रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)
Autobiography of Ram Prasad Bismil
पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें8 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
दादाजी बड़ी सरल प्रकृति के मनुष्य थे। जब तक वे जीवित रहे, पैसे बेचने
का ही व्यवसाय करते रहे। उनको गाय पालने का बहुत बड़ा शौक था। स्वयं
ग्वालियर जाकर बड़ी-बड़ी गायें खरीद लाते थे। वहाँ की गायें काफी दूध देती हैं।
ये गायें बड़ी सीधी भी होती हैं। दूध दूहते समय उनकी टाँगें बाँधने की
आवश्यकता नहीं होती और जब जिसका जी चाहे बिना बच्चे के दूध दूह सकता
है। बचपन में मैं अक्सर जाकर गाय के थन में मुँह लगाकर दूध पिया करता
था। वास्तव में वहाँ की गायें दर्शनीय होती हैं।
दादाजी मुझे खूब दूध पिलाया करते थे। उन्हें अट्ठारह गोटी (बघिया बग्घा)
खेलने का बड़ा शौक था। शाम के समय रोजाना शिव-मंदिर में जाकर दो घंटे
तक परमात्मा का भजन किया करते थे। उनका लगभग पचपन वर्ष की आयु में
देहांत हुआ।
बचपन से ही पिताजी मेरी शिक्षा का अधिक ध्यान रखते थे और जरा-सी
भूल करने पर बहुत पीटते थे। मुझे यह बात अब भी बहुत अच्छी तरह याद है
कि जब मैं देवनागरी (हिन्दी) के अक्षर लिखना सीख रहा था तो मुझे "उ"
लिखना न आया। मैंने बहुत प्रयत्न किया। पर जब पिताजी कचहरी चले गए तो
मैं भी खेलने चला गया। पिताजी ने कचहरी से आकर मुझसे "उ" लिखवाया, मैं
लिख न सका। उन्हें मालूम हो गया कि मैं खेलने चला गया था। इस पर उन्होंने
मुझे बंदूक के लोहे के गज से इतना पीटा कि गज टेढ़ा पड़ गया। मैं भाग कर
दादीजी के पास चला गया, तब बचा। मैं छोटेपन से ही बहुत शरारती था।
पिताजी के पर्याप्त शासन रखने पर भी शरारत करता था। एक समय किसी के
बाग में जाकर आडू के वृक्षों में से सब आडू तोड़ डाले। माली पीछे दौड़ा, किन्तु
मैं उसके हाथ नहीं आया। माली ने सब आडू पिताजी के सामने ला रखे। उस
समय पिताजी ने मुझे इतना पीटा कि मैं दो दिन तक उठ नहीं सका। इसी
प्रकार खूब पिटता था, किन्तु शरारत अवश्य करता था। शायद उस बचपन की
मार से ही यह शरीर बहुत कठोर और सहनशील बन गया।