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रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)

Autobiography of Ram Prasad Bismil

पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

6 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
गृहस्थ जीवन
विवाह हो जाने के बाद पिताजी म्युनिसिपैलिटी में पंद्रह रुपये मासिक वेतन
पर नौकर हो गए। उन्होंने कोई बड़ी शिक्षा प्राप्त न की थी। पिताजी को यह
नौकरी पसंद न आई। उन्होंने एक दो साल के बाद नौकरी छोड़ कर स्वतंत्र
व्यवसाय आरंभ करने का प्रयत्न किया और कचहरी (अदालत) में सरकारी स्टाम्प
बेचने लगे। उनके जीवन का अधिक भाग इसी व्यवसाय में व्यतीत हुआ। साधारण श्रेणी
के गृहस्थ बनकर उन्होंने इसी व्यवसाय द्वारा अपनी संतानों को शिक्षा दी, अपने
परिवार का पालन किया और अपने मुहल्ले के प्रतिष्ठित व्यक्तियों में गिने जाने
लगे। वह रुपये का लेन-देन भी करते थे। उन्होंने तीन बैलगाड़ियाँ भी बनाई थीं,
जो किराये पर चला करती थीं। पिताजी को व्यवसाय से प्रेम था। उनका शरीर बड़ा
मजबूत और सुडौल था। वह नियमपूर्वक अखाड़े में कुश्ती लड़ा करते थे।
पिताजी के घर में एक पुत्र उत्पन्न हुआ किन्तु वह मर गया। उसके एक
साल बाद लेखक (श्री रामप्रसाद) ने ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष 11 सम्वत् 1954 विक्रमी
को जन्म लिया। बड़े प्रयत्नों से मनौती मानकर अनेक गंडे, ताबीज तथा कवचों
द्वारा श्री दादाजी ने इस शरीर की रक्षा के लिए प्रयत्न किया। सम्भवतः हमारे घर
में बालकों का कोई रोग प्रवेश कर गया था। अतएव जन्म लेने के एक या दो
मास बाद मेरे शरीर की दशा भी पहले बालक जैसी होने लगी। किसी ने बताया
कि सफेद खरगोश को मेरे शरीर पर घुमाकर जमीन पर छोड़ दिया जाए, यदि
बीमारी होगी तो खरगोश तुरंत मर जाएगा। कहते हैं हुआ भी ऐसा ही। एक
सफेद खरगोश मेरे शरीर पर से उतारकर जैसे ही जमीन पर छोड़ा गया, वैसे ही
उसने तीन-चार चक्कर काटे और मर गया। मेरे विचार में किसी अंश में यह
सम्भव भी है, क्योंकि औषधि तीन प्रकार की होती हैं- 1. दैविक (ईश्वरीय),
2. मानुषिक और 3. पैशाचिक। पैशाचिक औषधियों में अनेक प्रकार के पशु या
पक्षियों के मांस या रक्त का उपयोग किया जाता है, जिसका उपयोग वैद्यक के

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आत्म-चरित्र 7

ग्रंथों में पाया जाता है। इनमें से एक बड़ा चमत्कारक तथा आश्चर्यजनक प्रयोग
यह है कि जिस बच्चे को सूखे की बीमारी हो गई हो, यदि उसके सामने
चमगादड़ चीर कर लाया जाए तो एक-दो मास का बालक चमगादड़ को पकड़
कर खून चूस लेगा और बीमारी जाती रहेगी। यह बड़ी उपयोगी औषधि है और
एक महात्मा की बताई हुई है।
जब मैं सात वर्ष का हुआ तो पिताजी ने स्वयं ही मुझे हिन्दी अक्षरों का
लिखना सिखाया और एक मौलवी साहब के मकतब (विद्यालय) में उर्दू पढ़ने के
लिए भेज दिया। मुझे भली भाँति स्मरण है कि पिताजी अखाड़े में कुश्ती लड़ने
जाते थे और अपने से वलिष्ठ (मजबूत) तथा शरीर में डेढ़ गुने पट्ठे को पटक
देते थे। कुछ दिनों बाद पिताजी का एक बंगाली (श्री चटर्जी) महाशय से प्रेम हो
गया। चटर्जी महाशय की अंग्रेजी दवा की दुकान थी। वह बड़े भारी नशाबाज
थे। एक समय में आधा छटाँक चरस की चिलम उड़ाया करते थे। उन्हीं की
संगत में पिताजी ने चरस पीना सीख लिया, जिसके कारण उनका शरीर काफी
कमजोर हो गया। दस वर्ष में ही संपूर्ण शरीर सूख कर हड्डियाँ निकल आईं।
चटर्जी महाशय शराब भी पीने लगे। अतएव उनका कलेजा बढ़ गया और उसी
से उनकी मृत्यु हो गई। मेरे बहुत कुछ समझाने पर पिताजी ने अपनी चरस पीने
की आदत को छोड़ा, किन्तु बहुत दिनों के बाद।
मेरे बाद पाँच बहनों और तीन भाइयों का जन्म हुआ। दादीजी ने कहा कि
कुल की प्रथा के अनुसार कन्याओं को मार डाला जाए, किन्तु माताजी ने इसका
विरोध किया और कन्याओं के प्राणों की रक्षा की। मेरे कुल में यह पहला ही
समय था कि कन्याओं का पोषण हुआ। पर इनमें से दो बहनों और दो भाइयों
का देहांत हो गया। शेष एक भाई इस समय (1927) दस वर्ष का है और तीन
बहनें बचीं। माताजी के प्रयत्न से तीनों बहनों को अच्छी शिक्षा दी गई और
उनके विवाह बड़ी धूमधाम से किए गए। इससे पूर्व हमारे कुल की कन्याएँ किसी
को नहीं ब्याही गईं, क्योंकि वे जीवित ही नहीं रही थीं।

8 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
दादाजी बड़ी सरल प्रकृति के मनुष्य थे। जब तक वे जीवित रहे, पैसे बेचने
का ही व्यवसाय करते रहे। उनको गाय पालने का बहुत बड़ा शौक था। स्वयं
ग्वालियर जाकर बड़ी-बड़ी गायें खरीद लाते थे। वहाँ की गायें काफी दूध देती हैं।
ये गायें बड़ी सीधी भी होती हैं। दूध दूहते समय उनकी टाँगें बाँधने की
आवश्यकता नहीं होती और जब जिसका जी चाहे बिना बच्चे के दूध दूह सकता
है। बचपन में मैं अक्सर जाकर गाय के थन में मुँह लगाकर दूध पिया करता
था। वास्तव में वहाँ की गायें दर्शनीय होती हैं।
दादाजी मुझे खूब दूध पिलाया करते थे। उन्हें अट्ठारह गोटी (बघिया बग्घा)
खेलने का बड़ा शौक था। शाम के समय रोजाना शिव-मंदिर में जाकर दो घंटे
तक परमात्मा का भजन किया करते थे। उनका लगभग पचपन वर्ष की आयु में
देहांत हुआ।
बचपन से ही पिताजी मेरी शिक्षा का अधिक ध्यान रखते थे और जरा-सी
भूल करने पर बहुत पीटते थे। मुझे यह बात अब भी बहुत अच्छी तरह याद है
कि जब मैं देवनागरी (हिन्दी) के अक्षर लिखना सीख रहा था तो मुझे "उ"
लिखना न आया। मैंने बहुत प्रयत्न किया। पर जब पिताजी कचहरी चले गए तो
मैं भी खेलने चला गया। पिताजी ने कचहरी से आकर मुझसे "उ" लिखवाया, मैं
लिख न सका। उन्हें मालूम हो गया कि मैं खेलने चला गया था। इस पर उन्होंने
मुझे बंदूक के लोहे के गज से इतना पीटा कि गज टेढ़ा पड़ गया। मैं भाग कर
दादीजी के पास चला गया, तब बचा। मैं छोटेपन से ही बहुत शरारती था।
पिताजी के पर्याप्त शासन रखने पर भी शरारत करता था। एक समय किसी के
बाग में जाकर आडू के वृक्षों में से सब आडू तोड़ डाले। माली पीछे दौड़ा, किन्तु
मैं उसके हाथ नहीं आया। माली ने सब आडू पिताजी के सामने ला रखे। उस
समय पिताजी ने मुझे इतना पीटा कि मैं दो दिन तक उठ नहीं सका। इसी
प्रकार खूब पिटता था, किन्तु शरारत अवश्य करता था। शायद उस बचपन की
मार से ही यह शरीर बहुत कठोर और सहनशील बन गया।

आत्म-चरित्र 9
मेरी कुमारावस्था
जब मैं उर्दू का चौथा दर्जा पास करके पाँचवें में आया उस समय मेरी आयु
लगभग चौदह वर्ष की होगी। इस बीच मुझे पिताजी के संदूक से रुपये-पैसे चुराने
की आदत पड़ गई थी। इन पैसों से उपन्यास खरीदकर खूब पढ़ता। पुस्तक
विक्रेता महाशय पिताजी के जान-पहचान के थे। उन्होंने मेरी पिताजी से शिकायत
की। अब मेरी कुछ जाँच होने लगी। मैंने उन महाशय के यहाँ से किताब
खरीदना ही छोड़ दिया। मुझमें दो-एक खराब आदतें भी पड़ गईं। मैं सिगरेट पीने
लगा। कभी-कभी भंग भी जमा लेता था। छोटी उम्र में स्वतन्त्रतापूर्वक पैसे हाथ
आ जाने से और उर्दू के प्रेम व रसपूर्ण उपन्यासों और ग़ज़लों की पुस्तकों ने मेरे
चरित्र पर भी अपना बुरा प्रभाव दिखाना आरम्भ कर दिया। घुन लगना आरंभ
हुआ ही था कि परमात्मा ने बड़ी सहायता की। मैं एक रोज भंग पीकर पिताजी
की संदूकची में से रुपये निकालने गया। नशे की हालत में होश ठीक न रहने
के कारण संदूकची खटक गई। माताजी को संदेह हुआ। उन्होंने मुझे पकड़ा दिया।
चाभी भी पकड़ी गई। मेरे संदूक की तलाशी ली गई, बहुत से रुपये निकले और
सारा भेद खुल गया। मेरी किताबों में कई उपन्यास आदि भी पाए गए जो उसी
समय फाड़ डाले गए।
परमात्मा की कृपा से मेरी चोरी पकड़ ली गई, नहीं तो दो चार वर्ष में न
दीन का रहता न दुनिया का। इसके बाद भी मैंने बहुत घातें लगाईं, किन्तु
पिताजी ने संदूकची का ताला बदल दिया था। मेरी कोई चाल न चल सकी। अब
जब कभी भी मौका मिल जाता तो माताजी के रुपयों पर हाथ फेर देता था।
इसी प्रकार की बुरी आदतों के कारण दो बार उर्दू मिडिल की परीक्षा में उत्तीर्ण
न हो सका। तब मैंने अंग्रेज़ी पढ़ने की इच्छा प्रकट की। पिताजी मुझे अंग्रेज़ी
पढ़ाना न चाहते थे और किसी कारोबार में लगाना चाहते थे, किन्तु माताजी की
कृपा से मैं अंग्रेज़ी पढ़ने भेजा गया। दूसरे वर्ष जब मैं उर्दू मिडिल की परीक्षा में
फेल हुआ उसी समय पड़ोस के देव-मंदिर में, जिसकी दीवार मेरे मकान से मिली

10 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
थी, एक पुजारी जी आ गए। वह बहुत अच्छे चरित्र वाले व्यक्ति थे। मैं उनके
पास उठने-बैठने लगा।
मैं मंदिर में आने-जाने लगा। कुछ पूजा-पाठ भी सीखने लगा। मुझ पर
पुजारी जी के उपदेशों का बड़ा उत्तम प्रभाव हुआ। मैं अपना अधिक समय
भजन-पूजन तथा पढ़ने में बिताने लगा। पुजारीजी मुझे ब्रह्मचर्य का पालन करने
का उपदेश देते थे। वह मेरे पथ-प्रदर्शक बने। मैंने एक-दूसरे सज्जन की देखा-देखी
व्यायाम करना भी आरंभ कर दिया। अब तो मुझे भक्ति-मार्ग में कुछ आनंद
प्राप्त होने लगा और चार-पाँच महीने में ही व्यायाम भी खूब करने लगा। मेरी
सब बुरी आदतें और बुरी भावनाएँ जाती रहीं। स्कूलों की छुट्टियाँ समाप्त होने पर
मैंने मिशन स्कूल के अंग्रेजी के पाँचवें दर्जे में नाम लिखा लिया। इस समय मेरी
और सब बुरी आदतें तो छूट गई थीं, किन्तु सिगरेट पीना न छूटता था। मैं
सिगरेट बहुत पीता था। एक दिन में पचास-साठ सिगरेट पी डालता था। मुझे
बड़ा दुख होता था कि मैं इस जीवन में सिगरेट पीने की बुरी आदत को न छोड़
सकूँगा। स्कूल में भरती होने के थोड़े दिनों बाद ही एक सहपाठी श्री सुशीलचंद
सेन से कुछ विशेष स्नेह हो गया। उन्हीं की दया के कारण मेरा सिगरेट पीना
भी छूट गया।
देव-मंदिर में भजन-पूजा करने की प्रवृत्ति को देखकर श्री मुंशी इन्द्रजीत जी
ने मुझे संध्या करने का उपदेश दिया। मुंशीजी उसी मंदिर में रहने वाले किसी
सज्जन के पास आया करते थे। व्यायाम करने के कारण मेरा शरीर बड़ा सुगठित
हो गया था और रंग निखर आया था। मैंने जानना चाहा कि संध्या क्या वस्तु
है। मुंशीजी ने आर्य-समाज संबंधी कुछ उपदेश दिए। इसके बाद मैंने सत्यार्थ
प्रकाश (आर्यसमाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा लिखित ग्रंथ) पढ़ा।
इससे तख्ता ही पलट गया। सत्यार्थ प्रकाश के अध्ययन ने मेरे जीवन के इतिहास
में एक नया पृष्ठ खोल दिया। मैंने उसमें लिखित ब्रह्मचर्य के कठिन नियमों का
पालन करना प्रारंभ कर दिया। मैं एक कंबल को तख्त पर बिछा कर सोता और

आत्म-चरित्र 11
प्रातःकाल चार बजे ही बिस्तर से उठ जाता था। स्नान और संध्या आदि करने
के बाद व्यायाम करता, परंतु मन की भावनाएँ ठीक न होतीं। मैंने रात के समय
भोजन करना भी छोड़ दिया। रात को केवल थोड़ा दूध ही पीने लगा। मिर्च
खटाई तो छूता भी न था। मेरा स्वास्थ्य भी दर्शनीय हो गया। सब लोग मेरे
स्वास्थ्य को आश्चर्य से देखा करते थे।
मैं थोड़े दिनों में ही बड़ा कट्टर आर्यसमाजी हो गया। आर्यसमाज के
अधिवेशन में आता-जाता। संन्यासी महात्माओं के उपदेशों को बड़ी श्रद्धा से
सुनता। जब कोई संन्यासी आर्यसमाज में आता तो उसकी हर प्रकार से सेवा
करता, क्योंकि मेरी प्राणायाम सीखने की बहुत इच्छा थी। जिस संन्यासी का नाम
सुनता शहर से तीन-चार मील उसकी सेवा के लिए जाता। मैं इस बात की
परवाह नहीं करता कि वह संन्यासी किस मत का अनुयायी है। जब मैं अंग्रेजी
के सातवें दर्जे में था तब सनातनधर्मी पंडित जगत प्रसाद जी शाहजहाँपुर पधारे।
उन्होंने आर्यसमाज का खंडन करना शुरू किया। आर्यसमाजियों ने भी उनका
विरोध किया और पंडित अखिलानंदजी को बुलाकर शास्त्रार्थ (शास्त्रों का सही
अर्थ जानने के लिए बहस) कराया। शास्त्रार्थ संस्कृत में हुआ। जनता पर अच्छा
प्रभाव पड़ा। मेरे कामों को देखकर मुहल्ले वालों ने पिताजी से मेरी शिकायत की।
पिताजी ने मुझसे कहा कि आर्यसमाजी हार गए। अब तुम आर्यसमाज से अपना
नाम कटा दो। मैंने पिताजी से कहा कि आर्यसमाज के सिद्धांत विश्वव्यापी हैं,
उन्हें कौन हरा सकता है ? अनेक वाद-विवाद के पश्चात् पिताजी जिद्द पकड़ गए
कि आर्यसमाज से त्यागपत्र नहीं देगा तो मैं तुझे रात में सोते समय मार दूँगा,
या तो आर्यसमाज से त्यागपत्र दे दे या घर छोड़ दे।
मैंने यह सोचा कि पिताजी का क्रोध यदि अधिक बढ़ गया और उन्होंने
मुझ पर कोई ऐसी वस्तु दे पटकी जिससे बुरा परिणाम हुआ तो अच्छा न होगा।
अतएव घर छोड़कर चला जाना ही अच्छा है। मैं केवल एक कमीज पहने खड़ा
था और पायजामा उतार कर धोती पहन रहा था। पायजामे के नीचे लंगोट बँधा

12 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
था। पिताजी ने हाथ से धोती छीन ली और कहा, “घर से निकल।” मुझे भी
क्रोध आ गया। मैं पिताजी के पैर छूकर गृह त्याग कर चला गया। कहाँ जाऊँ
कुछ समझ में न आया। शहर में किसी से जान-पहचान न थी कि जहाँ छिपा
रहता। मैं जंगल की ओर चला गया। एक रात और एक दिन मैं पेड़ पर बैठा
रहा। भूख लगने पर खेतों में से हरे चने तोड़कर खाए, नदी में स्नान किया और
जलपान किया। दूसरे दिन शाम को पं. अखिलांनद जी का व्याख्यान आर्यसमाज
में था। मैं आर्यसमाज मंदिर में गया। एक पेड़ के नीचे एकांत में व्याख्यान सुन
रहा था कि पिताजी दो व्यक्तियों को लिए हुए आ पहुँचे और मैं पकड़ लिया
गया। वह उसी समय पकड़ कर मुझे हेडमास्टर के पास ले गए। हेडमास्टर साहब
ईसाई थे। मैंने उन्हें सारी बात कह सुनाई। उन्होंने पिताजी को समझाया कि
समझदार लड़के को मारना-पीटना ठीक नहीं। उन्होंने मुझे भी बहुत कुछ उपदेश
दिया। उस दिन से पिताजी ने कभी भी मुझ पर हाथ नहीं उठाया, क्योंकि मेरे घर से
निकल जाने पर घर में बहुत दुःख रहा। एक रात और एक दिन किसी ने भोजन नहीं
किया, सब बड़े दुखी हुए कि अकेला पुत्र न जाने नदी में डूब गया या रेल से
कट गया। पिताजी के हृदय को भी बहुत भारी धक्का पहुँचा। उस दिन से वह
मेरी हर बात सहन कर लेते थे। मैं काफी मेहनत से पढ़ता था और अपने दर्जे
में प्रथम श्रेणी में पास होता था। यह स्थिति आठवें दर्जे तक रही।
जब मैं आठवें दर्जे में था, उसी समय स्वामी श्री सोमदेव जी 'सरस्वती
आर्यसमाज शाहजहाँपुर में पधारे। उनके व्याख्यानों का जनता पर अच्छा प्रभाव
हुआ। कुछ सज्जनों के अनुरोध पर स्वामीजी कुछ दिनों के लिए शाहजहाँपुर
आर्यसमाज मंदिर में ठहर गए। स्वामीजी की तबियत भी कुछ खराब थी, इस
कारण शाहजहाँपुर का जलवायु लाभदायक देख कर वहाँ ठहरे थे। मैं उनके पास
आया-जाया करता था। मैंने स्वामीजी महाराज की बहुत सेवा की और इसी सेवा
के फलस्वरूप मेरे जीवन में नया परिवर्तन हो गया। मैं रात को दो-तीन बजे तक
और दिन भर उनकी सेवा करता रहा। अनेक प्रकार की औषधियों का प्रयोग

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आत्म-चरित्र 13

किया। कुछ व्यक्तियों ने बड़ी सहानुभूति दिखलाई परंतु रोग ठीक न हो सका।
स्वामीजी मुझे कई प्रकार के उपदेश दिया करते थे। मैं उन उपदेशों को सुनकर
उन पर अमल करने का पूरा प्रयत्न करता था। वास्तव में वह मेरे गुरुदेव तथा
पथ-प्रदर्शक थे। उनकी शिक्षाओं ने मेरे जीवन में आत्मिक बल का संचार किया
जिनके संबंध में मैं अलग से वर्णन करूँगा।
कुछ नवयुवकों ने मिलकर आर्यसमाज मंदिर में आर्य कुमार-सभा खोली थी,
जिसके साप्ताहिक अधिवेशन प्रत्येक शुक्रवार को हुआ करते थे। वहीं पर धार्मिक
पुस्तकों का पठन, विषय-विशेष पर निबंध-लेखन और पठन तथा वाद-विवाद होता
था। कुमार-सभा से ही मैंने जनता के सम्मुख बोलने का अभ्यास किया। प्रायः
कुमार-सभा के नवयुवक मिलकर शहर के मेलों में प्रचार करने जाया करते थे।
बाजारों में व्याख्यान देकर आर्यसमाज के सिद्धांतों का प्रचार करते थे। ऐसा
करते-करते मुसलमानों से बहस होने लगी। अतएव पुलिस ने झगड़े का भय
देखकर बाजारों में व्याख्यान देना बंद करा दिया। आर्यसमाज के सदस्यों ने
कुमार-सभा के प्रयत्न को देखकर उस पर अपना शासन जमाना चाहा, किन्तु
कुमार किसी का अनुचित शासन कब मानने वाले थे। आर्यसमाज के मंदिर में
ताला डाल दिया गया कि कुमार-सभा वाले आर्यसमाज मंदिर में अधिवेशन न
करें। यह भी कहा गया कि यदि वे वहाँ अधिवेशन करेंगे, तो पुलिस को बुलाकर
उन्हें मंदिर से निकलवा दिया जाएगा। कई महीनों तक हम लोग मैदान में अपनी
सभा के अधिवेशन करते रहे, किन्तु बालक ही तो थे, कब तक इस प्रकार कार्य
चला सकते थे ? कुमार-सभा टूट गई। तब आर्यसमाजियों को शांति हुई।
जब लखनऊ में कांग्रेस हुई तो अखिल भारतीय कुमार सम्मेलन का भी
वार्षिक अधिवेशन वहाँ हुआ। उस अवसर पर सबसे अधिक पुरस्कार लाहौर और
शाहजहाँपुर की कुमार सभाओं ने पाए थे, जिनकी प्रशंसा समाचार-पत्रों में
प्रकाशित हुई थी। उन्हीं दिनों मिशन स्कूल के एक विद्यार्थी से मेरा परिचय
हुआ। वह कभी-कभी कुमार-सभा में आ जाया करते थे। मेरे भाषण का उन पर

14 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
अधिक प्रभाव हुआ। वैसे तो वह मेरे मकान के निकट ही रहते थे। किन्तु आपस
में कोई मेल न था। बैठने-उठने से आपस में प्रेम बढ़ गया। वह एक ग्राम के
निवासी थे। जिस गाँव में उनका घर था वह गाँव बड़ा प्रसिद्ध है। वहाँ का
प्रत्येक निवासी अपने घर में बिना लाइसेंस अस्त्र-शस्त्र रखता है। बहुत से लोगों
के यहाँ बंदूक तथा तमंचे भी रहते हैं, जो गाँव में ही बन जाते हैं। ये सब
टोपीदार होते हैं। उनके पास भी एक नाली का छोटा-सा पिस्तौल था जिसे वह
अपने साथ शहर में रखते थे। जब मुझसे अधिक प्रेम बढ़ा तो उन्होंने वह
पिस्तौल मुझे रखने के लिए दिया। इस प्रकार के हथियार रखने की मेरी अधिक
इच्छा थी, क्योंकि मेरे पिता के कई शत्रु थे, जिन्होंने पिताजी पर अकारण ही
लाठियों का प्रहार किया था। मैं चाहता था कि यदि पिस्तौल मिल जाए तो मैं
पिताजी के शत्रुओं को मार डालूँ। यह एक नाली का पिस्तौल वह अपने पास
रखते तो थे, किन्तु उसको चलाकर न देखा था। मैंने उसे चलाकर देखा तो वह
नितांत बेकार सिद्ध हुआ। मैंने उसे ले जाकर एक कोने में डाल दिया। उनसे
स्नेह इतना बढ़ गया कि सायंकाल को मैं अपने घर से खीर की थाली ले जाकर
उनके साथ-साथ उनके मकान पर ही भोजन किया करता था। वह मेरे साथ श्री
स्वामी सोमदेवजी के पास भी जाया करते थे। उनके पिता जब शहर आए तो
उनको यह बड़ा बुरा मालूम हुआ। उन्होंने मुझसे अपने लड़के के पास न आने
या उसे कहीं साथ न ले जाने के लिए बहुत ताड़ना की और कहा कि यदि मैं
उनका कहना न मानूँगा तो वह गाँव से आदमी लाकर मुझे पिटवाएँगे। मैंने उनके
पास जाना-आना त्याग दिया, किन्तु वह मेरे यहाँ आते-जाते रहे।
लगभग अट्ठारह वर्ष की उम्र तक मैं रेल पर न चढ़ा था। मैं इतना दृढ़
सत्यवक्ता हो गया था कि एक समय रेल पर चढ़ कर तीसरे दर्जे का टिकट
खरीदा था, पर इंटर क्लास में बैठकर दूसरों के साथ-साथ चला गया। इस बात
से मुझे बड़ा खेद हुआ। मैंने अपने साथियों से अनुरोध किया कि यह तो एक
प्रकार की चोरी है। सबको मिलकर इंटर क्लास का भाड़ा स्टेशन मास्टर को दे

आत्म-चरित्र १५
देना चाहिए। एक समय मेरे पिताजी दीवानी में किसी पर दावा करके वकील से
कह गए थे कि जो काम हो वह मुझसे करा लें। कुछ आवश्यकता पड़ने पर
वकील साहब ने मुझे बुला भेजा और कहा कि मैं पिताजी के हस्ताक्षर वकालतनामे
पर कर दूँ। मैंने तुरंत उत्तर दिया कि यह तो धर्म के विरुद्ध होगा, इस प्रकार
का पाप मैं कदापि नहीं कर सकता। वकील साहब ने बहुत कुछ समझाया कि
एक सौ रुपये से अधिक का दावा है, मुकदमा खारिज हो जाएगा। किन्तु मुझ
पर कुछ भी प्रभाव न हुआ, न मैंने हस्ताक्षर किए। अपने जीवन में हमेशा सत्य
का आचरण करता था, चाहे कुछ हो जाए, सत्य बात कह देता था।
मेरी माता मेरे धर्म-कार्यों में तथा शिक्षादि में बड़ी सहायता करती थीं। वह
प्रातःकाल चार बजे ही मुझे जगा दिया करती थीं। मैं नित्य-प्रति नियमपूर्वक हवन
किया करता था। मेरी छोटी बहन का विवाह करने के लिए माताजी और पिताजी
ग्वालियर गए। मैं और श्री दादीजी शाहजहाँपुर में ही रह गए, क्योंकि मेरी
वार्षिक परीक्षा थी। परीक्षा समाप्त करके मैं भी बहन के विवाह में सम्मिलित होने
को गया। बारात आ चुकी थी। मुझे गाँव के बाहर ही मालूम हो गया कि बारात
में वेश्या आई है। मैं घर न गया और न बारात में सम्मिलित हुआ। मैंने विवाह
में कोई भी भाग न लिया। मैंने माताजी से थोड़े रुपये माँगे। माताजी ने मुझे
लगभग 125 रुपये दिए, जिनको लेकर मैं ग्वालियर गया। यह अवसर रिवाल्वर
खरीदने का अच्छा लगा। मैंने सुन रखा था कि रियासत में बड़ी आसानी से
हथियार मिल जाते हैं। बड़ी खोज की। टोपीदार बंदूक तथा पिस्तौल तो मिलते
थे, किन्तु कारतूसी हथियारों का कहीं पता नहीं लगा। पता लगा भी तो एक
महाशय ने मुझे ठग लिया और 75 रुपये में टोपीदार पाँच फायर करने वाला एक
रिवाल्वर दिया। रियासत की बनी हुई बारूद और थोड़ी-सी टोपियाँ दे दीं। मैं इसी
को लेकर बड़ा प्रसन्न हुआ। सीधा शाहजहाँपुर पहुँचा। रिवाल्वर को भरकर
चलाया तो गोली केवल पंद्रह या बीस गज पर ही गिरी, क्योंकि बारूद अच्छी न
थी। मुझे बड़ा खेद हुआ। माताजी भी जब लौट कर शाहजहाँपुर आईं तो उन्होंने

16 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
मुझसे पूछा कि क्या लाए ? मैंने कुछ कह कर टाल दिया। रुपये सब खर्च हो
गए थे। शायद एक गिन्नी बची थी, सो मैंने माताजी को लौटा दी।
मुझे जब किसी बात के लिए धन की आवश्यकता होती तो मैं माताजी से
कहता और वह मेरी माँग पूरी कर देती थीं। मेरा स्कूल घर से एक मील दूर
था। मैंने माताजी से प्रार्थना की कि मुझे साइकिल ले दें। उन्होंने लगभग एक सौ
रुपये दिए। मैंने साइकिल खरीद ली। उस समय मैं अंग्रेजी के नवें दर्जे में आ
गया था। किसी धार्मिक या देश संबंधी पुस्तक पढ़ने की इच्छा होती तो माताजी
से ही दाम ले जाता। लखनऊ कांग्रेस जाने के लिए मेरी बड़ी इच्छा थी। दादीजी
और पिताजी तो बहुत विरोध करते रहे, किन्तु माताजी ने मुझे खर्च दे ही दिया।
उसी समय शाहजहाँपुर में सेवा-समिति का आरंभ हुआ था। मैं बड़े उत्साह के
साथ सेवा-समिति में सहयोग देता था। पिताजी और दादीजी को मेरे इस प्रकार
के कार्य अच्छे न लगते थे, किन्तु माताजी मेरा उत्साह भंग न होने देती थीं,
जिसके कारण उन्हें अक्सर पिताजी की डाँट-फटकार तथा दंड भी सहन करना
पड़ता था। वास्तव में, मेरी माताजी स्वर्गीय देवी हैं। मुझमें जो कुछ जीवन तथा
साहस आया, वह मेरी माताजी तथा गुरुदेव श्री सोमदेव जी की कृपाओं का ही
परिणाम है। दादीजी और पिताजी मेरे विवाह के लिए बहुत अनुरोध करते, किन्तु
माताजी यही कहतीं कि शिक्षा पा चुकने के बाद ही विवाह करना उचित होगा।
माताजी के प्रोत्साहन तथा सद्व्यवहार ने मेरे जीवन में वह दृढ़ता उत्पन्न की कि
किसी आपत्ति तथा संकट के आने पर भी मैंने अपने संकल्प को न त्यागा।
मेरी माँ
ग्यारह वर्ष की उम्र में माताजी विवाह कर शाहजहाँपुर आई थीं। उस समय
वह नितांत अशिक्षित एक ग्रामीण कन्या के समान थीं। शाहजहाँपुर आने के थोड़े
दिनों बाद श्री दादीजी ने अपनी छोटी बहन को बुला लिया। उन्होंने माताजी को
गृहकार्य की शिक्षा दी। थोड़े दिनों में माताजी ने घर के सब काम-काज को समझ

आत्म-चरित्र 17

लिया और भोजनादि का ठीक-ठीक प्रबंध करने लगीं। मेरे जन्म होने के पाँच या
सात वर्ष बाद उन्होंने हिन्दी पढ़ना आरंभ किया। पढ़ने का शौक उन्हें खुद ही
पैदा हुआ था। मुहल्ले की सखी-सहेली जो घर पर आया करती थीं, उन्हीं में जो
शिक्षित थीं, माताजी उनसे अक्षर-बोध करतीं। इस प्रकार, घर का सब काम कर
चुकने के बाद जो कुछ समय मिल जाता, उसमें पढ़ना-लिखना करतीं। परिश्रम के
फल से थोड़े दिनों में ही वह देवनागरी पुस्तकों का अध्ययन करने लगीं। मेरी
बहनों को छोटी आयु में, माताजी ही उन्हें शिक्षा दिया करती थीं। जब से मैंने
आर्यसमाज में प्रवेश किया, तब से माताजी से खूब वार्तालाप होता। उस समय
की अपेक्षा अब उनके विचार भी कुछ उदार हो गए हैं। यदि मुझे ऐसी माता न
मिलतीं, तो मैं भी अति साधारण मनुष्यों की भाँति संसार-चक्र में फँसकर जीवन
निर्वाह करता। शिक्षादि के अतिरिक्त क्रांतिकारी जीवन में भी उन्होंने मेरी वैसी ही
सहायता की है, जैसी मेजिनी-5 की उनकी माता ने की थी। यथासमय मैं उन
सारी बातों का उल्लेख करूँगा। माताजी का सबसे बड़ा आदेश मेरे लिए यही था
कि किसी की प्राणहानि न हो। उनका कहना था कि अपने शत्रु को भी कभी
प्राण दंड न देना। उनके इस आदेश की पूर्ति करने के लिए मुझे मजबूरन दो-एक
बार अपनी प्रतिज्ञा भंग भी करनी पड़ी थी।
जन्मदात्री जननी ! इस जीवन में तो तुम्हारा ऋण उतारने के प्रयत्न करने
का भी अवसर न मिला। इस जन्म में तो क्या यदि अनेक जन्मों में भी सारे
जीवन, प्रयत्न करूँ तो भी तुमसे उऋण नहीं हो सकता। जिस प्रेम तथा दृढ़ता के
साथ तुमने इस तुच्छ जीवन का सुधार किया है, वह अवर्णनीय है। मुझे जीवन
की प्रत्येक घटना का स्मरण है कि तुमने जिस प्रकार अपनी देव-वाणी का उपदेश
करके मेरा सुधार किया है। तुम्हारी दया से ही मैं देश-सेवा में संलग्न हो सका।
धार्मिक जीवन में भी तुम्हारे ही प्रोत्साहन ने सहायता दी। जो कुछ शिक्षा मैंने
ग्रहण की उसका भी श्रेय तुम्हीं को है। जिस मनोहर रूप से तुम मुझे उपदेश
करती थीं, उसका स्मरण कर तुम्हारी मंगलमयी मूर्ति का ध्यान आ जाता है और

18 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
मस्तक झुक जाता है। तुम्हें यदि मुझे ताड़ना भी देनी हुई, तो बड़े स्नेह से हर
बात को समझा दिया। यदि मैंने धृष्टतापूर्ण उत्तर दिया तब तुमने प्रेम भरे शब्दों
में यही कहा कि तुम्हें जो अच्छा लगे, वह करो, किन्तु ऐसा करना ठीक नहीं,
इसका परिणाम अच्छा न होगा। जीवनदात्री ! तुमने इस शरीर को जन्म देकर
केवल पालन-पोषण ही नहीं किया किन्तु आत्मिक, धार्मिक तथा सामाजिक उन्नति
में तुम्हीं मेरी सदैव सहायक रहीं। जन्म-जन्मांतर परमात्मा ऐसी ही माता दें।
महान से महान संकट में भी तुमने मुझे अधीर नहीं होने दिया। सदैव
अपनी प्रेम भरी वाणी को सुनाते हुए मुझे सांत्वना देती रहीं। तुम्हारी दया की
छाया में मैंने अपने जीवन-भर में कोई कष्ट अनुभव न किया। इस संसार में मेरी
किसी भी भोग-विलास तथा ऐश्वर्य की इच्छा नहीं। केवल एक इच्छा है, वह यह
कि एक बार श्रद्धापूर्वक तुम्हारे चरणों की सेवा करके अपने जीवन को सफल
बना लेता। किन्तु यह इच्छा पूर्ण होती नहीं दिखाई देती और तुम्हें मेरी मृत्यु की
दुखभरी खबर सुनाई जाएगी। माँ ! मुझे विश्वास है कि तुम यह समझ कर धैर्य
धारण करोगी कि तुम्हारा पुत्र माताओं की माता- भारत माता की सेवा में अपने
जीवन को बलि-देवी की भेंट कर गया और उसने तुम्हारी कोख कलंकित न की,
अपनी प्रतिज्ञा पर दृढ़ रहा। जब स्वाधीन भारत का इतिहास लिखा जाएगा, तो
उसके किसी पृष्ठ पर उज्ज्वल अक्षरों में तुम्हारा भी नाम लिखा जाएगा। गुरु
गोविंदसिंह जी की धर्मपत्नी ने जब अपने पुत्रों की मृत्यु की खबर सुनी तो बहुत
प्रसन्न हुई थीं और गुरु के नाम पर धर्म-रक्षार्थ अपने पुत्रों के बलिदान पर
मिठाई बाँटी थी। जन्मदात्री ! वर दो कि अंतिम समय भी मेरा हृदय किसी प्रकार
विचलित न हो और तुम्हारे चरण कमलों को प्रणाम कर मैं परमात्मा का स्मरण
करता हुआ शरीर-त्याग करूँ।
मेरे गुरुदेव
माताजी के अतिरिक्त जो कुछ जीवन तथा शिक्षा मैंने प्राप्त की वह
पूज्यपाद श्री 108 स्वामी सोमदेवजी की कृपा का परिणाम है। आपका नाम

आत्म-चरित्र 19
श्रीयुत ब्रजलाल चोपड़ा था। पंजाब के लाहौर शहर में आपका जन्म हुआ था।
आपका परिवार प्रसिद्ध था, क्योंकि आपके दादा महाराजा रणजीत सिंह के मंत्रियों
में से एक थे। आपके जन्म के कुछ समय बाद आपकी माता का देहांत हो गया
था। आपकी दादी ने ही आपका पालन-पोषण किया था। आप अपने पिता की
अकेली संतान थे। जब आप बड़े हुए तो चाचियों ने दो-तीन बार आपको जहर
देकर मार देने का प्रयत्न किया, ताकि उनके लड़कों को ही जायदाद का अधिकार
मिल जाए। आपके चाचा आप पर बड़ा स्नेह रखते थे और शिक्षादि की ओर
विशेष ध्यान रखते थे। अपने चचेरे भाइयों के साथ-साथ आप भी अंग्रेजी स्कूल
में पढ़ते थे। जब आपने एंट्रेंस की परीक्षा दी तो परीक्षा-फल प्रकाशित होने पर
आप यूनिवर्सिटी में प्रथम आए और चाचा के लड़के फेल हो गए। घर में बड़ा
शोक मनाया गया। भोजन तक नहीं बना। आपकी प्रशंसा तो दूर, किसी ने उस
दिन भोजन करने को भी न पूछा और बड़ी उपेक्षा की दृष्टि से देखा। आपका
हृदय पहले से ही घायल था, इस घटना से आपके जीवन को और भी बड़ा
आघात पहुँचा।
चाचाजी के कहने-सुनने पर कालिज में नाम लिखा तो लिया, किन्तु बड़े
उदासीन रहने लगे। आपके हृदय में दया बहुत थी। प्रायः अपनी किताबें तथा
कपड़े दूसरे सह-पाठियों को बाँट दिया करते थे। नए कपड़े बाँटकर पुराने कपड़े
स्वयं पहना करते थे। एक-दो बार चाचाजी से दूसरे लोगों ने कहा कि ब्रजलाल
को कपड़े भी आप नहीं बनवा देते, जो वह पुराने फटे-कपड़े पहने फिरते हैं।
चाचाजी को बड़ा आश्चर्य हुआ, क्योंकि उन्होंने कई जोड़े कपड़े थोड़े दिनों पहले
ही बनवाए थे। आपके संदूकों की तलाशी ली गई। उनमें दो-चार जोड़ी पुराने
कपड़े निकले, तब चाचाजी ने पूछा तो मालूम हुआ कि वे नए कपड़े निर्धन
विद्यार्थियों को बाँट दिया करते हैं। चाचाजी ने कहा कि जब कपड़े बाँटने की
इच्छा हो, कह दिया करो, हम विद्यार्थियों को कपड़े बनवा दिया करेंगे, अपने
कपड़े न बाँटा करो। आप प्रायः निर्धन विद्यार्थियों को अपने घर पर ही भोजन

20 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
कराया करते थे। चाचियों तथा चचेरे भाइयों के व्यवहार से आपको बड़ा क्लेश
होता था। इसी कारण से आपने विवाह नहीं किया। घरेलू दुर्व्यवहार से दुखी
होकर आपने घर त्याग देने का निश्चय कर लिया और एक रात को जब सब
सो रहे थे, चुपचाप उठकर घर से निकल गए। कुछ भी सामान साथ में न
लिया। बहुत दिनों तक इधर-उधर भटकते रहे। भटकते-भटकते आप हरिद्वार
पहुँचे। वहाँ एक सिद्ध योगी से भेंट हुई। श्रीं ब्रजलाल जी को जिस वस्तु की
इच्छा थी, वह प्राप्त हो गई। उसी स्थान पर रहकर श्री ब्रजलाल जी ने योग-विद्या
की पूर्ण शिक्षा पाई। योगीराज़ की कृपा से आप 18-20 घंटे की समाधि लगा
लेने लगे। कई वर्ष तक आप वहाँ रहे। इस समय आपको योग का इतना
अभ्यास हो गया था कि अपने शरीर को आप इतना हल्का कर लेते थे कि पानी
पर पृथ्वी के समान चले जाते थे। अब आपको देश-भ्रमण तथा अध्ययन करने
की इच्छा हुई। अनेक स्थानों में भ्रमण करते हुए अध्ययन करते रहे। जर्मनी तथा
अमेरिका से बहुत-सी पुस्तकें मँगाईं, जो शास्त्रों के संबंध में थीं।
जब लाला लाजपतराय को देश-निर्वासन का दंड मिला था, उस समय आप
लाहौर में थे। वहाँ आपने एक समाचार-पत्र की संपादकी के लिए डिक्लेरेशन
दाखिल किया। डिप्टी कमिश्नर उस समय किसी के भी समाचार-पत्र के डिक्लेरेशन
को स्वीकार न करता था। जब आपसे भेंट हुई, तो वह बहुत प्रभावित हुआ और
उसने डिक्लेरेशन मंजूर कर लिया। अखबार का पहला ही अग्रलेख “अंग्रेजों को
चेतावनी” के नाम से निकला। लेख इतना उत्तेजनापूर्ण था कि थोड़ी देर में ही
समाचार-पत्र की सब प्रतियाँ बिक गईं और जनता के अनुरोध पर उसी अंक का
दूसरा संस्करण प्रकाशित करना पड़ा। डिप्टी कमिश्नर के पास रिपोर्ट हुई। उसने
आपको दर्शनार्थ बुलाया। वह बड़ा क्रुद्ध था। लेख को पढ़कर काँपता, और क्रोध
में आकर मेज पर हाथ दे मारता था। किन्तु अंतिम शब्दों को पढ़कर चुप हो
जाता। उस लेख के कुछ शब्द यों थे कि “यदि अंग्रेज अब भी न समझेंगे तो
वह दिन दूर नहीं कि सन् 1857 के दृश्य फिर दिखाई दें और अंग्रेजों के बच्चों

आत्म-चरित्र 21
को कत्ल किया जाए, उनकी महिलाओं की बेइज्जती हो, आदि। किंतु यह सब
स्वप्न है”। “यह सब स्वप्न है” इन्हीं शब्दों को पढ़कर डिप्टी कमिश्नर कहता
कि हम तुम्हारा कुछ नहीं कर सकते।
स्वामी सोमदेव भ्रमण करते हुए बंबई पहुँचे। वहाँ पर आपके उपदेशों को
सुनकर जनता पर बड़ा प्रभाव पड़ा। एक व्यक्ति, जो श्री अबुल कलाम आजाद
के बड़े भाई थे, आपका व्याख्यान सुनकर मोहित हो गए। वह आपको अपने घर
ले गए। इस समय तक आप गेरुआ कपड़ा नहीं पहनते थे। केवल एक लुंगी
और कुर्ता पहनते थे, और साफा बाँधते थे। श्री अबुल कलाम आजाद के पूर्वज
अरब के निवासी थे। आपके पिता के बंबई में बहुत से प्रशंसक थे और कथा
की तरह कुछ धार्मिक ग्रंथ पढ़ने पर हजारों रुपये चढ़ावे में आया करते थे। वह
सज्जन इतने मोहित हो गए कि उन्होंने धार्मिक कथाओं का पाठ करने के लिए
जाना ही छोड़ दिया। वह दिन-रात आपके पास ही बैठे रहते। जब आप उनसे
कहीं जाने को कहते तो वह रोने लगते और कहते कि मैं तो आपके आत्मिक
ज्ञान (आत्मा से संबंधित जानकारी) के उपदेशों पर मोहित हूँ। मुझे संसार में
किसी वस्तु की इच्छा नहीं। आपने एक दिन नाराज होकर उनके धीरे से चपत
मार दी जिससे वे दिन-भर रोते रहे। उनको घर वालों तथा शिष्यों ने बहुत
समझाया किन्तु वह धार्मिक कथा कहने न जाते। यह देखकर उनके शिष्यों को
बड़ा क्रोध आया कि हमारे धर्मगुरु एक काफिर के चक्कर में फँस गए हैं। एक
संध्या को स्वामी जी अकेले समुद्र के तट पर भ्रमण करने गए थे कि कई मुरीद
मकान पर बंदूक लेकर स्वामी जी को मार डालने के लिए आए। यह समाचार
जानकर उन्होंने स्वामीजी के प्राणों का भय देख स्वामीजी से बंबई छोड़ देने की
प्रार्थना की। प्रातःकाल एक स्टेशन पर स्वामीजी को तार मिला कि आपके प्रेमी
श्री अबुल कलाम आजाद के भाई साहब ने आत्महत्या कर ली। तार पाकर
आपको बड़ा क्लेश हुआ। जिस समय आपको इन बातों का स्मरण हो आता था
तो बड़े दुखी होते थे। मैं एक संध्या के समय आपके निकट बैठा था, अंधेरा

22 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
काफी हो गया था। स्वामीजी ने बड़ी गहरी ठंडी साँस ली। मैंने चेहरे की ओर
देखा तो आँखों से आँसू बह रहे थे। मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ। मैंने कई घंटे
प्रार्थना की, तब आपने उपरोक्त विवरण सुनाया।
अंग्रेजी की योग्यता आपकी बड़ी उच्चकोटि की थी। आपका शास्त्र-विषयक
ज्ञान बड़ा गंभीर था। आप बड़े निर्भीक वक्ता थे। आपकी योग्यता को देखकर
एक बार मद्रास की कांग्रेस कमेटी ने आपको अखिल भारतीय कांग्रेस का
प्रतिनिधि चुनकर भेजा था। आगरा की आर्य मित्र सभा के वार्षिकोत्सव पर
आपके व्याख्यानों को श्रवण कर राजा महेन्द्र प्रताप जी बड़े मुग्ध हुए थे। राजा
साहब ने आपके पैर छुए और आपको अपनी कोठी पर लिवा ले गए। उस समय
से राजा साहब बहुधा आपके उपदेश सुना करते और आपको अपना गुरु मानते
थे। इतना साफ निर्भीक बोलने वाला मैंने आज तक नहीं देखा। सन् 1913 ई.
में मैंने आपका पहला व्याख्यान शाहजहाँपुर में सुना था। आर्यसमाज के वार्षिकोत्सव
पर आप पधारे थे। उस समय आप बरेली में निवास करते थे। आपका शरीर
बहुत दुबला-पतला था, क्योंकि आपको एक अजीब रोग हो गया था। आप जब
शौच जाते थे, तब आपके खून गिरता था। कभी दो छटाँक, कभी चार छटाँक
और कभी-कभी तो एक सेर तक खून गिर जाता था। बवासीर आपको नहीं थी।
ऐसा कहते थे कि किसी प्रकार योग की क्रिया बिगड़ जाने से पेट की आँत में
कुछ विकार उत्पन्न हो गया। आँत सड़ गई। पेट चिरवाकर आँत कटवानी पड़ी
और तभी से यह रोग हो गया था। बड़े-बड़े वैद्य-डाक्टरों की औषधिं की किन्तु
कुछ लाभ नहीं हुआ। इतने कमजोर होने पर भी जब व्याख्यान देते तब इतने
जोर से बोलते कि तीन-चार फर्लांग से आपका व्याख्यान साफ सुनाई देता था।
दो-तीन वर्ष तक आपको हर साल आर्यसमाज के वार्षिकोत्सव पर बुलाया जाता।
सन् 1915 ई. में कतिपय सज्जनों की प्रार्थना पर आप आर्यसमाज मंदिर
शाहजहाँपुर में ही निवास करने लगे। इसी समय से मैंने आपकी सेवा में समय
व्यतीत करना आरंभ कर दिया।

आत्म-चरित्र 23
'स्वामीजी मुझे धार्मिक तथा राजनीतिक उपदेश देते थे और इस प्रकार की
पुस्तकें पढ़ने का भी आदेश देते थे। राजनीति में भी आपका ज्ञान उच्च कोटि
का था। लाला हरदयाल से आपका बहुत परामर्श होता था। एक बार महात्मा
मुंशीरामजी (स्वर्गीय स्वामी श्रद्धानंदजी) को आपने पुलिस के प्रकोप से बचाया।
आचार्य रामदेवजी तथा श्री कृष्णजी से आपका बड़ा स्नेह था। राजनीति में आप
मुझसे अधिक खुलते न थे। आप मुझसे बहुधा कहा करते थे कि एंट्रेंस पास कर
लेने के बाद यूरोप-यात्रा अवश्य करना। इटली जाकर महात्मा मेजिनी⁵ की
जन्मभूमि के दर्शन अवश्य करना। सन् 1916 ई. में लाहौर षड्यंत्र का मामला
चला। मैं समाचार-पत्रों में उसका सब वृत्तांत बड़े चाव से पढ़ा करता था। श्री
भाई परमानंदजी में मेरी बड़ी श्रद्धा थी, क्योंकि उनकी लिखी हुई "तवारीख
हिन्द" पढ़कर मेरे हृदय पर बड़ा प्रभाव पड़ा था। लाहौर षड्यंत्र का फैसला
अखबारों में छपा। भाई परमानंदजी को फाँसी की सजा पढ़कर मेरे शरीर में आग
लग गई।—⁶ मैंने विचारा कि अंग्रेज बड़े अत्याचारी हैं, इनके राज्य में न्याय नहीं,
जो इतने बड़े महानुभाव को फाँसी की सजा का हुक्म दे दिया। मैंने प्रतिज्ञा की
कि इसका बदला अवश्य लूँगा। जीवन-भर अंग्रेजी राज्य को नष्ट करने का प्रयत्न
करता रहूँगा। इस प्रकार की प्रतिज्ञा कर चुकने के पश्चात् मैं स्वामीजी के पास
आया। सब समाचार सुनाए और अखबार दिया। अखबार पढ़कर स्वामीजी बड़े
दुखित हुए। तब मैंने अपनी प्रतिज्ञा के संबंध में कहा। स्वामीजी कहने लगे कि
प्रतिज्ञा करना सरल है, किन्तु उस पर दृढ़ रहना कठिन है। मैंने स्वामीजी को
प्रणाम कर उत्तर दिया कि यदि श्रीचरणों की कृपा रहेगी तो प्रतिज्ञा-पूर्ति में किसी
प्रकार की त्रुटि न करूँगा। उस दिन से स्वामीजी कुछ-कुछ खुले। आप बहुत-सी
बातें बताया करते थे। उसी दिन से मेरे क्रांतिकारी जीवन का सूत्रपात हुआ।
यद्यपि आप आर्यसमाज के सिद्धांतों को सर्वप्रकारेण मानते थे किन्तु परमहंस
रामकृष्ण, स्वामी विवेकानंद, स्वामी रामतीर्थ तथा महात्मा कबीरदास के उपदेशों
का वर्णन प्रायः किया करते थे।

क्रान्तिकारी जीवन का प्रारम्भ, मैनपुरी षड्यन्त्र व मातृवेदी दल

Uploaded By Rajesh Tanti.

24 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
धार्मिक तथा आत्मिक जीवन में जो दृढ़ता मुझमें उत्पन्न हुई, वह स्वामीजी
महाराज के सदुपदेशों का ही परिणाम है। आपकी दया से ही मैं ब्रह्मचर्य-पालन में
सफल हुआ। आपने मेरे भविष्य-जीवन के संबंध में जो-जो बातें कही थीं, वे
अक्षरशः सत्य हुईं। आप कहा करते थे कि दुख है कि यह शरीर न रहेगा और
तेरे जीवन में बड़ी विचित्र-विचित्र समस्याएँ आएँगी, जिनको सुलझाने वाला कोई
न मिलेगा। यदि यह शरीर नष्ट न हुआ, जो असंभव है, तो तेरा जीवन भी
संसार में एक आदर्श जीवन होगा। मेरा दुर्भाग्य था कि जब आपके अंतिम दिन
बहुत निकट आं गए, तब आपने मुझे योगाभ्यास संबंधी कुछ क्रियाएँ बताने की
इच्छा प्रकट की, किन्तु आप इतनें दुर्बल हो गए थे कि जरा-सा परिश्रम करने या
दस-बीस कदम चलने पर ही आपको बेहोशी आ जाती थी। आप फिर कभी इस
योग्य न हो सके कि कुछ देर बैठकर कुछ क्रियाएँ मुझे बता सकते। आपने कहा
था, मेरा योग भ्रष्ट हो गया। प्रयत्न करूँगा, मरण समय पास रहना, मुझसे पूछ
लेना कि मैं कहाँ जन्म लूँगा। संभव है कि मैं बता सकूँ। नित्य-प्रति सेर-आध-सेर
खून गिर जाने पर भी आप कभी भी क्षुब्ध न होते थे। आपकी आवाज़ भी कभी
कमजोर न हुई। जैसे अद्वितीय आप वक्ता थे, वैसे ही आप लेखक भी थे।
आपके कुछ लेख तथा पुस्तकें आपके एक भक्त के पास थीं, जो यों ही नष्ट हो
गईं। कुछ लेख तथा पुस्तकें श्री स्वामी अनुभवानंदजी शांत ले गए थे। कुछ लेख
आपने प्रकाशित भी कराए थे। लगभग 48 वर्ष की उम्र में आपका निधन हो
गया। इस स्थान पर मैं महात्मा कबीरदास के कुछ अमृत वचनों का उल्लेख
करता हूँ, जो मुझे बड़े प्रिय तथा शिक्षाप्रद मालूम हुए :
'कबिरा' शरीर सराय है भाड़ा देके बस।
जब भठियारी खुश रहे तब जीवन का रस।। 1।।
'कबिरा' क्षुधा है कूक़री करत भजन में भंग।
याको टुकरा डारि के सुमिरन करो निशंक।। 2।।

आत्म-चरित्र 25
'नींद निसारी मीच की उठ्ठ 'कबिरा' जाग।
और रसायन त्याग के नाम रसायन चाख।। 3।।
चलना है रहना नहीं चलना बिसयें बीस।
'कबिरा' ऐसे सुहाग पर कौन बँधावे सीस।। 4।।
अपने-अपने चोर को सब कोई डारे मारि।
मेरा चोर जो मोहिं मिले सर्बस डारूँ वारि।। 5।।
कहे सुने की है नहीं देखा देखी बात।
दूल्हा दुल्हिन मिलि गए सूनी परी बरात।। 6।।
नैनन की करि कोठरी पुतरी पलंग बिछाय।
पलकन की चिक डारि के पीतम लेह रिझाय।। 7।।
प्रेम पियाला जो पिये सीस दच्छिना देय।
लोभी सीस न दै सके, नाम प्रेम का लेय।। 8।।
सीस उतारे भुइँ धरै, तापे राखै पाँव।
दास 'कबिरा' यूँ कहै ऐसा होय तो आव।। 9।।
निन्दक नियरे राखिये आँगन कुटी छबाय।
बिन पानी साबुन उज्ज्वल करे सुभाय।। 10।।
ब्रह्मचर्य-व्रत का पालन
वर्तमान समय में इस देश की कुछ ऐसी दुर्दशा हो रही है कि जितने धनी
तथा गणमान्य व्यक्ति हैं, उनमें 99 प्रतिशत ऐसे हैं जो अपनी संतान-रूपी अमूल्य
धन-राशि को अपने नौकर तथा नौकरानियों के हाथ में सौंप देते हैं। उनकी जैसी
इच्छा हो, वे उन्हें बनावें। मध्यम श्रेणी के व्यक्ति भी अपने व्यवसाय तथा नौकरी
इत्यादि में फँसे रहने के कारण संतान की ओर अधिक ध्यान नहीं दे सकते।
सस्ता कामचलाऊ नौकर या नौकरानी रखते हैं और उन्हीं पर बाल-बच्चों का भार
सौंप देते हैं, वे नौकर बच्चों को नष्ट करते हैं। यदि कुछ भगवान की दया हो