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रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)

रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)

Autobiography of Ram Prasad Bismil

पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

पृष्ठ 56, कुल 128 में से

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पृष्ठ 56

44 रामप्रसाद बिस्मिल कीं आत्मकथा
सप्ताह तक बूट तथा वर्दी न उतारते थे।
जब आप ब्रह्मचारी जी के पास सहायता
लेने गए, तो दुर्भाग्यवश गिरफ़्तार कर लिए
गए। ब्रह्मचारी के दल ने अंग्रेजी राज्य में
कई डाके डाले थे। डाके डालकर ये लोग
चंबल के बीहड़ों में छिप जाते थे। सरकारी
राज्य की ओर से ग्वालियर महाराज को
लिखा गया। इस दल के पकड़ने का प्रबंध
किया गया। सरकार ने तो हिन्दुस्तानी
फौज भी भेजी थी, जो आगरा जिले में
चंबल के किनारे बहुत दिनों तक पड़ी रही।
पुलिस सवार तैनात किए, फिर भी ये लोग
भयभीत न हुए। विश्वासघात से पकड़े गए।
इन्हीं का एक आदमी पुलिस ने मिला लिया।
डाका डालने के लिए दूर एक स्थान निश्चय
किया गया, जहाँ तक जाने के लिए एक
पड़ाव देना पड़ता था। चलते-चलते सब थक
[चित्र-परिचय: गेंदालाल दीक्षित] गए, पड़ाव दिया गया। जो आदमी पुलिस
से मिला हुआ था, उसने भोजन लाने को कहा, क्योंकि उसके किसी संबंधी का
मकान निकट था। वह पूड़ी बनवाकर लाया। सब पूड़ी खाने लग गए। ब्रह्मचारी
जी जो सदैव अपने हाथ से बनाकर भोजन करते थे या आलू अथवा घुइयाँ
भूनकर खा लेते थे, उन्होंने भी उस दिन पूड़ी खाना स्वीकार किया। सब भूखे तो
थे ही, खाने लगे। ब्रह्मचारी जी ने भी एक पूड़ी ही खाई। उनकी जबान ऐंठने
लगी और जो अधिक खा गए थे, वे गिर गए। पूड़ी लाने वाला पानी लेने के
बहाने चल दिया। पूड़ियों में विष मिला हुआ था। ब्रह्मचारी जी ने बंदूक उठाकर