रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)
Autobiography of Ram Prasad Bismil
पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
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अधिक प्रभाव हुआ। वैसे तो वह मेरे मकान के निकट ही रहते थे। किन्तु आपस
में कोई मेल न था। बैठने-उठने से आपस में प्रेम बढ़ गया। वह एक ग्राम के
निवासी थे। जिस गाँव में उनका घर था वह गाँव बड़ा प्रसिद्ध है। वहाँ का
प्रत्येक निवासी अपने घर में बिना लाइसेंस अस्त्र-शस्त्र रखता है। बहुत से लोगों
के यहाँ बंदूक तथा तमंचे भी रहते हैं, जो गाँव में ही बन जाते हैं। ये सब
टोपीदार होते हैं। उनके पास भी एक नाली का छोटा-सा पिस्तौल था जिसे वह
अपने साथ शहर में रखते थे। जब मुझसे अधिक प्रेम बढ़ा तो उन्होंने वह
पिस्तौल मुझे रखने के लिए दिया। इस प्रकार के हथियार रखने की मेरी अधिक
इच्छा थी, क्योंकि मेरे पिता के कई शत्रु थे, जिन्होंने पिताजी पर अकारण ही
लाठियों का प्रहार किया था। मैं चाहता था कि यदि पिस्तौल मिल जाए तो मैं
पिताजी के शत्रुओं को मार डालूँ। यह एक नाली का पिस्तौल वह अपने पास
रखते तो थे, किन्तु उसको चलाकर न देखा था। मैंने उसे चलाकर देखा तो वह
नितांत बेकार सिद्ध हुआ। मैंने उसे ले जाकर एक कोने में डाल दिया। उनसे
स्नेह इतना बढ़ गया कि सायंकाल को मैं अपने घर से खीर की थाली ले जाकर
उनके साथ-साथ उनके मकान पर ही भोजन किया करता था। वह मेरे साथ श्री
स्वामी सोमदेवजी के पास भी जाया करते थे। उनके पिता जब शहर आए तो
उनको यह बड़ा बुरा मालूम हुआ। उन्होंने मुझसे अपने लड़के के पास न आने
या उसे कहीं साथ न ले जाने के लिए बहुत ताड़ना की और कहा कि यदि मैं
उनका कहना न मानूँगा तो वह गाँव से आदमी लाकर मुझे पिटवाएँगे। मैंने उनके
पास जाना-आना त्याग दिया, किन्तु वह मेरे यहाँ आते-जाते रहे।
लगभग अट्ठारह वर्ष की उम्र तक मैं रेल पर न चढ़ा था। मैं इतना दृढ़
सत्यवक्ता हो गया था कि एक समय रेल पर चढ़ कर तीसरे दर्जे का टिकट
खरीदा था, पर इंटर क्लास में बैठकर दूसरों के साथ-साथ चला गया। इस बात
से मुझे बड़ा खेद हुआ। मैंने अपने साथियों से अनुरोध किया कि यह तो एक
प्रकार की चोरी है। सबको मिलकर इंटर क्लास का भाड़ा स्टेशन मास्टर को दे