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रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)

रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)

Autobiography of Ram Prasad Bismil

पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

पृष्ठ 60, कुल 128 में से

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पृष्ठ 60
48रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा

लाइसेंस इत्यादि सब डाल जाते थे कि मेरे यहाँ उनकी वस्तुएँ सुरक्षित रहेंगी।
समय के इस फेर को देखकर मुझे हँसी आती थी।
इस प्रकार कुछ समय बीता। दो-चार ऐसे पुरुषों से भेंट हुई, जिनको पहले
मैं बड़ी श्रद्धा की दृष्टि से देखता था। उन लोगों ने मेरी पलायनावस्था के संबंध
में कुछ समाचार सुने थे। मुझसे मिलकर वे बड़े प्रसन्न हुए। मेरी लिखी हुई
पुस्तकें भी देखीं। इस समय मैं तीसरी पुस्तक "कैथेराइन" लिख चुका था। मुझे
पुस्तकों के व्यवसाय में बहुत घाटा हो चुका था। मैंने माला का प्रकाशन स्थगित
कर दिया। "कैथेराइन" एक पुस्तक-प्रकाशक को दे दी। उन्होंने बड़ी कृपा कर
उस पुस्तक को थोड़े से हेर-फेर के साथ प्रकाशित कर दिया। "कैथेराइन" को
देखकर मेरे इष्ट मित्रों को बड़ा हर्ष हुआ। उन्होंने मुझे पुस्तक लिखते रहने के
लिए बड़ा उत्साहित किया। मैंने "स्वदेशी रंग" नामक एक और पुस्तक लिखकर
एक पुस्तक-प्रकाशक को दी। वह भी प्रकाशित हो गई।
बड़े परिश्रम के साथ मैंने एक पुस्तक "क्रांतिकारी जीवन" लिखी। "क्रांतिकारी
जीवन" को कई पुस्तक-प्रकाशकों ने देखा, पर किसी का साहस न हो सका कि
उसको प्रकाशित करे। आगरा, कानपुर, कलकत्ता आदि कई स्थानों में घूमकर
पुस्तक मेरे पास लौट आई। कई मासिक पत्रिकाओं में "राम" तथा "अज्ञात"
नाम से मेरे लेख प्रकाशित हुआ करते थे। लोग बड़े चाव से उन लेखों का पाठ
करते थे। मैंने किसी स्थान पर लेखन शैली का नियमपूर्वक अध्ययन न किया
था। बैठे-बैठे खाली समय में ही कुछ लिखा करता और प्रकाशनार्थ भेज दिया
करता था। अधिकतर बंगला तथा अंग्रेजी की पुस्तकों से अनुवाद करने का ही
विचार था। थोड़े समय के पश्चात् श्री अरविन्द घोष की बंगला पुस्तक "योगिक
साधन" का अनुवाद किया। दो-एक पुस्तक-प्रकाशकों को दिखाया पर वे बहुत
कम धन देकर पुस्तक लेना चाहते थे। आजकल के समय में हिन्दी के लेखकों
तथा अनुवादकों की अधिकता के कारण पुस्तक-प्रकाशकों को भी बड़ा अभिमान
हो गया है। बड़ी कठिनाई से बनारस के एक प्रकाशक ने "योगिक साधन"