रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)
Autobiography of Ram Prasad Bismil
पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
पृष्ठ 59, कुल 128 में से
संदर्भ में पढ़ेंतृतीय खण्ड
स्वतंत्र जीवन
राजकीय घोषणा के पश्चात् जब मैं शाहजहाँपुर आया तो शहर की अद्भुत
दशा देखी। कोई पास तक खड़े होने का साहस न करता था। जिसके पास मैं
जाकर खड़ा हो जाता था, वह नमस्ते कर चल देता था। पुलिस का बड़ा प्रकोप
था। प्रत्येक समय वह छाया की भाँति पीछे-पीछे फिरा करती थी। इस प्रकार का
जीवन कब तक व्यतीत किया जाए ? मैंने कपड़ा बुनने का काम सीखना आरंभ
किया। जुलाहे बड़ा कष्ट देते थे। कोई काम सिखाना नहीं चाहता था। बड़ी
कठिनता से मैंने कुछ काम सीखा। उसी समय एक कारखाने में मैनेजरी का
स्थान खाली हुआ। मैंने उस स्थान के लिए प्रयत्न किया। मुझसे पाँच सौ रुपये
की जमानत माँगी गई। मेरी दशा बड़ी शोचनीय थी। तीन-तीन दिवस तक भोजन
प्राप्त नहीं होता था, क्योंकि मैंने प्रतिज्ञा की थी कि किसी से कुछ सहायता न
लूँगा। पिताजी से बिना कुछ कहे मैं चला आया था। मैं पाँच सौ रुपये कहाँ से
लाता ? मैंने दो-एक मित्रों से केवल दो सौ रुपये की जमानत देने की प्रार्थना
की। उन्होंने साफ इन्कार कर दिया। मेरे हृदय पर वज्रपात हुआ। संसार अंधकारमय
दिखाई देता था। पर बाद में एक मित्र की कृपा से नौकरी मिल गई। अब
अवस्था कुछ सुधरी। मैं भी सभ्य पुरुषों की भाँति समय व्यतीत करने लगा। मेरे
पास भी चार पैसे हो गए। वे ही मित्र, जिनसे मैंने दो सौ रुपये की जमानत देने
की प्रार्थना की थी, अब मेरे पास चार-चार हजार रुपयों की थैली, अपनी बंदूक,