष्ट होकर कार्य छोड़ दिया। मैंने भी समझ लिया— ठीक ही है, पर
इतना करने पर भी गुजर न हो सकी।
अशांत युवक-दल
कुछ महानुभावों की प्रकृति होती है कि अपनी कुछ शान जमाना या अपने
आपको बड़ा दिखाना वे अपना कर्त्तव्य समझते हैं, जिससे भयंकर हानियाँ हो
जाती हैं। भोले-भाले आदमी ऐसे मनुष्यों में विश्वास करके उनमें आशातीत
साहस, योग्यता तथा कार्यकुशलता की आशा करके उन पर श्रद्धा रखते हैं। किंतु
समय आने पर यह निराशा के रूप में परिणत हो जाती है। इस प्रकार के मनुष्यों
की किन्हीं कारणों से यदि प्रतिष्ठा हो गई, अथवा अनुकूल परिस्थितियों के
उपस्थित हो जाने से उन्होंने किसी उच्च कार्य में योग दे दिया, तब तो फिर वे
अपने आपको बड़ा भारी कार्यकर्त्ता जाहिर करते हैं। जनसाधारण भी अंधविश्वास
से उनकी बातों पर विश्वास कर लेते हैं, विशेषकर नवयुवक तो इस प्रकार के
मनुष्यों के जाल में शीघ्र ही फँस जाते हैं। ऐसे ही लोग नेतागिरी की धुन में
बृहत् संगठन · 61
अपनी डेढ़ चावल की खिचड़ी अलग पकाया करते हैं। इसी कारण पृथक-पृथक
दलों का निर्माण होता है। इस प्रकार के मनुष्य प्रत्येक समाज तथा प्रत्येक जाति
में पाए जाते हैं। इनसे क्रांतिकारी दल भी मुक्त नहीं रह सकता। नवयुवकों का
स्वभाव चंचल होता है, वे शांत रहकर संगठित कार्य करना बड़ा कठिन समझते
हैं। उनके हृदय में उत्साह की उमंगें उठती हैं। वे समझते हैं दो-चार अस्त्र-शस्त्र
हाथ आए कि हमने सरकार को नाकों चने चबवा दिए। मैं भी जब क्रांतिकारी
दल में योग देने का विचार कर रहा था, उस समय मेरी प्रबल इच्छा थी कि यदि
एक रिवाल्वर मिल जाए तो दस-बीस अंग्रेजों को मार दूँ। इसी प्रकार के भाव
मैंने कई नवयुवकों में देखे। उनकी बड़ी प्रबल हार्दिक इच्छा होती है कि किसी
प्रकार एक रिवाल्वर यां पिस्तौल उनके हाथ लग जाए तो वे उसे अपने पास
रख लें।
मैंने उनसे रिवाल्वर पास रखने का लाभ पूछा, तो कोई संतोषजनक उत्तर
नहीं दे सके। कई युवकों को मैंने इस शौक को पूरा करने में सैकड़ों रुपये
बरबाद करते भी देखा है। किसी क्रांतिकारी आंदोलन के सदस्य नहीं, कोई विशेष
कार्य भी नहीं, महज शौकिया रिवाल्वर पास रखेंगे। ऐसे ही थोड़े से युवकों का
एक दल एक महोदय ने भी एकत्रित किया। ये सब बड़े सच्चरित्र, स्वाभिमानी
और सच्चे कार्यकर्त्ता थे। इस दल ने विदेश से अस्त्र प्राप्त करने का बड़ा उत्तम
सूत्र प्राप्त किया था, जिससे इच्छानुसार पर्याप्त अस्त्र मिल सकते थे। उन अस्त्रों
के दाम भी अधिक न थे। अस्त्र भी पर्याप्त संख्या में बिल्कुल नए मिलते थे।
यहाँ तक प्रबंध हो गया था कि यदि हम लोग रुपये का उचित प्रबंध कर देंगे,
और समय से मूल्य निपटा दिया करेंगे, तो हमको माल उधार भी मिल जाया
करेगा और हमें जब जिस प्रकार के जितनी संख्या में अस्त्रों की आवश्यकता
होगी, मिल जाया करेंगे। यही नहीं समय आने पर हम विशेष प्रकार की मशीन
वाली बंदूकें भी बनवा सकेंगे। इस समय समिति की आर्थिक अवस्था बड़ी खराब
थी। इस सूत्र के हाथ लग जाने और इसके लाभ उठाने की इच्छा होने पर भी
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बिना रुपये के कुछ होता दिखाई न पड़ता था। रुपये का प्रबंध करना नितांत
आवश्यक था। किंतु वह हो कैसे ? दान कोई देता न था, कर्ज भी न मिलता
था और कोई उपाय न देख डाका डालना तय हुआ। किंतु किसी व्यक्ति विशेष
की सम्पत्ति पर डाका डालना हमें ठीक न लगता था। सोचा, यदि लूटना है तो
सरकारी माल क्यों न लूटा जाए ? इसी उधेड़-बुन में एक दिन मैं रेल में जा रहा
था। गार्ड के डिब्बे के पास की गाड़ी में बैठा था। स्टेशन मास्टर एक थैली लाया
और गार्ड के डिब्बे में डाल गया। कुछ खटपट की आवाज़ हुई। मैंने उतर कर
देखा कि एक लोहे का संदूक रखा है। विचार किया कि इसी में थैली डाली
होगी। अगले स्टेशन पर उसमें थैली डालते भी देखा। अनुमान किया कि लोहे का
संदूक गार्ड के डिब्बे में जंजीर से बँधा रहता होगा, ताला पड़ा रहता होगा,
आवश्यकता होने पर ताला खोलकर उतार लेते होंगे। इसके थोड़े दिनों बाद
लखनऊ स्टेशन पर जाने का अवसर प्राप्त हुआ। देखा एक गाड़ी में से कुली
लोहे के आमदनी वाले संदूक उतार रहे हैं। निरीक्षण करने से मालूम हुआ कि
उसमें जंजीर ताला कुछ नहीं पड़ता, यों ही रखे जाते हैं। उसी समय निश्चय
किया कि इसी पर हाथ मारूँगा।
रेलवे डकैती (काकोरी)
उसी समय से धुन सवार हुई। तुरंत स्थान पर जा टाइम-टेबुल देखकर
अनुमान किया कि सहारनपुर से गाड़ी चलती है, लखनऊ तक अवश्य दस हजार
रुपये रोज की आमदनी होती होगी। सब बातें ठीक करके कार्यकर्त्ताओं का संग्रह
किया। दस नवयुवकों को लेकर विचार किया कि किसी छोटे स्टेशन पर जब
गाड़ी खड़ी हो, स्टेशन के तारघर पर अधिकार कर लें, और गाड़ी का संदूक
उतारकर तोड़ डालें, जो कुछ मिले उसे लेकर चल दें, परंतु इस कार्य में मनुष्यों
की अधिक संख्या की आवश्यकता थी। इस कारण यही निश्चय किया कि गाड़ी
की जंजीर खींचकर चलती गाड़ी को खड़ा करके तब लूटा जाए। संभव है कि
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बृहत् संगठन 63
[चित्र: मन्मथनाथ गुप्त] तीसरे दर्जे की जंजीर खींचने से गाड़ी
खड़ी न हो, क्योंकि तीसरे दर्जे में अक्सर
प्रबंध ठीक नहीं रहता है। इस कारण से
दूसरे दर्जे की जंजीर खींचने का प्रबंध
किया। सब लोग उसी ट्रेन में सवार थे।
गाड़ी खड़ी होने पर सब उतरकर गार्ड के
डिब्बे के पास पहुँच गए। लोहे का संदूक
उतारकर छेनियों से काटना चाहा, छेनियों
मन्मथनाथ गुप्त ने काम न किया, तब कुल्हाड़ा चला।
मुसाफिरों से कह दिया कि सब गाड़ी में चढ़ जाओ। गाड़ी का गार्ड गाड़ी
में चढ़ना चाहता था, पर उसे जमीन पर लेट जाने की आज्ञा दी, ताकि बिना
गार्ड के गाड़ी न जा सके। दो आदमियों को नियुक्त किया कि वे लाइन की
पगडंडी को छोड़कर घास में खड़े होकर गाड़ी से हटे हुए गोली चलाते रहें। एक
सज्जन गार्ड के डिब्बे से उतरे। उनके पास भी माउजर पिस्तौल था। विचारा कि
ऐसा शुभ अवसर जाने कब हाथ आए। माउजर पिस्तौल काहे को चलाने को
मिलेगा ? उमंग जो आई, सीधी करके दागने लगे। मैंने जो देखा तो डाँटा,
क्योंकि गोली चलाने की उनकी ड्यूटी ही नहीं थी। फिर यदि कोई मुसाफिर
कौतूहल-वश बाहर को सिर निकाले तो उसके गोली जरूर लग जाए। हुआ भी
ऐसा ही, जो व्यक्ति रेल से उतरकर अपनी
स्त्री के पास जा रहा था, मेरा ख्याल है
कि उन्हीं महाशय की गोली उसको लग
गई, क्योंकि जिस समय यह महाशय
संदूक नीचे डालकर गार्ड के डिब्बे से उतरे
थे, केवल दो-तीन फायर हुए थे। उसी
समय स्त्री ने कोलाहल किया होगा और [चित्र: भूपेन्द्रनाथ सान्याल]
भूपेन्द्रनाथ सान्याल
64 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
उसका पति उसके पास जा रहा था, जो उक्त महाशय की उमंग का शिकार हो
गया। मैंने यथाशक्तिपूर्ण प्रबंध किया था कि जब तक कोई बंदूक लेकर सामना
करने न आए, या मुकाबले में गोली न चले तब तक किसी आदमी पर फायर
न होने पाए। मैं नर-हत्या करके डकैती को भीषण रूप देना नहीं चाहता था।
फिर भी मेरा कहा न मानकर अपना काम छोड़ गोली चला देने का यह परिणाम
हुआ। गोली चलाने की ड्यूटी जिनको मैंने दी थी वे बड़े दक्ष तथा अनुभवी
मनुष्य थे, उनसे भूल होना असंभव है। उन लोगों को मैंने देखा कि वे अपने
स्थान से पाँच मिनट बाद पाँच फायर करते थे। यही मेरा आदेश था।
संदूक तोड़कर तीन गठरियों में थैलियाँ बाँधीं। सबसे कई बार कहा- देख
लो कोई सामान रह तो नहीं गया। इस पर भी एक महाशय चद्दर डाल आए।
रास्ते में थैलियों में से रुपया निकालकर गठरी बाँधी और उसी समय लखनऊ
शहर में आ पहुँचे। किसी ने पूछा भी नहीं, कौन हो, कहाँ से आए हो ? इस
प्रकार दस आदमियों ने एक गाड़ी को रोककर लूट लिया। उस गाड़ी में चौदह
मनुष्य ऐसे थे, जिनके पास बंदूक या रायफलें थीं। दो अंग्रेज सशस्त्र फौजी
जवान भी थे, पर सब शांत रहे। ड्राइवर महाशय तथा एक इंजीनियर महाशय
दोनों का बुरा हाल था। वे दोनों अंग्रेज थे। ड्राइवर महाशय इंजन में लेटे रहे।
इंजीनियर महाशय पाखाने में जा छिपे। हमने कह दिया था कि मुसाफिरों से कुछ
न कहेंगे सिर्फ सरकार का माल लूटेंगे। इस कारण मुसाफिर भी शांतिपूर्वक बैठे
रहे। समझे कि तीस-चालीस आदमियों ने गाड़ी को चारों ओर से घेर लिया है।
केवल दस युवकों ने इतना बड़ा आतंक फैला दिया। साधारणतः इस बात पर
बहुत से लोग विश्वास करने में भी संकोच करेंगे कि दस नवयुवकों ने गाड़ी खड़ी
करके लूट ली। जो भी हो वास्तव में बात यही थी। इन दस कार्यकर्त्ताओं में
अधिकतर तो ऐसे थे जो आयु में सिर्फ लगभग बाईस वर्ष के होंगे और जो
शरीर से बड़े पुष्ट भी न थे। इस सफलता को देखकर मेरा साहस बहुत बढ़
गया। मेरा जो विचार था, वह अक्षरशः सत्य सिद्ध हुआ। पुलिस वालों की वीरता
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का मुझे अंदाजा था। इस घटना से भविष्य के कार्य की बहुत बड़ी आशा बँध
गई। नवयुवकों का भी उत्साह बढ़ गया। जितना कर्ज़ा था निपटा दिया। अस्त्रों
की खरीद के लिए लगभग एक हजार रुपये भेज दिए। प्रत्येक केन्द्र के कार्यकर्त्ताओं
को यथास्थान भेजकर दूसरे प्रांतों में भी कार्य-विस्तार करने का निर्णय करके कुछ
प्रबंध किया। एक युवक-दल ने बम बनाने का प्रबंध किया, मुझसे भी सहायता
चाही, मैंने आर्थिक सहायता देकर अपना एक सदस्य भेजने का वचन दिया। किंतु
कुछ त्रुटियाँ हुईं, जिससे संपूर्ण दल अस्त-व्यस्त हो गया।
मैं इस विषय में कुछ भी न जान सका कि दूसरे देश के क्रांतिकारियों ने
प्रारंभिक अवस्था में हम लोगों की भाँति प्रयत्न किया या नहीं। यदि. पर्याप्त
अनुभव होता तो इतनी साधारण भूलें न करते। त्रुटियों के होते हुए भी कुछ भी
न बिगड़ता और न कुछ भेद खुलता, न इस अवस्था को पहुँचते, क्योंकि मैंने जो
संगठन किया था उसमें किसी ओर से मुझे कमजोरी न दिखाई देती थी। कोई भी
किसी प्रकार की त्रुटि न समझ सकता था। इसी कारण आँख बंद किए बैठे रहे।
किन्तु आस्तीन में साँप छिपा हुआ था, ऐसा गहरा मुँह मारा कि चारों खाने चित्त
कर दिया।
जिन्हें हम हार समझे थे गला अपना सजाने को,
वही अब नाग बन बैठे हमारे काट खाने को।
नवयुवकों में आपस की होड़ के कारण बहुत विवाद तथा कलह भी हो
जाती थी, जो भयंकर रूप धारण कर लेती। मेरे पास जब मामला आता तो मैं
प्रेमपूर्वक समिति की दशा को देखकर, सबको शांत कर देता। कभी नेतृत्व को
लेकर वाद-विवाद चल जाता। एक केंद्र के निरीक्षक से वहाँ के कार्यकर्त्ता अत्यंत
असंतुष्ट थे। क्योंकि निरीक्षक से अनुभवहीनता के कारण कुछ भूलें हो गई थीं।
यह अवस्था देख मुझे बड़ा खेद तथा आश्चर्य हुआ, क्योंकि नेतागिरी का भूत
सबसे भयानक होता है। जिस समय से यह भूत खोपड़ी पर सवार होता है, उसी
समय से सब काम चौपट हो जाता है। केवल एक-दूसरे के दोष देखने में समय
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व्यतीत होता है और वैमनस्य बढ़ने से बड़े भयंकर परिणाम होते हैं। इस प्रकार
के समाचार सुनकर मैंने सबको एकत्रित किया और खूब फटकारा। सब अपनी त्रुटि
समझकर पछताए और प्रीतिपूर्वक आपस में मिलकर कार्य करने लगे। पर ऐसी
अवस्था हो गई थी कि दलबंदी की नौबत आ गई थी। इस प्रकार से तो दलबंदी
हो ही गई थी। पर मुझ पर सब की श्रद्धा थी और मेरी राय को सब मान लेते
थे। सब कुछ होने पर भी मुझे किसी ओर से किसी प्रकार का संदेह न था। किंतु
परमात्मा को ऐसा ही स्वीकार था, जो इस अवस्था का दर्शन करना पड़ा।
गिरफ्तारी
काकोरी डकैती होने के बाद से ही पुलिस बहुत सचेत हुई। बड़े जोरों के
साथ जाँच आरंभ हो गई। शाहजहाँपुर में कुछ नए व्यक्तियों के दर्शन हुए।
पुलिस के कुछ विशेष सदस्य मुझसे भी मिले। चारों ओर शहर में यही चर्चा थी
कि रेलवे डकैती किसने कर ली ? उन्हीं दिनों शहर में डकैती के एक-दो नोट
निकल आए, अब तो पुलिस-जाँच-पड़ताल और भी बढ़ने लगी। कई मित्रों ने
मुझसे कहा भी कि सतर्क रहो। दो एक सज्जनों ने निश्चित समाचार दिया कि
मेरी गिरफ्तारी जरूर हो जाएगी। मेरी समझ में कुछ न आया। मैंने विचार किया
कि यदि गिरफ्तारी हो भी गई तो पुलिस को मेरे विरुद्ध कुछ भी प्रमाण न मिल
सकेगा। अपनी बुद्धिमत्ता पर कुछ अधिक विश्वास था। अपनी बुद्धि के सामने
दूसरों की बुद्धि को तुच्छ समझता था। कुछ यह भी विचार था कि देश की
सहानुभूति की परीक्षा की जाए। जिस देश पर हम अपना बलिदान देने को तैयार
हैं, उस देश के वासी हमारे साथ कितनी सहानुभूति रखते हैं ? कुछ जेल का
अनुभव भी प्राप्त करना था। वास्तव में, मैं काम करते-करते थक गया था।
भविष्य के कार्यों में अधिक नर-हत्या का ध्यान करके मैं हतबुद्धि-सा हो गया
था। मैंने किसी के कहने की कोई भी चिंता न की।
रात्रि के समय ग्यारह बजे के लगभग एक मित्र के यहाँ से अपने घर पर
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बृहत् संगठन 67
गया। रास्ते में खुफिया पुलिस के सिपाहियों से भेंट हुई। कुछ विशेष रूप से उस
समय भी वे मेरी देखभाल कर रहे थे। मैंने कोई चिंता न की और घर पर जाकर
सो गया। प्रातःकाल चार बजने पर जगा, शौचादि से निवृत्त होने पर बाहर द्वार
पर बंदूक के कुंदों का शब्द सुनाई दिया। मैं समझ गया कि पुलिस आ गई है।
मैं तुरंत द्वार खोलकर बाहर गया। एक पुलिस अफसर ने बढ़कर हाथ पकड़
लिया। मैं गिरफ्तार हो गया। मैं केवल एक अंगोछा पहने हुए था। पुलिस वाले
को अधिक भय न था। पूछा कि घर में कोई अस्त्र हो, तो दे दीजिए। मैंने कहा
कोई आपत्तिजनक वस्तु घर में नहीं। उन्होंने बड़ी सज्जनता की। मेरे हथकड़ी
आदि कुछ न डाली। मकान की तलाशी लेते समय एक पत्र मिल गया, जो
मेरी जेब में था। कुछ होनहार कि तीन-चार पत्र मैंने लिखे थे। डाकखाने में
डालने को भेजे, तब तक डाक निकल चुकी थी। मैंने वे सब इस ख्याल से
अपने पास ही रख लिए कि डाक के बंबे में डाल दूँगा। फिर विचार किया
जैसे बंबे में पड़े रहेंगे, वैसे जेब में पड़े हैं। मैं उन पत्रों को वापस घर ले
आया। उन्हीं में एक पत्र आपत्तिजनक था जो पुलिस के हाथ लग गया।
गिरफ्तार होकर पुलिस कोतवाली पहुँचा। वहाँ पर खुफिया पुलिस के एक
अफसर से भेंट हुई। उस समय उन्होंने कुछ ऐसी बातें कीं, जिन्हें मैं या एक
व्यक्ति और जानता था। कोई तीसरा व्यक्ति इस प्रकार से ब्योरेवार नहीं जान
सकता था। मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ किंतु संदेह इस कारण न हो सका कि मैं
दूसरे व्यक्ति के कार्यों पर अपने शरीर के समान ही विश्वास रखता था।
शाहजहाँपुर में जिन-जिन व्यक्तियों की गिरफ्तारी हुई, वह भी बड़ी आश्चर्यजनक
प्रतीत होती थी। जिन पर कोई संदेह भी न था, पुलिस उन्हें कैसे जान गई ?
दूसरे स्थानों पर क्या हुआ कुछ भी न मालूम हो सका। जेल पहुँच जाने पर
मैं थोड़ा-बहुत अनुमान कर सका, कि सम्भवतः दूसरे स्थानों में भी गिरफ्तारियाँ
हुई होंगी। गिरफ्तारियों के समाचार सुनकर शहर के सभी मित्र भयभीत हो
गए। किसी से इतना भी न हो सका कि जेल में हम लोगों के पास समाचार
भेजने का प्रबंध कर देता।
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68 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
जेल
जेल में पहुँचते ही खुफिया पुलिस वालों ने यह प्रबंध कराया कि हम सब
एक-दूसरे से अलग रखे जाएँ, किंतु फिर भी एक-दूसरे से बातचीत हो जाती थी।
यदि साधारण कैदियों के साथ रखते तब तो बातचीत का पूर्ण प्रबंध हो जाता,
इस कारण से सबको अलग-अलग तनहाई की कोठरियों में बंद किया गया। यही
प्रबंध दूसरे ज़िले की जेलों में भी, जहाँ-जहाँ भी इस संबंध में गिरफ्तारियाँ हुई
थीं, किया गया था। अलग-अलग रखने से पुलिस को यह सुविधा होती है कि
प्रत्येक से पृथक्-पृथक मिलकर बातचीत करते हैं। कुछ भय दिखाते हैं, कुछ
इधर-उधर की बातें करके भेद जानने का प्रयत्न करते हैं। अनुभवी लोग तो
पुलिस वालों से मिलने से इंकार ही कर देते हैं। क्योंकि उनसे मिलकर हानि के
अतिरिक्त लाभ कुछ भी नहीं होता। कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं जो समाचार जानने
के लिए कुछ बातचीत करते हैं। पुलिस वालों से मिलना ही क्या है। वे तो
चालबाजी से बात निकालने की ही रोटी खाते हैं। उनका जीवन इसी प्रकार की
बातों में व्यतीत होता है। नवयुवक दुनियादारी क्या जानें ? न वे इस प्रकार की
बातें ही बना सकते हैं।
जब किसी तरह कुछ समाचार ही न मिलते तब तो जी बहुत घबराता। यही
पता नहीं चलता कि पुलिस क्या कर रही है, भाग्य का क्या निर्णय होगा ?
जितना समय व्यतीत होता जाता था उतनी ही चिंता बढ़ती जाती थी।
जेल-अधिकारियों से मिलकर पुलिस यह भी प्रबंध करा देती है कि मुलाकात करने
वालों से घर के संबंध में बातचीत करें, मुकदमे के संबंध में कोई बातचीत न
करें। सुविधा के लिए सबसे प्रथम यह परमावश्यक है कि एक विश्वास-पात्र
वकील किया जाए जो ठीक समय पर आकर बातचीत कर सके। वकील के लिए
किसी प्रकार की रुकावट नहीं हो सकती। वकील के साथ अभियुक्त की जो बातें
होती हैं, उनको कोई दूसरा सुन नहीं सकता। क्योंकि इस प्रकार का कानून है,
यह अनुभव बाद में हुआ। गिरफ्तारी के बाद शाहजहाँपुर के वकीलों से मिलना
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बृहत् संगठन 69
भी चाहा, किंतु शाहजहाँपुर में ऐसे दब्बू वकील रहते हैं, जो सरकार के विरुद्ध
मुकदमे में सहायता देने में हिचकते हैं।
मुझसे खुफिया पुलिस के कप्तान साहब मिले। थोड़ी-सी बातें करके अपनी
इच्छा प्रकट की कि मुझे सरकारी गवाह बनाना चाहते हैं। थोड़े दिनों में एक मित्र
ने भयभीत होकर कि कहीं वह भी न पकड़ा जाए, बनारसीलाल से भेंट की और
समझा-बुझाकर उसे सरकारी गवाह बना दिया। बनारसीलाल बहुत घबराता था कि
कौन सहायता देगा, सजा जरूर हो जाएगी। यदि किसी वकील से मिल लिया
होता तो उसका धैर्य न टूटता। पं. हरकरननाथ शाहजहाँपुर आए, जिस समय वह
अभियुक्त श्री प्रेमकृष्ण खन्ना से मिले, उस समय अभियुक्त ने पं. हरकरननाथ से
बहुत कुछ कहा कि मुझसे तथा दूसरे अभियुक्तों से मिल लें। यदि वह कहा मान
जाते और मिल लेते तो बनारसीलाल को साहस हो जाता और वह डटा रहता।
उसी रात्रि को पहले एक इंसपेक्टर बनारसीलाल से मिले। फिर जब मैं सो गया
तब बनारसीलाल को निकालकर ले गए। प्रातःकाल पाँच बजे के करीब, जब
बनारसीलाल की कोठरी में से कुछ शब्द सुनाई दिया, तो मैंने बनारसीलाल को
पुकारा। पहरे पर जो कैदी था, उससे मालूम हुआ, बनारसीलाल बयान दे चुके।
बनारसीलाल के संबंध में सब मित्रों ने कहा था कि इससे अवश्य धोखा होगा,
पर मेरी बुद्धि में कुछ न समाया था। प्रत्येक जानकार ने बनारसीलाल के संबंध
में यही भविष्यवाणी की थी कि वह आपत्ति पड़ने पर अटल न रह सकेगा। इस
कारण सबने उसे किसी प्रकार के गुप्त कार्य में लेने की मनाही की थी। अब तो
जो होना था सो हो ही गया।
थोड़े दिनों बाद जिला कलक्टर मिले। कहने लगे फाँसी हो जाएगी। बचना
हो तो बयान दे दो। मैंने कुछ उत्तर न दिया। तत्पश्चात् खुफिया पुलिस के
कप्तान साहब मिले, बहुत-सी बातें कीं। कई कागज दिखलाए। मैंने कुछ-कुछ
अंदाजा लगाया कि कितनी दूर तक ये लोग पहुँच गए हैं। मैंने कुछ बातें बनाईं,
ताकि पुलिस का ध्यान दूसरी ओर चला जाए, परंतु उन्हें तो विश्वसनीय सूत्र हाथ
70 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
लग चुका था, वे बनावटी बातों पर क्यों विश्वास करते ? अंत में उन्होंने अपनी
यह इच्छा प्रकट की कि यदि मैं बंगाल का संबंध बताकर कुछ बोलशेविक संबंध
के विषय में अपना बयान दे दूँ, तो वे मुझे थोड़ी-सी सज़ा करा देंगे, और सज़ा
के थोड़े दिनों बाद ही जेल से निकालकर इंग्लैंड भेज देंगे और पंद्रह हज़ार रुपये
पारितोषिक (इनाम) भी सरकार से दिला देंगे। मैं मन-ही-मन में बहुत हँसता था।
अंत में एक दिन फिर मुझसे जेल में मिलने को गुप्तचर विभाग के कप्तान साहब
आए। मैंने अपनी कोठरी में से निकलने से ही इनकार कर दिया। वह कोठरी पर
आकर बहुत-सी बातें करते रहे, अंत में परेशान होकर चले गए।
शिनाख्त (पहचान) कराई गई। पुलिस को जितने आदमी मिल सके उतने
आदमी लेकर शिनाख्त कराई। भाग्यवश श्री अईनुद्दीन साहब मुकदमे के मजिस्ट्रेट
मुकर्रर हुए, उन्होंने जी भर कर पुलिस की मदद की। शिनाख्तों में अभियुक्तों को
साधारण मजिस्ट्रेटों की भाँति भी सुविधाएँ न दीं। दिखाने के लिए कागजी
कार्यवाही खूब साफ रखी। जबान के बड़े मीठे थे। प्रत्येक अभियुक्त से बड़े
तपाक से मिलते थे। बड़ी मीठी-मीठी बातें करते थे। सब समझते थे कि हमसे
सहानुभूति रखते हैं। कोई न समझ सका कि अंदर-ही-अंदर घाव कर रहे हैं।
इतना चालाक अफसर शायद ही कोई दूसरा हो। जब तक मुकदमा उनकी
अदालत में रहा, किसी को कोई शिकायत का मौका ही न दिया। यदि कभी कोई
बात भी हो जाती तो ऐसे ढंग से उसे टालने की कोशिश करते कि किसी को
बुरा ही न लगता। बहुधा ऐसा भी हुआ कि खुली अदालत में अभियुक्तों से क्षमा
तक माँगने में संकोच न किया। किंतु कागजी कार्यवाही में इतने होशियार थे कि
जो कुछ लिखा सदैव अभियुक्तों के विरुद्ध। जब मामला सैशन के सुपुर्द किया
और आज्ञापत्र में युक्तियाँ दीं, तब सब की आँखें खुलीं कि कितना गहरा घाव
मार दिया।
मुकदमा अदालत में न आया था, उसी समय रायबरेली में बनवारीलाल की
गिरफ्तारी हुई। मुझे हाल मालूम हुआ। मैंने पं. हरकरननाथ से कहा कि सब काम
वृहत् संगठन 71.
छोड़कर सीधे रायबरेली जाएँ और बनारसीलाल से मिलें, किन्तु उन्होंने मेरी बातों
पर कुछ भी ध्यान न दिया। मुझे बनारसीलाल पर पहले ही संदेह था, क्योंकि
उसका रहन-सहन इस प्रकार का था कि जो ठीक न था। जब दूसरे सदस्यों के
साथ रहता तब उनसे कहा करता कि मैं जिला संगठनकर्त्ता हूँ। मेरी गणना
अधिकारियों में है। मेरी आज्ञा का पालन किया करो। मेरे जूठे बर्तन मला करो। कुछ
विलासिता-प्रिय भी था। प्रत्येक समय शीशा, कंघा तथा साबुन साथ रखता था।
मुझे इससे भय था, किन्तु हमारे दल के एक खास आदमी का वह विश्वासपात्र
रह चुका था। उन्होंने सैकड़ों रुपये देकर उसकी सहायता की थी। इसी कारण
हम लोग भी अंत तक उसे मासिक सहायता देते रहे। मैंने बहुत कुछ हाथ-पैर
मारे पर कुछ भी न चली और जिसका मुझे भय था, वही हुआ। भाड़े का टट्टू
अधिक बोझ न सँभाल सका, उसने बयान दे दिए। जब तक यह गिरफ्तार न
हुआ था कुछ सदस्यों ने इसके पास जो अस्त्र थे वे माँगे, पर उसने न दिए।
जिला अफसर की शान में रहा। गिरफ्तार होते ही सब शान मिट्टी में मिल गई।
बनवारीलाल के बयान दे देने से पुलिस का मुकदमा मजबूती पकड़ गया। यदि
वह अपना बयान न देता तो मुकदमा बहुत कमजोर था। सब लोग चारों ओर से
एकत्रित करके लखनऊ जिला जेल में रखे गए। थोड़े समय तक अलग-अलग रहे,
किन्तु अदालत में मुकदमा आने से पहले ही एकत्रित कर दिए गए।
मुकदमे में रुपये की जरूरत थी। अभियुक्तों के पास क्या था? उनके लिए
धन-संग्रह करना कितना कठिन था। न जाने किस प्रकार निर्वाह करते थे।
अधिकतर अभियुक्तों का कोई संबंधी पैरवी भी न कर सकता था। जिस किसी
के कोई था भी, वह बाल-बच्चों तथा घर को सँभालता या इतने समय तक घर-बार
छोड़कर मुकदमा करता? यदि चार अच्छे पैरवी करने वाले होते तो पुलिस का
तीन-चौथाई मुकदमा टूट जाता। लखनऊ जैसे शहर में मुकदमा हुआ, जहाँ
अदालत में कोई भी शहर का आदमी न आता था। इतना भी तो न हुआ कि
एक अच्छा प्रेस-रिपोर्टर ही रहता, जो मुकदमे की सारी कार्यवाही को, जो कुछ
72 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
अदालत में होता था, प्रेस में भेजता रहता। इंडियन डेली टेलीग्राफ वालों ने कृपा
की। यदि कोई अच्छा रिपोर्टर आ भी गया, और जो कुछ अदालत की कार्यवाही
ठीक-ठीक प्रकाशित हुई तो पुलिस वालों ने जज साहब से मिलकर तुरंत उस
रिपोर्टर को निकलवा दिया। जनता की कोई सहानुभूति न थी। जो पुलिस के जी
में आया, करती रही। इन सारी बातों को देखकर जज का साहस बढ़ गया।
उसने जैसा जी चाहा सब कुछ किया। अभियुक्त चिल्लाए- “हाय ! हाय !” पर
कुछ भी सुनवाई न हुई। और बातें तो दूर श्री दामोदर स्वरूप सेठ को पुलिस ने
जेल में सड़ा डाला। लगभग एक वर्ष तक वे तड़पते रहे। सौ पौंड से केवल
छियासठ पौंड वजन रह गया। कई बार जेल में मरणासन्न हो गए। नित्य बेहोशी
आ जाती थी। लगभग दस मास तक कुछ भी भोजन न कर सके। जो कुछ
छटाँक-दो-छटाँक दूध किसी प्रकार पेट में पहुँच जाता था, उससे इस प्रकार की
विकट वेदना (पीड़ा) होती थी कि कोई उनके पास खड़ा होकर उस छटपटाने के दृश्य को
देख न सकता था। एक मैडिकल बोर्ड बनाया गया, जिसमें तीन डाक्टर थे उनकी कुछ
समझ में न आया, तो कह दिया कि सेठजी को बीमारी ही नहीं है।
जब से काकोरी षड्यंत्र के अभियुक्त जेल में एक साथ रहने लगे, तभी से
उनमें एक अद्भुत परिवर्तन हुआ, जिसे देखकर मेरे आश्चर्य की सीमा न रही।
जेल में सबसे बड़ी बात तो यह थी कि प्रत्येक आदमी अपनी नेतागिरी की दुहाई
देता था। कोई भी बड़े-छोटे का भेद न रहा। बड़े तथा अनुभवी पुरुषों की बातों
की अवहेलना होने लगी। अनुशासन का नाम भी न रहा। बहुधा उलटे जवाब
मिलने लगे। छोटी-छोटी बातों पर मतभेद हो जाता। इस प्रकार का मतभेद कभी-
कभी वैमनस्य तक का रूप धारण कर लेता। आपस में झगड़ा भी हो जाता। खैर !
जहाँ चार बर्तन रहते हैं, वहाँ खटकते ही हैं। ये लोग तो मनुष्य देहधारी थे।
एक बार विचार हुआ कि सरकार से समझौता कर लिया जाए। बैरिस्टर
साहब ने खुफिया पुलिस के कप्तान से परामर्श आरंभ किया। किंतु यह सोचकर
कि इससे क्रांतिकारी दल की निष्ठा न मिट जाए, यह विचार छोड़ दिया गया।
बृहत् संगठन 73
युवकों की राय हुई कि अनशन व्रत करके सरकार से हवालाती की हालत में ही
माँगें पूरी करा ली जाएँ क्योंकि लंबी-लंबी सजाएँ होंगी। संयुक्त प्रांत की जेलों में
साधारण कैदियों का भोजन खाते हुए सजा काटकर जेल से जिंदा निकलना कोई
सरल कार्य नहीं। जितने राजनैतिक कैदी षड्यंत्रों के संबंध में सजा पाकर इस
प्रांत की जेलों में रखे गए, उनमें से पाँच-छः महात्माओं ने इस प्रांत की जेलों के
व्यवहार के कारण ही जेलों में प्राण त्याग दिए।
इस विचार के अनुसार काकोरी के
लगभग सब हवालातियों ने अनशन व्रत
आरंभ कर दिया। दूसरे ही दिन सब पृथक
कर दिए गए। कुछ व्यक्ति डिस्ट्रिक्ट जेल
में रखे गए। कुछ सेंट्रल जेल भेजे गए।
अनशन करते पंद्रह दिन व्यतीत हो गए,
तब सरकार के कान पर भी जूँ रेंगी। उधर
सरकार का काफी नुकसान हो रहा था।
जज साहब तथा दूसरे कचहरी के
कार्यकर्त्ताओं को घर बैठे वेतन देना पड़ता
था। सरकार को स्वयं चिंता थी कि किसी
प्रकार अनशन छूटे। जेल अधिकारियों ने
पहले आठ आने रोज तय किए। मैंने उस [चित्र-परिचय: ठाकुर रोशनसिंह]
समझौते को अस्वीकार कर दिया और बड़ी कठिनाई से दस आने रोज पर ले
आया। उस अनशन व्रत में पंद्रह दिन तक मैंने जल पीकर निर्वाह किया था।
सोलहवें दिन नाक से दूध पिलाया गया था। श्री रोशनसिंहजी ने भी इसी प्रकार मेरा
साथ दिया था। वे पंद्रह दिन तक बराबर चलते-फिरते रहे थे। स्नानादि करके अपने
दैनिक कर्म भी कर लिया करते थे। दस दिन तक तो मेरे मुख को देखकर अनजान
पुरुष यह अनुमान भी नहीं कर सकता था कि मैं अन्न नहीं खाता।
74 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
जिस दिन सफाई की बहस मैंने समाप्त की; सरकारी वकील ने उठकर मुक्त
कंठ से मेरी बहस की प्रशंसा की कि सैकड़ों वकीलों से अच्छी बहस की। मैंने
नमस्कार कर उत्तर दिया कि आपके चरणों की कृपा है, क्योंकि इस मुकदमे के
पहले मैंने किसी अदालत में समय न व्यतीत किया था, सरकारी तथा सफाई के
वकीलों की जिरह को सुनकर मैंने भी साहस किया था।
अभियोग
काकोरी में रेलवे ट्रेन लुट जाने के बाद ही पुलिस का विशेष विभाग उक्त
घटना का पता लगाने के लिए तैनात किया गया। एक विशेष व्यक्ति मि. हार्टन
इस विभाग के निरीक्षक थे। उन्होंने घटनास्थल तथा रेलवे पुलिस की रिपोर्टों को
देखकर अनुमान किया कि संभव है कि यह कार्य क्रांतिकारियों का हो। प्रांत के
क्रांतिकारियों की जाँच शुरू हुई। उसी समय शाहजहाँपुर में रेलवे डकैती के तीन
नोट मिले। चोरी गए नोटों की संख्या सौ से अधिक थी, जिनका मूल्य लगभग
एक हजार रुपये होगा। इनमें से लगभग सात सौ या आठ सौ रुपये के मूल्य के
नोट सीधे सरकार के खजाने में पहुँच गए। अतः सरकार नोटों के मामले को
चुपचाप पी गई। ये नोट लिस्ट प्रकाशित होने से पूर्व ही सरकारी खजाने में पहुँच
चुके थे। पुलिस का लिस्ट प्रकाशित करना व्यर्थ हुआ। सरकारी खजाने में से ही
जनता के पास कुछ नोट लिस्ट प्रकाशित होने के पूर्व ही पहुँच गए थे, इस
कारण वे जनता के पास निकल आए।
उन्हीं दिनों में ज़िला खुफिया पुलिस को मालूम हुआ कि मैं 8, 9 तथा 10
अगस्त सन् 1925 ई. को शाहजहाँपुर नहीं था। अधिक जाँच होने लगी। इसी
जाँच-पड़ताल में पुलिस को मालूम हुआ कि गवर्नमेंट स्कूल शाहजहाँपुर के इंदुभूषण
मित्र नामक एक विद्यार्थी के पास मेरे क्रांतिकारी दल से संबंधित पत्र आते हैं,
जो वह मुझे दे आता है। स्कूल के हैडमास्टर द्वारा इंदुभूषण के पास आए हुए
पत्रों की नकल करा कर हार्टन साहब के पास भेजी जाती रही। इन्हीं पत्रों से
वृहत् संगठन 75
हार्टन साहब को मालूम हुआ कि मेरठ में प्रांत की क्रांतिकारी समिति की बैठक
होने वाली है। उन्होंने एक सब इंस्पेक्टर को मेरठ अनाथालय में, जहाँ पर बैठक
होने का पता चला था, भेजा। उन्हीं दिनों हार्टन साहब को किसी विशेष सूत्र से
मालूम हुआ कि शीघ्र ही कनखल में डाका डालने का प्रबंध क्रांतिकारी समिति के
सदस्य कर रहे थे और संभव है कि किसी बड़े शहर में डाकखाने की आमदनी
लूटी जाए। हार्टन साहब को एक सूत्र से एक पत्र मिला जो मेरे हाथ का
लिखा था। इस पत्र में सितंबर में होने वाले ‘श्राद्ध’-8 का जिक्र था जिसकी 13
तारीख निश्चित की गई थी। पत्र में था कि दादा का श्राद्ध नं. 1 पर 13
सितंबर को होगा, अवश्य पधारिए। मैं अनाथालय में मिलूँगा। पत्र पर “रुद्र”
के हस्ताक्षर थे।
आगामी डकैतियों को रोकने के लिए
हार्टन साहब ने प्रांत भर में 26 सितंबर
सन् 1925 ई. को लगभग तीस व्यक्तियों
को गिरफ्तार किया। उन्हीं दिनों में इंदुभूषण
के पास आए हुए पत्र से पता लगा कि
कुछ वस्तुएँ बनारस में किसी विद्यार्थी की
कोठरी में बंद हैं। अनुमान किया गया कि
संभव है कि वे हथियार हों। अनुसंधान
करने से हिन्दू विश्वविद्यालय के एक विद्यार्थी
की कोठरी से दो राइफलें निकलीं। उस
विद्यार्थी को कानपुर में गिरफ्तार किया गया।
इंदुभूषण ने मेरी गिरफ्तारी की सूचना एक
पत्र द्वारा बनारस को भेजी। जिसके पास राजेन्द्र लाहिड़ी
पत्र भेजा था, उसे पुलिस गिरफ्तार कर चुकी थी, क्योंकि उसी, श्री रामनाथ
पाण्डेय के पते का पत्र मेरी गिरफ्तारी के समय मेरे मकान से पाया गया था।
76 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
रामनाथ पाण्डेय के पत्र पुलिस के पास
पहुँचे थे। अतः इंदुभूषण को गिरफ्तार किया
गया। इंदुभूषण ने दूसरे दिन अपना बयान
दे दिया। गिरफ्तार किए हुए व्यक्तियों में
से कुछ से मिल-मिलाकर बनारसीलाल ने
भी, जो शाहजहाँपुर की जेल में था, अपना
बयान दे दिया और वह सरकारी गवाह
बना लिया गया। वह कुछ अधिक जानता
था। इसके बयान से क्रांतिकारी पत्र के
पार्सलों का पता चला। बनारस के डाकखाने
से जिन-जिनके पास पार्सल भेजे गए थे
रामकृष्ण खत्री उनको पुलिस ने गिरफ्तार किया। कानपुर
में गोपीनाथ ने, जिसके नाम से पार्सल गया था, गिरफ्तार होते ही पुलिस को
बयान दे दिया और वह सरकारी गवाह बना लिया ,गया। इसी प्रकार रायबरेली में
स्कूल के विद्यार्थी कुँवर बहादुर के पास पार्सल आया था, उसने भी गिरफ्तार होते
ही बयान दे दिया और सरकारी गवाह बना लिया गया। इनके पास मनीआर्डर भी
आया करते थे, क्योंकि यह बनवारीलाल का पोस्ट बॉक्स (डाक पाने वाला) था।
इसने बनवारीलाल के एक रिश्तेदार का पता बता दिया, जहाँ तलाशी लेने से
बनवारीलाल का एक ट्रंक मिला। इस ट्रंक में एक कारतूसी पिस्तौल, एक कारतूसी
फौजी रिवाल्वर तथा कुछ कारतूस पुलिस के हाथ लगे। श्री बनवारीलाल की खोज
हुई। बनवारीलाल भी पकड़ लिए गए। गिरफ्तारी के थोड़े दिनों बाद ही पुलिस
''वाले मिले, उल्टा-सीधा सुझाया और बनवारीलाल ने भी अपना बयान दे दिया
तथा इकबाली मुलजिम बनाए गए। बनवारीलाल ने काकोरी डकैती में अपना
सम्मिलित होना बताया था। उधर कलकत्ते में दक्षिणेश्वर में एक मकान में
बमबनाने का सामान, एक बना हुआ बम, 7 रिवाल्वर, पिस्तौल तथा कुछ
बृहत् संगठन 77
राजद्रोहात्मक साहित्य पकड़ा गया। इसी मकान में श्री राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी, जो इस
मुकदमे में फरार थे, गिरफ्तार हुए।
इंदुभूषण के गिरफ्तार हो जाने के
बाद उसके हैडमास्टर को एक पत्र मध्य
प्रांत से मिला, जिसे उसने हार्टन साहब
के पास वैसा ही भेज दिया। इस पत्र से
एक व्यक्ति मोहन लाल खत्री का चाँदा
में पता चला। वहाँ से पुलिस ने खोज
लगाकर पूना में श्री रामकृष्ण खत्री को
गिरफ्तार करके लखनऊ भेजा। बनारस में
भेजे हुए पार्सलों के संबंध से जबलपुर में
श्री प्रणवेशकुमार चटर्जी को गिरफ्तार करके
भेजा गया। कलकत्ता से श्री शचीन्द्रनाथ
सान्याल, जिन्हें बनारस षड्यंत्र से आजन्म
कालेपानी की सजा हुई थी, और जिन्हें
बांकुरा में "क्रांतिकारी" पर्चे बाँटने के कारण
दो वर्ष की सजा हुई थी, इस मुकदमे में
लखनऊ भेजे गए। श्री योगेशचन्द्र चटर्जी
बंगाल आर्डिनेंस के कैदी हजारी बाग जेल
से भेजे गए। आप अक्तूबर सन् 1924 ई.
में कलकत्ते में गिरफ्तार हुए थे। आपके
[चित्र-शीर्षक]: शचीन्द्रनाथ सान्याल
पास दो कागज पाए गए थे, जिनमें संयुक्त प्रांत के सब जिलों का नाम था, और
लिखा था कि बाईस ज़िलों में समिति का कार्य हो रहा है। ये कागज इस षड्यंत्र
के संबंध के समझे गए। श्री राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी दक्षिणेश्वर बम केस में दस वर्ष
के दीपांतर की सजा पाने के बाद इस मुकदमे में लखनऊ भेजे गए। अब लगभग
78 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
छत्तीस व्यक्ति गिरफ्तार हुए थे। अट्ठाईस
पर मजिस्ट्रेट की अदालत में मुकदमा चला।
तीन व्यक्ति- श्री शचीन्द्रनाथ बख्शी, श्री
चन्द्रशेखर आज़ाद और श्री अशफाकउल्ला
खाँ फरार रहे। बाकी सब मुकदमा अदालत
में आने से पहले छोड़ दिए गए। अट्ठाईस
में दो पर से मजिस्ट्रेट की अदालत में
मुकदमा उठा लिया गया। दो को सरकारी
गवाह बनाकर उन्हें माफी दी गई। अंत में
मजिस्ट्रेट ने इक्कीस व्यक्तियों को सेशन
के सुपुर्द किया। सेशन में मुकदमा आने
योगेशचन्द्र चटर्जी
पर श्री दामोदरस्वरूप सेठ बहुत बीमार हो
गए। अदालत न आ सकते थे, अतः अंत
में बीस व्यक्ति रह गए। बीस में से दो
व्यक्ति श्री शचीन्द्रनाथ विश्वास तथा श्री
हरगोविंद सेशन की अदालत में मुक्त हुए।
बाकी अठारह को सजाएँ हुईं।
श्री बनवारीलाल इकबाली मुलजिम हो
गए। वे रायबरेली जिला कांग्रेस कमेटी के
मंत्री भी रह चुके थे। उन्होंने असहयोग
आंदोलन में छः मास का कारावास भी
भोगा था। इस पर भी पुलिस की धमकी से
प्राण संकट में पड़ गए। आप ही हमारी
समिति के ऐसे सदस्य थे कि जिन पर
समिति का सबसे अधिक धन व्यय किया
शचीन्द्रनाथ बख्शी