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रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)

रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)

Autobiography of Ram Prasad Bismil

पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

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6 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
गृहस्थ जीवन
विवाह हो जाने के बाद पिताजी म्युनिसिपैलिटी में पंद्रह रुपये मासिक वेतन
पर नौकर हो गए। उन्होंने कोई बड़ी शिक्षा प्राप्त न की थी। पिताजी को यह
नौकरी पसंद न आई। उन्होंने एक दो साल के बाद नौकरी छोड़ कर स्वतंत्र
व्यवसाय आरंभ करने का प्रयत्न किया और कचहरी (अदालत) में सरकारी स्टाम्प
बेचने लगे। उनके जीवन का अधिक भाग इसी व्यवसाय में व्यतीत हुआ। साधारण श्रेणी
के गृहस्थ बनकर उन्होंने इसी व्यवसाय द्वारा अपनी संतानों को शिक्षा दी, अपने
परिवार का पालन किया और अपने मुहल्ले के प्रतिष्ठित व्यक्तियों में गिने जाने
लगे। वह रुपये का लेन-देन भी करते थे। उन्होंने तीन बैलगाड़ियाँ भी बनाई थीं,
जो किराये पर चला करती थीं। पिताजी को व्यवसाय से प्रेम था। उनका शरीर बड़ा
मजबूत और सुडौल था। वह नियमपूर्वक अखाड़े में कुश्ती लड़ा करते थे।
पिताजी के घर में एक पुत्र उत्पन्न हुआ किन्तु वह मर गया। उसके एक
साल बाद लेखक (श्री रामप्रसाद) ने ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष 11 सम्वत् 1954 विक्रमी
को जन्म लिया। बड़े प्रयत्नों से मनौती मानकर अनेक गंडे, ताबीज तथा कवचों
द्वारा श्री दादाजी ने इस शरीर की रक्षा के लिए प्रयत्न किया। सम्भवतः हमारे घर
में बालकों का कोई रोग प्रवेश कर गया था। अतएव जन्म लेने के एक या दो
मास बाद मेरे शरीर की दशा भी पहले बालक जैसी होने लगी। किसी ने बताया
कि सफेद खरगोश को मेरे शरीर पर घुमाकर जमीन पर छोड़ दिया जाए, यदि
बीमारी होगी तो खरगोश तुरंत मर जाएगा। कहते हैं हुआ भी ऐसा ही। एक
सफेद खरगोश मेरे शरीर पर से उतारकर जैसे ही जमीन पर छोड़ा गया, वैसे ही
उसने तीन-चार चक्कर काटे और मर गया। मेरे विचार में किसी अंश में यह
सम्भव भी है, क्योंकि औषधि तीन प्रकार की होती हैं- 1. दैविक (ईश्वरीय),
2. मानुषिक और 3. पैशाचिक। पैशाचिक औषधियों में अनेक प्रकार के पशु या
पक्षियों के मांस या रक्त का उपयोग किया जाता है, जिसका उपयोग वैद्यक के