रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)
Autobiography of Ram Prasad Bismil
पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंस्वतंत्र जीवन 49
प्रकाशित करने का वचन दिया। पर थोड़े दिनों में वह स्वयं ही अपने साहित्य
मंदिर में ताला डालकर कहीं पधार गए। पुस्तक का अब तक कोई पता न लगा।
पुस्तक अति उत्तम थी। प्रकाशित हो जाने से हिन्दी साहित्य-सेवियों को अच्छा
लाभ होता। मेरे पास जो “बोलशेविक करतूत” तथा “मन की लहर” की प्रतियाँ
बची थीं, वे मैंने लागत से भी कम मूल्य पर कलकत्ता के एक व्यक्ति श्री
दीनानाथ सगतिया को दे दीं। वहुत थोड़ी पुस्तकें मैंने बेची थीं। दीनानाथ महाशय
पुस्तकें हड़प कर गए। मैंने नोटिस दिया। नालिश की। लगभग चार सौ रुपये की
डिग्री भी हुई, किन्तु दीनानाथ महाशय का कहीं पता न चला। वह कलकत्ता
छोड़कर पटना गए। पटना भी कई गरीबों का रुपया मारकर कहीं छिप गए।
अनुभव-हीनता' से इस प्रकार ठोकरें खानी पड़ीं। कोई पथ-प्रदर्शक तथा सहायक
नहीं था, जिससे परामर्श करता। व्यर्थ के उद्योग धंधों तथा स्वतंत्र कार्यों में शक्ति
का व्यय करता रहा।
पुनर्संगठन
जिन महानुभावों को मैं पूजनीय दृष्टि से देखता था, उन्हीं ने अपनी इच्छा
प्रकट की कि मैं क्रांतिकारी दल का पुनः संगठन करूँ। गत जीवन के अनुभव से
मेरा हृदय अत्यंत दुखी था। मेरा साहस न देखकर इन लोगों ने बहुत उत्साहित
किया और कहा कि हम आपको केवल निरीक्षण का कार्य देंगे, बाकी सब कार्य
स्वयं करेंगे। कुछ मनुष्य हमने पहले जुटा लिए हैं, धन की कमी न होगी, आदि।
मान्य पुरुषों की प्रवृत्ति देखकर मैंने भी स्वीकृति दे दी। मेरे पास जो अस्त्र-शस्त्र
थे, मैंने दिए। जो दल उन्होंने एकत्रित किया था, उसके नेता से मुझे मिलाया।
उसकी वीरता की बड़ी प्रशंसा की। वह एक अशिक्षित ग्रामीण पुरुष था। मेरी
समझ में आ गया कि यह बदमाशों का या स्वार्थी जनों का कोई संगठन है।
मुझसे उस दल के नेता ने दल का कार्य निरीक्षण करने की प्रार्थना की। दल में
कई फौज तथा लड़ाई पर से वापस किए गए व्यक्ति थे। मुझे इस प्रकार के