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रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)

रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)

Autobiography of Ram Prasad Bismil

पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

पृष्ठ 55, कुल 128 में से

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पृष्ठ 55

स्वदेश-प्रेम 43
कई बैल, गाय तथा भैंस लेकर ऊसर में चराने के लिए जाया करता था। खाली
बैठा रहना पड़ता था, अतएव कापी-पेंसिल साथ ले जाता और पुस्तक का अनुवाद
किया करता था। पशु जब कहीं दूर निकल जाते तब अनुवाद छोड़ लाठी लेकर
उन्हें हकारने जाया करता था। कुछ समय के लिए एक साधु की कुटी पर जाकर
रहा। वहाँ अधिक समय अनुवाद करने में व्यतीत करता था। खाने के लिए आटा
ले जाता था। चार-पाँच दिन के लिए इकट्ठा आटा रखता था। भोजन स्वयं पका
लेता था। जब पुस्तक ठीक हो गई, तो "सुशील माला" के नाम से ग्रंथमाला
निकाली। पुस्तक का नाम "बोलशेविकों की करतूत" रखा। दूसरी पुस्तक "मन
की लहर" छपवाई। इस व्यवसाय में लगभग पाँच सौ रुपये की हानि हुई। जब
राजकीय घोषणा हुई और राजनैतिक कैदी छोड़े गए, तब शाहजहाँपुर आकर कोई
व्यवसाय करने का विचार हुआ, ताकि माता-पिता की कुछ सेवा हो सके। विचार
किया करता था कि इस जीवन में अब फिर कभी आजादी से शाहजहाँपुर विचरण
न कर सकूँगा, पर परमात्मा की लीला अपार है। वे दिन आए। मैं पुनः
शाहजहाँपुर का निवासी हुआ।
पंडित गेंदालाल दीक्षित
आपका जन्म यमुना-तट पर बटेश्वर के निकट "मई" गाँव में हुआ था।
आपने दसवाँ दर्जा अंग्रेजी का पास किया था। आप जब औरैया जिला इटावा में
डी.ए.वी. स्कूल में अध्यापक थे, तब आपने शिवाजी समिति की स्थापना की थी,
जिसका उद्देश्य था शिवाजी की भाँति दल बनाकर धन एकत्र करना और उससे
हथियार खरीदना और उसे दल में बाँटना। इसकी सफलता के लिए आप रियासत
से हथियार ला रहे थे जो कुछ नवयुवकों की असावधानी के कारण आगरा में
स्टेशन के निकट पकड़ लिए गए थे। आप बड़े वीर तथा उत्साही थे। शांत बैठना
जानते ही न थे। नवयुवकों को सदैव कुछ-न-कुछ उपदेश देते रहते थे। एक-एक