रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)
Autobiography of Ram Prasad Bismil
पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
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बिगड़ रही थी। रोग भीषण रूप धारण कर रहा था। छोटे भाई तथा पत्नी को
बुलाया। भाई किंकर्त्तव्यविमूढ़। वह क्या कर सकता था ? सरकारी अस्पताल में
भर्ती कराने ले गया। पंडितजी की धर्मपत्नी को दूसरे स्थान में भेजकर जब वह
अस्पताल आया, तो जो देखा उसे लिखते हुए लेखनी काँपने लगती है।
पंडितजी शरीर त्याग चुके थे। केवल उनका मृत शरीरमात्र ही पड़ा हुआ था।
स्वदेश की कार्य सिद्धि में पं. गेंदालालजी दीक्षित ने जिस निःसहाय अवस्था में
अंतिम बलिदान दिया, उसकी स्वप्न में भी आशंका न थी। पंडितजी की प्रबल
इच्छा थी कि उनकी मृत्यु गोली लगकर हो। भारतवर्ष की एक महान आत्मा
विलीन हो गई और देश में किसी ने जाना भी नहीं। आपकी विस्तृत जीवनी
"प्रभा" मासिक पत्रिका में प्रकाशित हो चुकी है। मैनपुरी षड्यंत्र के मुख्य नेता
आप ही समझे गए थे। इस षड्यंत्र में खास बात यह हुई कि नेताओं में से
केवल दो व्यक्ति पुलिस के हाथ आए, जिनमें गेंदालाल दीक्षित एक सरकारी
गवाह को लेकर भाग गए, श्री शिवकृष्ण जेल से भाग गए, फिर हाथ न आए।
छः मास के बाद जिन्हें सजा हुई वे भी राजकीय घोषणा से मुक्त कर दिए
गए। खुफिया पुलिस विभाग का क्रोध पूर्णतया शांत न हो सका और उनकी
बदनामी भी इस केस में बहुत हुई।