रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)
Autobiography of Ram Prasad Bismil
पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
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कराया करते थे। चाचियों तथा चचेरे भाइयों के व्यवहार से आपको बड़ा क्लेश
होता था। इसी कारण से आपने विवाह नहीं किया। घरेलू दुर्व्यवहार से दुखी
होकर आपने घर त्याग देने का निश्चय कर लिया और एक रात को जब सब
सो रहे थे, चुपचाप उठकर घर से निकल गए। कुछ भी सामान साथ में न
लिया। बहुत दिनों तक इधर-उधर भटकते रहे। भटकते-भटकते आप हरिद्वार
पहुँचे। वहाँ एक सिद्ध योगी से भेंट हुई। श्रीं ब्रजलाल जी को जिस वस्तु की
इच्छा थी, वह प्राप्त हो गई। उसी स्थान पर रहकर श्री ब्रजलाल जी ने योग-विद्या
की पूर्ण शिक्षा पाई। योगीराज़ की कृपा से आप 18-20 घंटे की समाधि लगा
लेने लगे। कई वर्ष तक आप वहाँ रहे। इस समय आपको योग का इतना
अभ्यास हो गया था कि अपने शरीर को आप इतना हल्का कर लेते थे कि पानी
पर पृथ्वी के समान चले जाते थे। अब आपको देश-भ्रमण तथा अध्ययन करने
की इच्छा हुई। अनेक स्थानों में भ्रमण करते हुए अध्ययन करते रहे। जर्मनी तथा
अमेरिका से बहुत-सी पुस्तकें मँगाईं, जो शास्त्रों के संबंध में थीं।
जब लाला लाजपतराय को देश-निर्वासन का दंड मिला था, उस समय आप
लाहौर में थे। वहाँ आपने एक समाचार-पत्र की संपादकी के लिए डिक्लेरेशन
दाखिल किया। डिप्टी कमिश्नर उस समय किसी के भी समाचार-पत्र के डिक्लेरेशन
को स्वीकार न करता था। जब आपसे भेंट हुई, तो वह बहुत प्रभावित हुआ और
उसने डिक्लेरेशन मंजूर कर लिया। अखबार का पहला ही अग्रलेख “अंग्रेजों को
चेतावनी” के नाम से निकला। लेख इतना उत्तेजनापूर्ण था कि थोड़ी देर में ही
समाचार-पत्र की सब प्रतियाँ बिक गईं और जनता के अनुरोध पर उसी अंक का
दूसरा संस्करण प्रकाशित करना पड़ा। डिप्टी कमिश्नर के पास रिपोर्ट हुई। उसने
आपको दर्शनार्थ बुलाया। वह बड़ा क्रुद्ध था। लेख को पढ़कर काँपता, और क्रोध
में आकर मेज पर हाथ दे मारता था। किन्तु अंतिम शब्दों को पढ़कर चुप हो
जाता। उस लेख के कुछ शब्द यों थे कि “यदि अंग्रेज अब भी न समझेंगे तो
वह दिन दूर नहीं कि सन् 1857 के दृश्य फिर दिखाई दें और अंग्रेजों के बच्चों