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रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)

Autobiography of Ram Prasad Bismil

पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

26 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
गई, और, बच्चे नौकर-नौकरानियों के हाथ से बच गए तो मुहल्ले की गंदगी से
बचना बड़ा कठिन है। रहे-सहे स्कूल में पहुँचकर पारंगत हो जाते हैं। कालिज
पहुँचते-पहुँचते आजकल के नवयुवकों के सोलहों संस्कार हो जाते हैं। कालिज में
पहुँचकर ये लोग समाचार-पत्रों में दिए हुए औषधियों के विज्ञापन देख-देखकर
दवाइयों को मँगा-मँगाकर धन नष्ट करना आरंभ करते हैं। 95 प्रतिशत की आँखें
खराब हो जाती हैं। कुछ को शारीरिक दुर्बलता तथा कुछ को फैशन के विचार से
ऐनक लगाने की बुरी आदत पड़ जाती है। सौन्दर्योपासना तो उनकी रग-रग में
कूट-कूट कर भर जाती है। शायद ही कोई विद्यार्थी ऐसा हो जिसकी प्रेम कथाएँ
प्रचलित न हों। ऐसी अजीब-अजीब बातें सुनने में आती हैं कि जिनका उल्लेख
करने से भी ग्लानि होती है। यदि कोई विद्यार्थी सच्चरित्र बनने का प्रयत्न भी
करता है और स्कूल या कालिज जीवन में उसे कुछ अच्छी शिक्षा भी मिल
जाती है, तो परिस्थितियाँ जिनमें उसे निर्वाह करना पड़ता है, उसे सुधरने नहीं
देतीं। वे विचारते हैं कि थोड़ा-सा इस जीवन का आनंद ले लें, यदि कुछ
खराबी पैदा हो गई तो दवाई खाकर पौष्टिक पदार्थों का सेवन करके दूर कर
लेंगे। यह उनकी बड़ी भारी भूल है। अंग्रेजी की कहावत है "ओनली फॉर वन्स
एंड फॉर एवर"।
तात्पर्य यह है कि यदि एक समय कोई बात पैदा हुई, मानो सदा के लिए
रास्ता खुल गया। दवाइयाँ कोई लाभ नहीं पहुँचातीं। अंडों का जूस, मछली के
तेल, मांस आदि पदार्थ भी व्यर्थ सिद्ध होते हैं। सबसे आवश्यक बात चरित्र
सुधारना ही होती है। विद्यार्थियों तथा उनके अध्यापकों के लिए उचित है कि वे
देश की दुर्दशा पर दया करके अपने चरित्र को सुधारने का प्रयत्न करें। सार में
ब्रह्मचर्य ही संसारी शक्तियों का मूल है, बिना ब्रह्मचर्य-व्रत पालन किए मनुष्य-जीवन
नितांत शुष्क तथा नीरस प्रतीत होता है। विद्या, बल और बुद्धि सब ब्रह्मचर्य के
प्रताप से ही प्राप्त होते हैं। संसार में जितने बड़े आदमी हुए हैं, उनमें से
अधिकतर ब्रह्मचर्य-व्रत के प्रताप से ही बड़े बने और सैकड़ों-हजारों वर्ष बाद भी

आत्म-चरित्र 27
उनका यशगान करके मनुष्य अपने आपको कृतार्थ करते हैं। ब्रह्मचर्य की महिमा
यदि जानना हो तो परशुराम, राम, लक्ष्मण, कृष्ण, भीष्म, ईसा, मेजिनी, बंदा,
रामकृष्ण, दयानंद तथा राममूर्ति की जीवनियों का अध्ययन करो।
जिन विद्यार्थियों को बाल्यावस्था में कोई बुरी आदत पड़ जाती है, या जो
बुरी संगत में पड़कर अपना आचरण बिगाड़ लेते हैं और फिर अच्छी शिक्षा पाने
पर आचरण सुधारने का प्रयत्न करते हैं, परंतु सफल मनोरथ नहीं होते, उन्हें भी
निराश नहीं होना चाहिए। मनुष्य-जीवन अभ्यासों का एक समूह है। मनुष्य के
मन में भिन्न-भिन्न प्रकार के अनेक विचार तथा भाव उत्पन्न होते रहते हैं। उनमें
जो उसे रुचिकर होते हैं, वे प्रथम कार्य-रूप में परिणत होते हैं। क्रिया के
बार-बार होने से ऐच्छिक भाव निकल जाता है और उसमें तात्कालिक प्रेरणा उत्पन्न
हो जाती है। इन तात्कालिक प्रेरक क्रियाओं को, जो पुनरावृत्ति का फल है,
"अभ्यास" कहते हैं। मानवी चरित्र इन्हीं अभ्यासों द्वारा बनता है। अभ्यास से
तात्पर्य आदत, स्वभाव, बान है। अभ्यास अच्छे और बुरे दोनों प्रकार के होते हैं।
यदि हमारे मन में निरंतर अच्छे विचार उत्पन्न हों, तो उनका फल अच्छे अभ्यास
होंगे और यदि मन बुरे विचारों में लिप्त रहे, तो निश्चय ही अभ्यास बुरे होंगे।
मन इच्छाओं का केन्द्र है। इन्हीं की पूर्ति के लिए मनुष्य को प्रयत्न करना पड़ता
है। अभ्यासों के बनने में पैतृक संस्कार, अर्थात माता-पिता के अभ्यासों के
अनुसार अनुकरण ही बच्चों के अभ्यास का सहायक होता है। दूसरे, जैसी
परिस्थितियों में निवास होता है, वैसे ही अभ्यास भी पड़ते हैं। तीसरे, प्रयत्न से
भी अभ्यासों का निर्माण होता है। यह शक्ति इतनी प्रबल हो सकती है कि इसके
द्वारा मनुष्य पैतृक संसार तथा परिस्थितियों को भी जीत सकता है। हमारे जीवन
का प्रत्येक कार्य अभ्यासों के अधीन है। यदि अभ्यासों द्वारा हमें कार्य में सुगमता
न प्रतीत होती, तो हमारा जीवन बड़ा दुखमय प्रतीत होता। लिखने का अभ्यास,
वस्त्र पहनना, पठन-पाठन इत्यादि इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। यदि हमें प्रारंभिक
समय की भाँति सदैव सावधानी से काम लेना हो, तो कितनी कठिनाई प्रतीत हो।

28 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
इसी प्रकार बालक का खड़ा होना और चलना भी है कि उस समय वह कितना
कष्ट अनुभव करता है, किन्तु एक मनुष्य मीलों तक चला जाता है। बहुत लोग
तो चलते-चलते नींद भी ले लेते हैं। जैसे जेल में बाहरी दीवार पर घड़ी में चाबी
लगाने वाले, जिन्हें बराबर छः घंटे चलना होता है, वे प्रायः चलते-चलते सो लिया
करते हैं।
मानसिक भावों को शुद्ध रखते हुए अंतःकरण को उच्च विचारों में बलपूर्वक
संलग्न करने का अभ्यास करने से अवश्य सफलता मिलेगी। प्रत्येक विद्यार्थी या
नवयुवक को, जोकि ब्रह्मचर्य-व्रत का पालन करने की इच्छा रखता है, उचित है
कि अपनी दिनचर्या निश्चित करे। खान-पान आदि का विशेष ध्यान रखे।
महात्माओं के जीवन-चरित्र तथा चरित्र-गठन संबंधी पुस्तकों का अवलोकन करें।
प्रेमालाप तथा उपन्यासों में समय नष्ट न करे। खाली समय अकेला न बैठे। जिस
समय कोई बुरे विचार उत्पन्न हों, तुरंत शीतल जलपान कर घूमने लगे या किसी
अपने से बड़े के पास जाकर बातचीत करने लगे। अश्लील (इश्कभरी) ग़ज़लों,
शेरों तथा गानों को न पढ़े और न सुने।
विद्यार्थी प्रातःकाल सूर्य उदय होने से एक घंटा पहले शैया त्याग कर
शौचादि से निवृत्त हो व्यायाम करे या वायु-सेवनार्थ बाहर मैदान में जाए। सूर्य
उदय होने के पाँच-दस मिनट पूर्व स्नान से निवृत्त होकर यथा-विश्वास परमात्मा
का ध्यान करे। सदैव कुएँ के ताजे जल से स्नान करे। यदि कुएँ का जल प्राप्त
न हो तो जाड़ों में जल को थोड़ा-सा गुनगुना कर ले और गर्मियों में शीतल जल
से स्नान करे। स्नान करने के पश्चात् एक खुरखुरे तौलिए या अँगोछे से शरीर
खूब मले। उपासना के पश्चात् थोड़ा-सा जलपान करे। कोई फल, शुष्क मेवा, दूध
अथवा सबसे उत्तम यह है कि गेहूँ का दलिया रंधवाकर यथा-रुचि मीठा या नमक
डालकर खाए। फिर अध्ययन करे और दस बजे से ग्यारह बजे के मध्य में भोजन
कर ले। भोजन में मांस, मछली, चरपरे, खट्टे, गरिष्ठ, बासी तथा उत्तेजक पदार्थों
का त्याग करे। प्याज, लहसुन, लाल मिर्च, आम की खटाई और अधिक मसालेदार

आत्म-चरित्र 29
भोजन कभी न खाए। सात्विक भोजन करे। शुष्क भोजन का भी त्याग करे। जहाँ
तक हो साग-सब्जी अधिक खाए। भोजन खूब चबा-चबा कर करे। अधिक गरम
या अधिक् ठंडा भोजन भी वर्जित है। स्कूल अथवा कालिज से आकर थोड़ा-सा
आराम करके एक घंटा लिखने का काम करके खेलने के लिए जाए। मैदान में
थोड़ा-सा घूमे भी। घूमने के लिए चौक बाजार की गंदी हवा में जाना ठीक नहीं।
स्वच्छ वायु का सेवन करे। संध्या समय भी शौच अवश्य जाए। थोड़ा-सा ध्यान
करके हल्का-सा भोजन कर ले। रात्रि के समय साढ़े दस बजे तक पठन-पाठन
करे और फिर सो जाए। सदैव खुली हवा में सोना चाहिए। बहुत मुलायम और
चिकने बिस्तर पर न सोए। अधिक पाठ न करना हो तो साढ़े नौ या दस बजे
सो जाए। प्रातःकाल साढ़े तीन या चार बजे उठकर कुल्ला करके शीतल जलपान
करे और शौच से निवृत्त हो पठन-पाठन करे। सूर्योदय के निकट फिर नित्य की
भाँति व्यायाम या भ्रमण करे। सब व्यायामों में दंड-बैठक सर्वोत्तम है। जहाँ जी
चाहे, व्यायाम कर लो। यदि हो सके तो प्रोफेसर राममूर्ति की विधि से दंड-बैठक
करे। प्रोफेसर साहब की रीति विद्यार्थियों के लिए लाभदायक है। थोड़े समय में ही
पर्याप्त परिश्रम हो जाता है। दंड-बैठक के अलावा शीर्षासन और पद्मासन का
भी अभ्यास करना चाहिए और अपने कमरे में वीरों और महात्माओं के चित्र
रखने चाहिएँ।

द्वितीय खण्ड
स्वदेश-प्रेम
पूज्यपाद श्रीस्वामी सोमदेव का देहांत हो जाने के पश्चात् जब मैं अंग्रेजी के
नवें दर्जे में आया, कुछ स्वदेश संबंधी पुस्तकों का अवलोकन आरंभ हुआ।
शाहजहाँपुर में सेवा-समिति की नींव पं. श्रीराम वाजपेयीजी ने डाली, उसमें भी बड़े
उत्साह से कार्य किया। दूसरों की सेवा का भाव हृदय में उदय हुआ। कुछ समझ
में आने लगा कि वास्तव में देशवासी बड़े दुखी हैं। उसी वर्ष मेरे पड़ोसी तथा
मित्र, जिनसे मेरा स्नेह अधिक था, एंट्रेंस की परीक्षा पास करके कालिज में शिक्षा
पाने चले गए। कालिज की स्वतंत्र वायु में उनके हृदय में भी स्वदेश के भाव
उत्पन्न हुए। उसी साल लखनऊ में अखिल भारतीय कांग्रेस का अधिवेशन हुआ।
मैं भी उसमें सम्मिलित हुआ। कतिपय सज्जनों से भेंट हुई। देश-दशा का कुछ
अनुमान हुआ, और निश्चय हुआ कि देश के लिए कोई विशेष कार्य किया जाए।
देश में जो कुछ हो रहा है उसकी उत्तरदायी सरकार ही है। भारतवासियों के दुख
तथा दुर्दशा की जिम्मेदारी सरकार पर ही है, अतएव सरकार को पलटने का
प्रयत्न करना चाहिए। मैंने भी इस प्रकार के विचारों में योग दिया। कांग्रेस में
महात्मा तिलक के पधारने की खबर थी, इस कारण से गरम दल के अधिक
व्यक्ति आए हुए थे। कांग्रेस के सभापति का स्वागत बड़ी धूमधाम से हुआ था।
उसके दूसरे दिन लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की स्पेशल गाड़ी आने का
समाचार मिला। लखनऊ स्टेशन पर बड़ा जमाव था। स्वागतकारिणी समिति के

स्वदेश-प्रेम 31
सदस्यों से मालूम हुआ कि लोकमान्य का स्वागत केवल स्टेशन पर ही किया
जाएगा और शहर में सवारी नहीं निकाली जाएगी जिसका कारण यह था कि
स्वागतकारिणी समिति के प्रधान पं. जगतनारायणजी थे। अन्य गण्यमान सदस्यों में
पं. गोकरणनाथजी तथा अन्य उदार दल वालों (माडरेटों) की संख्या अधिक थी।
माडरेटों को भय था कि यदि लोकमान्य की सवारी शहर में निकाली गई तो
कांग्रेस के प्रधान से भी अधिक सम्मान होगा, जिसे वे उचित न समझते थे।
अतः उन सबने प्रबंध किया कि जैसे ही लोकमान्य तिलक पधारें, उन्हें मोटर में
बिठाकर शहर के बाहर-बाहर निकाल ले जाएँ। इन सब बातों को सुनकर
नवयुवकों को बड़ा खेद हुआ। कालेज के एक एम.ए. के विद्यार्थी ने इस प्रबंध
का विरोध करते हुए कहा कि लोकमान्य का स्वागत अवश्य होना चाहिए। मैंने
भी इस विद्यार्थी के कथन में सहयोग दिया। इसी प्रकार कई नवयुवकों ने निश्चय
किया कि जैसे ही लोकमान्य, स्पेशल रेलगाड़ी से उतरें उन्हें घेरकर गाड़ी में बिठा
लिया जाए और सवारी निकाली जाए। स्पेशल रेलगाड़ी आने पर लोकमान्य सबसे
पहले उतरे। स्वागतकारिणी के सदस्यों ने कांग्रेस के स्वयं-सेवकों का घेरा बनाकर
लोकमान्य को मोटर में जां बिठाया। मैं तथा एक एम.ए. का विद्यार्थी मोटर के
आगे लेट गए। सब कुछ समझाया गया, मगर किसी की एक न सुनी। हम लोगों
की देखा-देखी और कई नवयुवक भी मोटर के सामने आकर बैठ गए। उस समय
मेरे उत्साह का यह हाल था कि मुँह से बात न निकलती थी, केवल रोता था
और कहता था, “मोटर मेरे ऊपर से निकाल ले जाओ।” स्वागतकारिणी के
सदस्यों से कांग्रेस के प्रधान को ले जाने वाली गाड़ी माँगी, उन्होंने देना स्वीकार
न किया। एक नवयुवक ने मोटर का टायर काट दिया। लोकमान्य जी बहुत कुछ
समझाते किन्तु वहाँ सुनता कौन ? एक किराए की गाड़ी से घोड़े खोलकर
लोकमान्य के पैरों पर सिर रख उन्हें उसमें बिठाया और सबने मिलकर हाथों से
गाड़ी खींचनी शुरु की। इस प्रकार लोकमान्य का इस धूमधाम से स्वागत हुआ
कि किसी नेता की उतने जोरों से सवारी न निकाली गई। लोगों के उत्साह का

32 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
यह हाल था कि कहते थे कि एक बार गाड़ी में हाथ लगा लेने दो, जीवन सफल
हो जाए। लोकमान्य पर फूलों की जो वर्षा की जाती थी, उसमें से जो फूल नीचे
गिर जाते थे उन्हें उठाकर लोग पल्ले में बाँध लेते थे। जिस स्थान पर लोकमान्य
के पैर पड़ते, वहाँ की धूल सबके माथों पर दिखाई देती। कुछ उस धूल को भी
अपने रुमाल में बाँध लेते थे। इस स्वागत से माडरेटों की बड़ी भद्द हुई।
क्रांतिकारी आंदोलन
कांग्रेस के अधिवेशन के अवसर पर लखनऊ में ही मालूम हुआ कि एक
गुप्त समिति है, जिसका मुख्य उद्देश्य क्रांतिकारी आंदोलन में भाग लेना है। यहीं
से क्रांतिकारी समिति की चर्चा सुनकर कुछ समय बाद मैं भी क्रांतिकारी समिति
के कार्य में योग देने लगा। अपने एक मित्र द्वारा क्रांतिकारी समिति का सदस्य
हो गया। थोड़े ही दिनों में मैं कार्यकारिणी का सदस्य बना लिया गया। समिति
में धन की बहुत कमी थी, उधर हथियारों की भी जरूरत थी। जब घर वापस
आया, तब विचार हुआ कि एक पुस्तक प्रकाशित की जाए और उसमें जो लाभ
हो उससे हथियार खरीदे जाएँ। पुस्तक प्रकाशित कराने के लिए धन कहाँ से
आए? विचार करते-करते मुझे एक चाल सूझी। मैंने अपनी माताजी से कहा कि
मैं कुछ रोजगार करना चाहता हूँ, उसमें अच्छा लाभ होगा। यदि रुपये दे सकें तो
बड़ा अच्छा हो। उन्होंने 200 रुपये दिए। “अमेरिका को स्वाधीनता कैसे मिली”
नामक पुस्तक लिखी जा चुकी थी। प्रकाशित होने का प्रबंध हो गया। थोड़े रुपये
की जरूरत और पड़ी, मैंने माताजी से 200 रुपये और लिए। पुस्तक की बिक्री
हो जाने पर माताजी के रुपये पहले चुका दिए। लगभग 200 रुपये और बचे।
पुस्तकें अभी बिकने के लिए बहुत बाकी थीं। उसी समय “देशवासियों से
निवेदन” नामक एक पर्चा छपवाया गया, क्योंकि पं. गेंदालालजी, ब्रह्मचारीजी के
दल सहित ग्वालियर में गिरफ्तार हो गए थे। अब सब विद्यार्थियों ने अधिक
उत्साह के साथ काम करने की प्रतिज्ञा की। पर्चे कई जिलों में लगाए गए और

स्वदेश-प्रेम 33
बाँटे गए। पर्चे तथा “अमेरिका को स्वाधीनता कैसे मिली” पुस्तक दोनों संयुक्त
प्रांत की सरकार ने जब्त कर लिए।
हथियारों की खरीद
अधिकतर लोगों का विचार है कि देशी राज्यों में हथियार (रिवाल्वर,
पिस्तौल तथा राइफलें इत्यादि) सब कोई रखता है, और बंदूक आदि पर लाइसेंस
नहीं होता। अतएव इस प्रकार के अस्त्र बड़ी सुगमता से प्राप्त हो सकते हैं। देशी
राज्यों में हथियारों पर कोई लाइसेंस नहीं, यह बात बिल्कुल ठीक है और हर एक
को बंदूक आदि रखने की आज़ादी भी है। किंतु कारतूसी हथियार बहुत कम
लोगों के पास रहते हैं, जिसका कारण यह है कि कारतूस या विलायती बारूद
खरीदने पर पुलिस में सूचना देनी होती है। राज्य में तो कोई ऐसी दुकान नहीं
होती, जिस पर कारतूस या कारतूसी हथियार मिल सकें। यहाँ तक कि विलायती
बारूद और बंदूक की टोपी भी नहीं मिलती, क्योंकि ये सब चीजें बाहर से मँगानी
पड़ती हैं। जितनी चीजें इस प्रकार की बाहर से मँगाई जाती हैं, उनके लिए
रेजिडेंट (गवर्नमेंट का प्रतिनिधि, जो रियासतों में रहता है) की आज्ञा लेनी पड़ती
है। बिना रेजिडेंट की मंजूरी के हथियारों संबंधी कोई चीज बाहर से रियासत में
नहीं आ सकती। इस कारण इस खटखट से बचने के लिए रियासत में ही
टोपीदार बंदूकें बनती हैं और देशी बारूद भी वहीं के लोग शोरा, गंधक तथा
कोयला मिलाकर बना लेते हैं। बंदूक की टोपी चुरा-छिपाकर मँगा लेते हैं। नहीं
तो टोपी के स्थान पर भी मनसल और पुटाश अलग-अलग पीसकर दोनों को
मिलाकर उसी से काम चलाते हैं। हथियार रखने की आज़ादी होने पर भी गाँवों
में किसी एक-दो धनी या जमींदार के यहाँ टोपीदार बंदूक या टोपीदार छोटे
पिस्तौल होते हैं, जिसमें ये लोग रियासत की बनी हुई बारूद काम में लाते हैं।
यह बारूद बरसात में सील खा जाती है और काम नहीं देती। एक बार मैं
अकेला रिवाल्वर खरीदने गया। उस समय मैं समझता था कि हथियारों की दूकान

34 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
होगी, सीधे जाकर दाम देंगे और रिवाल्वर लेकर चले आएँगे। प्रत्येक दूकान देखी,
कहीं किसी पर बंदूक आदि का विज्ञापन या कोई दूसरा निशान न पाया। फिर
एक ताँगे पर सवार होकर सब शहर घूमा। ताँगे वाले ने पूछा कि क्या चाहिए।
मैंने उससे डरते-डरते अपना उद्देश्य कहा। उसी ने दो-तीन दिन घूम-फिरकर
एक टोपीदार रिवाल्वर खरीदवा दिया और देशी बनी हुई बारूद एक दूकान से
दिला दी। मैं कुछ जानता तो था नहीं, एकदम दो सेर बारूद खरीदी, जो घर पर
संदूक में रखे-रखे बरसात में सील खाकर पानी हो गई। मुझे बड़ा दुख हुआ।
दूसरी बार जब मैं क्रांतिकारी समिति का सदस्य हो चुका था, तब दूसरे सहयोगियों
की राय से दो सौ रुपये लेकर हथियार खरीदने गया। इस बार मैंने बहुत प्रयत्न
किया तो एक कबाड़ी की-सी दूकान पर कुछ तलवारें, खंजर, कटार तथा दो-चार
टोपीदार बंदूकें रखी देखीं। मैंने बड़ा साहस करके उससे पूछा कि क्या आप ये
चीजें बेचते हैं, उसने जब हाँ में उत्तर दिया तो मैंने दो-चार चीजें देखीं। दाम
पूछे। इसी प्रकार वार्तालाप करके पूछा कि क्या आप कारतूसी हथियार नहीं बेचते
या और कहीं नहीं बिकते। तब उसने सब विवरण सुनाया। उस समय उसके पास
टोपीदार एक नली के छोटे-छोटे दो पिस्तौल थे। मैंने वे दोनों खरीद लिए। एक
कटार भी खरीदी। उसने वादा किया कि यदि आप फिर आएँ तो कुछ कारतूसी
हथियार जुटाने का प्रयत्न किया जाए। लालच बुरी बला है, इस कहावत के
अनुसार तथा इसलिए भी कि हम लोगों को कोई दूसरा ऐसा जरिया भी न था,
जहाँ से हथियार मिल सकते, मैं कुछ दिनों बाद फिर गया। इस समय उसी ने
एक बड़ा सुंदर कारतूसी रिवाल्वर दिया। कुछ पुराने कारतूस दिए। रिवाल्वर था तो
पुराना, किन्तु बड़ा ही उत्तम था। दाम उसके नए के बराबर देने पड़े। अब उसे
विश्वास हो गया कि यह हथियारों के खरीदार हैं। उसने प्राणपण-से चेष्टा की
और कई रिवाल्वर तथा दो-तीन राइफलें जुटाईं। उसे भी अच्छा लाभ हो जाता
था। प्रत्येक वस्तु पर वह बीस-तीस रुपये मुनाफा ले लेता था। किसी-किसी चीज़
पर दूना नफा खा लेता था।

स्वदेश-प्रेम 35
इसके बाद हमारी संस्था के दो-तीन सदस्य मिलकर गए। दूकानदार ने भी
हमारी उत्कट इच्छा को देखकर इधर-उधर से पुराने हथियारों को खरीदकर उनकी
मरम्मत की, और नया-सा करके हमारे हाथ बेचना शुरू किया। खूब ठगा। हम
लोग कुछ जानते नहीं थे। इस प्रकार अभ्यास करने से कुछ नया पुराना समझने
लगे। एक दूसरे सिक्लीगर से भेंट हुई। वह स्वयं कुछ नहीं जानता था, किन्तु
उसने वचन दिया कि वह कुछ रईसों से हमारी भेंट करा देगा। उसने एक रईस
से मुलाकात कराई जिसके पास एक रिवाल्वर था। रिवाल्वर खरीदने की हमने
इच्छा प्रकट की। उन महाशय ने उस रिवाल्वर के डेढ़ सौ रुपये माँगे। रिवाल्वर
नया था। बड़े कहने-सुनने पर सौ कारतूस उन्होंने दिए और 155 रुपये लिए।
150 रुपये उन्होंने स्वयं लिए और 5 रुपये सिक्लीगर को कमीशन के तौर पर
देने पड़े। रिवाल्वर चमकता हुआ नया था, समझे अधिक दामों का होगा। खरीद
लिया। विचार हुआ कि इस प्रकार ठगे जाने से काम न चलेगा। किसी प्रकार
कुछ जानने का प्रयत्न किया जाए। बड़ी कोशिश के , बाद कलकत्ता, बंबई से
बंदूक-विक्रेताओं की लिस्टें मँगाकर देखीं, देखकर आँखें खुल गईं। जितने रिवाल्वर
या बंदूकें हमने खरीदे थे, एक को छोड़ सबके दुगने दाम दिए थे। 155 रुपये के
रिवाल्वर के दाम केवल 30 रुपये ही थे और 10 रुपये के सौ कारतूस, इस
प्रकार कुल सामान 40 रुपये का था, जिसके बदले 155 रुपये देने पड़े। बड़ा खेद
हुआ। करें तो क्या करें। और कोई दूसरा जरिया भी तो न था।
कुछ समय पश्चात कारखानों की लिस्टें लेकर तीन-चार सदस्य मिलकर गए।
खूब जाँच-खोज की। किसी प्रकार रियासत की पुलिस को पता चल गया। एक
खुफिया पुलिस वाला मुझे मिला, उसने कई हथियार दिलाने का वादा किया, और
वह मुझे पुलिस इंस्पेक्टर के घर ले गया। दैवात् उस समय पुलिस इंस्पेक्टर घर
पर मौजूद न थे। उनके द्वार पर एक पुलिस का सिपाही बैठा था, जिसे मैं
भली-भाँति जानता था। मुहल्ले में खुफिया पुलिस वाले की आँख बचाकर पूछा कि
अमुक घर किसका है ? मालूम हुआ पुलिस इंस्पेक्टर का। मैं जैसे-तैसे निकल

36 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
आया। और अतिशीघ्र अपने ठहरने का स्थान बदल लिया। उस समय हम लोगों
के पास दो राइफलें, चार रिवाल्वर तथा दो पिस्तौल खरीदे हुए मौजूद थे। किसी
प्रकार उस खुफिया पुलिस वाले को एक कारीगर से, जहाँ पर हम अपने हथियारों
की मरम्मत कराते थे, मालूम हुआ कि हम में से एक व्यक्ति उसी दिन जाने
वाला था, उसने चारों ओर स्टेशन पर तार दिलवाए। रेलगाड़ियों की तलाशी ली
गई। पर पुलिस की असावधानी के कारण हम बाल-बाल बच गए।
रुपये की चपत बुरी होती है। एक पुलिस सुपरिटेंडेंट के पास एक राइफल
थी। मालूम हुआ वह बेचते हैं। हम लोग पहुँचे। अपने आप को रियासत का
रहने वाला बतलाया। उन्होंने निश्चय करने के लिए बहुत से प्रश्न पूछे, क्योंकि
हम लड़के तो थे ही। पुलिस सुपरिटेंडेंट पेंशनभोगी मुसलमान थे। हमारी बातों पर
उन्हें पूर्ण विश्वास न हुआ। कहा कि अपने थानेदार से लिखा लाओ कि वह तुम्हें
जानता है। मैं गया। जिस स्थान का रहने वाला बताया था, वहाँ के थानेदार का
नाम मालूम किया, और एक-दो जमींदारों के नाम मालूम किए। फिर एक पत्र
लिखा कि मैं उस स्थान के रहने वाले अमुक जमींदार का पुत्र हूँ और वे लोग
मुझे भली-भाँति जानते हैं। उसी पत्र पर जमींदारों के हिन्दी में और पुलिस के
दारोगा के अंग्रेजी में हस्ताक्षर बना, पत्र ले जाकर पुलिस कप्तान को दिया। बड़े
गौर से देखने के बाद वह बोले, "मैं थाने में दर्याफ्त कर लूँ। तुम्हें भी थाने
चलकर इत्तला देनी होगी कि राइफल खरीद रहे हैं।" हम लोगों ने कहा कि
हमने आपके इत्मीनान के लिए इतनी मुसीबत झेली, दस-बारह रुपये खर्च किए,
अगर अब भी विश्वास न हो तो मजबूरी है। हम पुलिस में नहीं जाएँगे। राइफल
के दाम लिस्ट में 180 रुपये लिखे थे, वह 250 रुपये माँगते थे, साथ में दो सौ
कारतूस भी दे रहे थे। कारतूस भरने का सामान भी देते थे, जो लगभग 50
रुपये का होता था। इस प्रकार पुरानी राइफल के नई के समान दाम माँगते थे।
हम लोग भी 250 रुपये देते थे। पुलिस कप्तान ने भी सोचा कि पूरे दाम मिल
रहे हैं। स्वयं वृद्ध हो चुके थे। कोई पुत्र भी नहीं था। अतएव 250 रुपये लेकर

स्वदेश-प्रेम 37
राइफल दे दी। पुलिस में कुछ पूछने न गए। उन्हीं दिनों राज्य के एक उच्च
पदाधिकारी के नौकर से मिलकर उनके यहाँ से रिवाल्वर चोरी कराया। जिसके
दाम लिस्ट में 75 रुपये थे, उसे 100 रुपये में खरीदा। एक माउजर पिस्तौल भी
चोरी कराया, जिसके दांम लिस्ट में उस समय 200 रुपये थे। हमें माउजर
पिस्तौल की प्राप्ति की बड़ी इच्छा थी। बड़े भारी प्रयत्न के बाद यह माउजर
पिस्तौल मिला, जिसका मूल्य 300 रुपये देना पड़ा। कारतूस एक भी न मिला।
हमारे पुराने मित्र कबाड़ी महोदय के पास माउजर पिस्तौल के पचास कारतूस पड़े
थे। उन्होंने बड़ा काम दिया। हममें से किसी ने भी पहले माउजर पिस्तौल देखा
भी न था। कुछ न समझ सके कि कैसे प्रयोग किया जाता है। बड़े कठिन
परिश्रम से उसका प्रयोग समझ में आया।
हमने तीन राइफलें, एक बारह बोर की दोनाली कारतूसी बंदूक, दो टोपीदार
बंदूकें, तीन टोपीदार रिवाल्वर और पाँच कारतूसी रिवाल्वर खरीदे। प्रत्येक हथियार
के साथ पचास या सौ कारतूस भी ले लिए। इन सब में लगभग चार हजार रुपये
व्यय हुए। कुछ कटार तथा तलवारें इत्यादि भी खरीदीं थीं।
मैनपुरी षड्यंत्र
इधर तो हम लोग अपने कार्य में व्यस्त थे, उधर मैनपुरी के एक सदस्य पर
लीडरी का भूत सवार हुआ। उन्होंने अपना पृथक संगठन किया। कुछ अस्त्र-शस्त्र
भी एकत्रित किए। धन की कमी की पूर्ति के लिए एक सदस्य से कहा कि अपने
किसी परिवार के सदस्य के यहाँ डाका डलवाओ। उस सदस्य ने कोई उत्तर न
दिया। उसे आज्ञापत्र दिया गया और मार डालने की धमकी दी गई। वह पुलिस
के पास गया। मामला खुला। मैनपुरी में धर-पकड़ शुरू हो गई। हम लोगों को
भी समाचार मिला। दिल्ली में कांग्रेस का अधिवेशन होने वाला था। विचार किया
गया कि "अमेरिका को स्वाधीनता कैसे मिली" नामक पुस्तक, जो यू.पी. सरकार
ने जब्त कर ली थी, कांग्रेस के अवसर पर बेच दी जाए। कांग्रेस के अधिवेशन

38 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
के उत्सव पर मैं शाहजहाँपुर की सेवा-समिति के साथ अपनी एम्बुलेंस की टोली
लेकर गया था। एम्बुलेंस वालों को प्रत्येक स्थान पर बिना रोक जाने की आज्ञा
थी। अधिवेशन पंडाल के बाहर खुले रूप में नवयुवक यह कह कर पुस्तक बेच
रहे थे- “यू.पी. में जब्त किताब “अमेरिका को स्वाधीनता कैसे मिली”।”
खुफिया पुलिस वालों ने कांग्रेस का कैम्प घेर लिया। सामने ही आर्यसमाज का
कैम्प था। वहाँ पर पुलिस ने पुस्तक विक्रेताओं की तलाशी लेनी आरंभ कर दी।
मैंने कांग्रेस कैम्प पर अपने स्वयंसेवक इसलिए छोड़ दिए कि वे बिना स्वागत
समिति के मंत्री या प्रधान की आज्ञा पाए किसी पुलिस वाले को कैम्प में न
घुसने दें। आर्यसमाज के कैम्प में गया। सब पुस्तकें एक टेंट में जमा थीं। मैंने
अपने ओवरकोट में सब पुस्तकें लपेटीं, जो लगभग दो सौ होंगी और उन्हें कंधे
पर डालकर पुलिस वालों के सामने से निकला। मैं वर्दी पहने था, टोप लगाए हुए
था। एम्बुलेंस का बड़ा-सा लाल बिल्ला मेरे हाथ पर लगा हुआ था, किसी ने कोई
सन्देह भी न किया और पुस्तकें बच गईं।
दिल्ली कांग्रेस से लौटकर शाहजहाँपुर आए। वहाँ भी पकड़-धकड़ शुरु हुई।
हम लोग वहाँ से चलकर दूसरे शहर के एक मकान में ठहरे हुए थे। रात्रि के
समय मकान मालिक ने बाहर से मकान में ताला लगा दिया। ग्यारह बजे के
लगभग हमारा एक साथी बाहर से आया। उसने बाहर से ताला पड़ा देख पुकारा।
हम लोगों को भी संदेह हुआ। सबके सब दीवार पर से उतर कर मकान छोड़कर
चल दिए। अंधेरी रात थी। थोड़ी दूर गए थे कि जोर की आवाज़ आई, “खड़े
हो जाओ कौन जाता है ?” हम लोग सात-आठ थे। समझे कि घिर गए। कदम
उठाना ही चाहते थें कि फिर आवाज़ आई, “खड़े हो जाओ, नहीं तो गोली मारते
हैं।” हम लोग खड़े हो गए। थोड़ी देर में एक पुलिस के दारोगा बंदूक हमारी
तरफ किए हुए, रिवाल्वर कंधे में लटकाए, कई सिपाहियों को लिए हुए आ
पहुँचे। पूछा- “कौन हो ? कहाँ जाते हो ?” हम लोगों ने कहा- “विद्यार्थी हैं,
स्टेशन जाते हैं।” “कहाँ जाओगे ?” “लखनऊ।” उस समय रात के दो बजे थे।

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स्वदेश-प्रेम ३९
लखनऊ की गाड़ी पाँच बजे जाती थी। दारोगा जी को शक हुआ। लालटेन आई,
हम लोगों के चेहरे रोशनी में देखकर उनका शक जाता रहा। कहने लगे- "रात
के समय लालटेन लेकर चला कीजिए। गलती हुई, माफ कीजिए।" हम लोग भी
सलाम झाड़कर चलते बने। एक बाग में फूँस की मड़ैया पड़ी थी। उसमें जा बैठे।
पानी बरसने लगा। मूसलाधार पानी गिरा। सब कपड़े भीग गए। जमीन पर भी
पानी भर गया। जनवरी का महीना था। खूब जाड़ा पड़ रहा था। रातभर भीगते
और ठिठुरते रहे। बड़ा कष्ट हुआ। प्रातःकाल धर्मशाला में जाकर कपड़े सुखाए।
दूसरे दिन शाहजहाँपुर आकर, बंदूकें जमीन में गाड़कर प्रयाग पहुँचे।
विश्वासघात
प्रयाग (इलाहाबाद) की एक धर्मशाला में दो-तीन दिन निवास करके विचार
किया गया कि एक व्यक्ति बहुत कमजोर है, यदि वह पकड़ा गया तो सब भेद
खुल जाएगा, अतः उसे मार दिया जाए। मैंने कहा- "मनुष्य-हत्या ठीक नहीं।"
पर अंत में निश्चय हुआ कि कल चला जाए और उसकी हत्या कर दी जाए। मैं
चुप हो गया। हम लोग चार सदस्य साथ थे। हम चारों तीसरे पहर झूँसी का
किला देखने गए। जब लौटे तब संध्या हो चुकी थी। उसी समय गंगा पार करके
यमुना-तट पर गए। शौचादि से निवृत्त होकर मैं संध्या समय उपासना करने के
लिए रेती पर बैठ गया। एक महाशय ने कहा- "यमुना के निकट बैठो।" मैं
तट से दूर एक ऊँचे स्थान पर बैठा था। मैं वहीं बैठा रहा। वे तीनों भी मेरे
पास ही आकर बैठ गए। मैं आँखें बंद किए ध्यान कर रहा था। थोड़ी देर में
खट से आवाज़ हुई। समझा कि साथियों में से कोई कुछ कर रहा होगा। तुरंत
ही फायर हुआ। गोली सन से मेरे कान के पास से निकल गई। मैं समझ गया
कि मेरे ऊपर ही फायर हुआ है। मैं रिवाल्वर निकालता हुआ आगे को बढ़ा।
पीछे फिर कर देखा, वह महाशय माउज़र हाथ में लिए मेरे ऊपर गोली चला रहे
हैं। कुछ दिन पहले मुझसे उनका झगड़ा हो चुका था, किन्तु बाद में समझौता हो

40 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
गया था। फिर भी उन्होंने यह कार्य किया। मैं भी सामना करने को प्रस्तुत हुआ।
तीसरा फायर करके वह भाग खड़े हुए। उनके साथ प्रयाग में ठहरे हुए दो सदस्य
और भी थे। वे तीनों भाग गए। मुझे देर इसलिए हुई कि मेरा रिवाल्वर चमड़े के
खोल में रखा था। यदि आधा मिनट और उनमें कोई भी खड़ा रह जाता तो मेरी
गोली का निशाना बन जाता। जब सब भाग गए, तब मैं गोली चलाना व्यर्थ
जान, वहाँ से चला आया। मैं बाल-बाल बच गया। मुझसे दो गज के फासले पर
से माउजर पिस्तौल से गोलियाँ चलाई गईं और उस अवस्था में जबकि मैं बैठा
हुआ था। मेरी समझ में नहीं आया कि मैं बच कैसे गया। पहला कारतूस फटा
नहीं। तीन फायर हुए। मैं गद्गद् होकर परमात्मा को स्मरण करने लगा। खुशी में
मुझे मूर्छा आ गई। मेरे हाथ से रिवाल्वर तथा खोल दोनों गिर गए। यदि उस
समय कोई निकट होता तो मुझे आराम से मार सकता था। मेरी यह दशा
लगभग एक मिनट तक रही होगी कि मुझसे किसी ने कहा, “उठ!” मैं उठा।
रिवाल्वर उठा लिया। खोल उठाने का स्मरण ही न रहा। 22 जनवरी की घटना
है। मैं केवल एक कोट और एक तहमद पहने था। बाल बढ़ रहे थे। नंगे सिर,
पैर में जूता भी नहीं। ऐसी हालत में कहाँ जाऊँ ? अनेक विचार उठ रहे थे।
इन्हीं विचारों में डूबा यमुना-तट पर बड़ी देर तक घूमता रहा। ध्यान आया
कि धर्मशाला चलकर ताला तोड़ सामान निकाल लूँ। फिर सोचा कि धर्मशाला
जाने से गोली चलेगी, व्यर्थ में खून होगा। अभी ठीक नहीं। अकेले बदला लेना
उचित नहीं। और कुछ साथियों को लेकर फिर बदला लिया जाएगा। मेरे एक
साधारण मित्र प्रयाग में रहते थे। उनके पास जाकर बड़ी मुश्किल से एक चादर
ली और रेल से लखनऊ आया। लखनऊ आकर बाल बनवाए। धोती-जूता खरीदे,
क्योंकि मेरे पास रुपये थे। रुपये न भी होते तो भी मैं सदैव जो चालीस-पचास
रुपये की सोने की अंगूठी पहने रहता था, उसे काम में ला सकता था। वहाँ से
आकर अन्य सदस्यों से मिलकर सब विवरण कह सुनाया। कुछ दिन जंगल में
रहा। इच्छा थी कि संन्यासी हो जाऊँ। संसार कुछ नहीं। बाद में फिर माताजी के

स्वदेश-प्रेम 41
पास गया। उन्हें सब कह सुनाया। उन्होंने मुझे ग्वालियर जाने का आदेश दिया।
थोड़े दिनों में माता-पिता सभी दादीजी के भाई के यहाँ आ गए। मैं भी वहाँ
पहुँच गया।
मैं हर वक्त यही विचार किया करता कि मुझे बदला अवश्य लेना चाहिए।
एक दिन प्रतिज्ञा करके रिवाल्वर लेकर शत्रु की हत्या करने की इच्छा से गया भी,
किन्तु सफलता न मिली। इसी प्रकार की उधेड़बुन में मुझे ज्वर आने लगा। कई
महीनों तक बीमार रहा। माताजी मेरे विचारों को समझ गई। माताजी ने बड़ी
तसल्ली दी। कहने लगीं कि, प्रतिज्ञा करो कि तुम अपनी हत्या की चेष्टा करने
वालों को जान से न मारोगे। मैंने प्रतिज्ञा करने में आनाकानी की, तो वह कहने
लगीं कि मैं मातृऋण के बदले में प्रतिज्ञा कराती हूँ, क्या जवाब है ? मैंने कहा-
“मैं उनसे बदला लेने की प्रतिज्ञा कर चुका हूँ।” माताजी ने मुझे बाध्य कर मेरी
प्रतिज्ञा भंग करवाई। अपनी बात पक्की रखी। मुझे ही सिर नीचा करना पड़ा।
उस दिन से मेरा ज्वर कम होने लगा और मैं अच्छा हो गया।
भाग जाने की दशा
मैं गाँव में गाँववासियों की भाँति उसी प्रकार के कपड़े पहनकर रहने लगा।
खेती भी करने लगा। देखने वाले अधिक-से-अधिक इतना समझ सकते थे कि मैं
शहर में रहा हूँ, सम्भव है कुछ पढ़ा भी होऊँ। खेती के कामों में मैंने विशेष
ध्यान दिया। शरीर तो हृष्ट-पुष्ट था ही, थोड़े ही दिनों में अच्छा-खासा किसान
बन गया। उस कठोर भूमि में खेती करना कोई सरल काम नहीं। बबूल, नीम के
अतिरिक्त कोई एक-दो आम के वृक्ष कहीं भले ही दिखाई दे जाएँ। बाकी वह
नितांत मरुभूमि (रेगिस्तान) है। खेत में जाता था। थोड़ी देर में ही झरबेरी के
काँटों से पैर भर जाते। पहले-पहले तो बड़ा कष्ट प्रतीत हुआ। कुछ समय बाद
अभ्यास हो गया। जितना खेत उस क्षेत्र का एक बलिष्ठ पुरुष दिन-भर में जोत
सकता था, उतना मैं भी जोत लेता था। मेरा चेहरा बिल्कुल काला पड़ गया।

42 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
थोड़े दिनों के लिए मैं शाहजहाँपुर की ओर घूमने आया तो कुछ लोग मुझे
पहचान भी न सके। मैं रात को शाहजहाँपुर पहुँचा। गाड़ी छूट गई। दिन के
समय पैदल जा रहा था कि एक पुलिस वाले ने पहचान लिया। वह और पुलिस
वालों को लेने के लिए गया। मैं भागा, पहले दिन का ही थका हुआ था। लगभग
बीस मील पहले दिन पैदल चला था। उस दिन भी पैतीस मील पैदल चलना
पड़ा।
मेरे माता-पिता ने सहायता की। मेरा समय अच्छी प्रकार व्यतीत हो गया।
माताजी की पूँजी तो मैंने नष्ट कर दी। पिताजी से सरकार की ओर से कहा गया
कि लड़के की गिरफ्तारी वारंट की पूर्ति के लिए लड़के का हिस्सा, जो उसके दादा
की जायदाद होगी, नीलाम किया जाएगा। पिताजी घबराकर दो हजार रुपये का
मकान आठ सौ में तथा और दूसरी चीजें भी थोड़े दामों में बेचकर शाहजहाँपुर
छोड़कर भाग गए। दो बहनों का विवाह हुआ। जो कुछ रहा-बचा था, वह भी
व्यय हो गया। माता-पिता की हालत फिर निर्धनों-जैसी हो गई। समिति के जो
दूसरे सदस्य भागे हुए थे उनकी बहुत बुरी दशा हुई। महीनों चनों पर ही समय
काटना पड़ा। दो-चार रुपये जो मित्रों तथा सहायकों से मिल जाते थे, उन्हीं पर
गुजर होता था। पहनने के कपड़े तक न थे। विवश होकर रिवाल्वर तथा बंदूकें
बेचीं, तब दिन कटे। किसी से कुछ कह भी न सकते थे और गिरफ्तारी के भय
के कारण कोई प्रबंध या नौकरी भी न कर सकते थे।
उसी दशा में मुझे व्यवसाय करने की सूझी। मैंने अपने सहपाठी तथा मित्र
श्री सुशील चंद्र सेन, जिनका देहांत हो चुका था, की स्मृति में बंगला भाषा का
अध्ययन किया। मेरे छोटे भाई का जन्म हुआ तो मैंने उसका नाम सुशील चंद
रखा। मैंने विचारा कि एक पुस्तकमाला निकालूँ। लाभ भी होगा। कार्य भी सरल
है। बंगला से हिन्दी में पुस्तकों का अनुवाद करके प्रकाशित करवाऊँगा। अनुभव
कुछ भी नहीं था। बंगला पुस्तक "निहिलिस्ट रहस्य" का अनुवाद प्रारंभ कर
दिया। जिस प्रकार अनुवाद किया, उसका स्मरण कर कई बार हँसी आ जाती है।

स्वदेश-प्रेम 43
कई बैल, गाय तथा भैंस लेकर ऊसर में चराने के लिए जाया करता था। खाली
बैठा रहना पड़ता था, अतएव कापी-पेंसिल साथ ले जाता और पुस्तक का अनुवाद
किया करता था। पशु जब कहीं दूर निकल जाते तब अनुवाद छोड़ लाठी लेकर
उन्हें हकारने जाया करता था। कुछ समय के लिए एक साधु की कुटी पर जाकर
रहा। वहाँ अधिक समय अनुवाद करने में व्यतीत करता था। खाने के लिए आटा
ले जाता था। चार-पाँच दिन के लिए इकट्ठा आटा रखता था। भोजन स्वयं पका
लेता था। जब पुस्तक ठीक हो गई, तो "सुशील माला" के नाम से ग्रंथमाला
निकाली। पुस्तक का नाम "बोलशेविकों की करतूत" रखा। दूसरी पुस्तक "मन
की लहर" छपवाई। इस व्यवसाय में लगभग पाँच सौ रुपये की हानि हुई। जब
राजकीय घोषणा हुई और राजनैतिक कैदी छोड़े गए, तब शाहजहाँपुर आकर कोई
व्यवसाय करने का विचार हुआ, ताकि माता-पिता की कुछ सेवा हो सके। विचार
किया करता था कि इस जीवन में अब फिर कभी आजादी से शाहजहाँपुर विचरण
न कर सकूँगा, पर परमात्मा की लीला अपार है। वे दिन आए। मैं पुनः
शाहजहाँपुर का निवासी हुआ।
पंडित गेंदालाल दीक्षित
आपका जन्म यमुना-तट पर बटेश्वर के निकट "मई" गाँव में हुआ था।
आपने दसवाँ दर्जा अंग्रेजी का पास किया था। आप जब औरैया जिला इटावा में
डी.ए.वी. स्कूल में अध्यापक थे, तब आपने शिवाजी समिति की स्थापना की थी,
जिसका उद्देश्य था शिवाजी की भाँति दल बनाकर धन एकत्र करना और उससे
हथियार खरीदना और उसे दल में बाँटना। इसकी सफलता के लिए आप रियासत
से हथियार ला रहे थे जो कुछ नवयुवकों की असावधानी के कारण आगरा में
स्टेशन के निकट पकड़ लिए गए थे। आप बड़े वीर तथा उत्साही थे। शांत बैठना
जानते ही न थे। नवयुवकों को सदैव कुछ-न-कुछ उपदेश देते रहते थे। एक-एक

44 रामप्रसाद बिस्मिल कीं आत्मकथा
सप्ताह तक बूट तथा वर्दी न उतारते थे।
जब आप ब्रह्मचारी जी के पास सहायता
लेने गए, तो दुर्भाग्यवश गिरफ़्तार कर लिए
गए। ब्रह्मचारी के दल ने अंग्रेजी राज्य में
कई डाके डाले थे। डाके डालकर ये लोग
चंबल के बीहड़ों में छिप जाते थे। सरकारी
राज्य की ओर से ग्वालियर महाराज को
लिखा गया। इस दल के पकड़ने का प्रबंध
किया गया। सरकार ने तो हिन्दुस्तानी
फौज भी भेजी थी, जो आगरा जिले में
चंबल के किनारे बहुत दिनों तक पड़ी रही।
पुलिस सवार तैनात किए, फिर भी ये लोग
भयभीत न हुए। विश्वासघात से पकड़े गए।
इन्हीं का एक आदमी पुलिस ने मिला लिया।
डाका डालने के लिए दूर एक स्थान निश्चय
किया गया, जहाँ तक जाने के लिए एक
पड़ाव देना पड़ता था। चलते-चलते सब थक
[चित्र-परिचय: गेंदालाल दीक्षित] गए, पड़ाव दिया गया। जो आदमी पुलिस
से मिला हुआ था, उसने भोजन लाने को कहा, क्योंकि उसके किसी संबंधी का
मकान निकट था। वह पूड़ी बनवाकर लाया। सब पूड़ी खाने लग गए। ब्रह्मचारी
जी जो सदैव अपने हाथ से बनाकर भोजन करते थे या आलू अथवा घुइयाँ
भूनकर खा लेते थे, उन्होंने भी उस दिन पूड़ी खाना स्वीकार किया। सब भूखे तो
थे ही, खाने लगे। ब्रह्मचारी जी ने भी एक पूड़ी ही खाई। उनकी जबान ऐंठने
लगी और जो अधिक खा गए थे, वे गिर गए। पूड़ी लाने वाला पानी लेने के
बहाने चल दिया। पूड़ियों में विष मिला हुआ था। ब्रह्मचारी जी ने बंदूक उठाकर

स्वदेश-प्रेम 45
पूड़ी लाने वाले पर गोली चलाई। ब्रह्मचारी जी का गोली चलाना था कि चारों
ओर से गोली चलने लगीं। पुलिस छिपी हुई थी। गोली चलने से ब्रह्मचारी जी को
कई गोलियाँ लगीं। तमाम शरीर घायल हो गया। पं. गेंदालालजी की आँख में
एक छर्रा लगा। बाईं आँख जाती रही। कुछ आदमी जहर के कारण मरे, कुछ
गोली से मारे गए। इस प्रकार 80 आदमियों में से 25-30 जान से मारे गए। सब
पकड़ कर ग्वालियर के किले में बंद कर दिए गए। किले में हम लोग जब पंडित
जी से मिले, तब चिट्ठी भेजकर उन्होंने हमको सब हाल बताया। एक दिन किले
में हम लोगों पर भी संदेह हो गया था, बड़ी कठिनता से एक अधिकारी की
सहायता से हम लोग निकल सके।
जब मैनपुरी षड्यंत्र का अभियोग चला, पंडित गेंदालालजी को सरकार ने
ग्वालियर राज्य से मँगाया। ग्वालियर के किले का जलवायु बड़ा ही हानिकारक
था। पंडितजी को क्षय (टी.बी.) रोग हो गया था। मैनपुरी स्टेशन से जेल जाते
समय ग्यारह बार रास्ते में बैठकर, जेल पहुँचे। पुलिस ने जब हाल पूछा तो उन्होंने
कहा- "बालकों को क्यों गिरफ्तार किया है ? मैं हाल बताऊँगा।" पुलिस को
विश्वास हो गया। आपको जेल से निकालकर दूसरे सरकारी गवाहों के निकट रख
दिया। वहाँ पर सब विवरण जान रात्रि के समय एक और सरकारी गवाह को
लेकर पंडितजी भाग खड़े हुए। भागकर एक गाँव में एक कोठरी में ठहरे। साथी
कुछ काम के लिए बाजार गया था। पंडितजी उसी कोठरी में तीन दिन बिना
अन्न-जल बंद रहे। समझे कि साथी किसी आपत्ति में फँस गया होगा, अंत में
किसी प्रकार जंजीर खुलवाई। रुपये वह सब साथ ही ले गया था। पास एक पैसा
भी न था। कोटा से पैदल आगरा आए। किसी प्रकार अपने घर पहुँचे। बहुत
बीमार थे। पिता ने यह समझकर कि घरवालों पर आपत्ति न आए, पुलिस को
सूचना देनी चाही। पंडितजी ने पिता से बड़ी विनय-प्रार्थना की और दो-तीन दिन
में घर छोड़ दिया। हम लोगों की बहुत खोज की। किसी का कुछ पता न पा
दिल्ली में एक प्याऊ पर पानी पिलाने की नौकरी कर ली। अवस्था दिनों-दिन