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रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)

रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)

Autobiography of Ram Prasad Bismil

पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

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पृष्ठ 65

स्वतंत्र जीवन 53
उस पर उसके हाथों की दसों अंगुलियों के निशान लगवाए कि वह ऐसा काम
फिर नहीं करेगा। दसों अंगुलियों के निशान देने में उसने कुछ ढील की। मैंने
रिवाल्वर उठाकर कहा कि गोली चलती है, उसने तुरंत दसों अंगुलियों के निशान
बना दिए। बुरी तरह काँप रहा था। मेरे उन्नीस रुपये खर्च हो चुके थे। मैंने
दोनों नोट रख लिए और शीशे, दवाएँ आदि सब छीन लिए कि मित्रों को तमाशा
दिखाऊँगा। तत्पश्चात् उन महाशय को विदा किया। उसने किया यह था कि जब
अपने साथी को आग पर गरम करने के लिए कागज की पुड़िया दी थी, उसी
समय वह साथी सादे कागज की पुड़िया बदलकर दूसरी पुड़िया ले आया जिसमें
दोनों नोट थे। इस प्रकार नोट बन गया।
इस प्रकार का एक बड़ा भारी दल है, जो सारे भारत में ठगी का काम
करके हज़ारों रुपये पैदा करता है। मैं एक सज्जन को जानता हूँ जिन्होंने इसी
प्रकार पचास हज़ार से अधिक रुपये पैदा किए हैं। होता यह है कि ये लोग
अपने एजेंट रखते हैं। वे एजेंट साधारण पुरुषों के पास जाकर नोट बनाने की
कथा कहते हैं। आता धन किसे बुरा लगता है ? वे नोट बनवाते हैं। इस
प्रकार पहले दस का नोट बनाकर दिया, वे बाज़ार में बेच आए। सौ रुपये का
बनाकर दिया वह भी बाज़ार में चलाया, और चल क्यों न जाए ? इस प्रकार
के सब नोट असली होते हैं। वे तो केवल चाल से रख दिए जाते हैं। इसके
बाद कहा कि हज़ार या पाँच सौ का नोट लाओ तो कुछ धन भी मिले।
जैसे-तैसे करके बेचारा एक हज़ार का नोट लाया। सादा कागज रखकर शीशे में
बाँध दिया। हज़ार का नोट जेब में रखा और चंपत हुए। नोट के मालिक
रास्ता देखते हैं, वहाँ नोट बनाने वालों का पता ही नहीं। अंत में विवश हो
शीशों को खोला जाता है, तो दो सादे कागजों के अलावा कुछ नहीं मिलता।
वे अपने सिर पर हाथ मारकर रह जाते हैं। इस डर से कि यदि पुलिस को
मालूम हो गया तो और लेने के देने पड़ेंगे, किसी से कुछ कह भी नहीं सकते।
कलेजा मसोसकर रह जाते हैं। पुलिस ने इस प्रकार के कुछ अभियुक्तों को