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सर्वकोश
रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)

रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)

Autobiography of Ram Prasad Bismil

पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

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पृष्ठ 51

Uploaded By Rajesh Tanti.

स्वदेश-प्रेम ३९
लखनऊ की गाड़ी पाँच बजे जाती थी। दारोगा जी को शक हुआ। लालटेन आई,
हम लोगों के चेहरे रोशनी में देखकर उनका शक जाता रहा। कहने लगे- "रात
के समय लालटेन लेकर चला कीजिए। गलती हुई, माफ कीजिए।" हम लोग भी
सलाम झाड़कर चलते बने। एक बाग में फूँस की मड़ैया पड़ी थी। उसमें जा बैठे।
पानी बरसने लगा। मूसलाधार पानी गिरा। सब कपड़े भीग गए। जमीन पर भी
पानी भर गया। जनवरी का महीना था। खूब जाड़ा पड़ रहा था। रातभर भीगते
और ठिठुरते रहे। बड़ा कष्ट हुआ। प्रातःकाल धर्मशाला में जाकर कपड़े सुखाए।
दूसरे दिन शाहजहाँपुर आकर, बंदूकें जमीन में गाड़कर प्रयाग पहुँचे।
विश्वासघात
प्रयाग (इलाहाबाद) की एक धर्मशाला में दो-तीन दिन निवास करके विचार
किया गया कि एक व्यक्ति बहुत कमजोर है, यदि वह पकड़ा गया तो सब भेद
खुल जाएगा, अतः उसे मार दिया जाए। मैंने कहा- "मनुष्य-हत्या ठीक नहीं।"
पर अंत में निश्चय हुआ कि कल चला जाए और उसकी हत्या कर दी जाए। मैं
चुप हो गया। हम लोग चार सदस्य साथ थे। हम चारों तीसरे पहर झूँसी का
किला देखने गए। जब लौटे तब संध्या हो चुकी थी। उसी समय गंगा पार करके
यमुना-तट पर गए। शौचादि से निवृत्त होकर मैं संध्या समय उपासना करने के
लिए रेती पर बैठ गया। एक महाशय ने कहा- "यमुना के निकट बैठो।" मैं
तट से दूर एक ऊँचे स्थान पर बैठा था। मैं वहीं बैठा रहा। वे तीनों भी मेरे
पास ही आकर बैठ गए। मैं आँखें बंद किए ध्यान कर रहा था। थोड़ी देर में
खट से आवाज़ हुई। समझा कि साथियों में से कोई कुछ कर रहा होगा। तुरंत
ही फायर हुआ। गोली सन से मेरे कान के पास से निकल गई। मैं समझ गया
कि मेरे ऊपर ही फायर हुआ है। मैं रिवाल्वर निकालता हुआ आगे को बढ़ा।
पीछे फिर कर देखा, वह महाशय माउज़र हाथ में लिए मेरे ऊपर गोली चला रहे
हैं। कुछ दिन पहले मुझसे उनका झगड़ा हो चुका था, किन्तु बाद में समझौता हो