रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)
Autobiography of Ram Prasad Bismil
पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआत्म-चरित्र 23
'स्वामीजी मुझे धार्मिक तथा राजनीतिक उपदेश देते थे और इस प्रकार की
पुस्तकें पढ़ने का भी आदेश देते थे। राजनीति में भी आपका ज्ञान उच्च कोटि
का था। लाला हरदयाल से आपका बहुत परामर्श होता था। एक बार महात्मा
मुंशीरामजी (स्वर्गीय स्वामी श्रद्धानंदजी) को आपने पुलिस के प्रकोप से बचाया।
आचार्य रामदेवजी तथा श्री कृष्णजी से आपका बड़ा स्नेह था। राजनीति में आप
मुझसे अधिक खुलते न थे। आप मुझसे बहुधा कहा करते थे कि एंट्रेंस पास कर
लेने के बाद यूरोप-यात्रा अवश्य करना। इटली जाकर महात्मा मेजिनी⁵ की
जन्मभूमि के दर्शन अवश्य करना। सन् 1916 ई. में लाहौर षड्यंत्र का मामला
चला। मैं समाचार-पत्रों में उसका सब वृत्तांत बड़े चाव से पढ़ा करता था। श्री
भाई परमानंदजी में मेरी बड़ी श्रद्धा थी, क्योंकि उनकी लिखी हुई "तवारीख
हिन्द" पढ़कर मेरे हृदय पर बड़ा प्रभाव पड़ा था। लाहौर षड्यंत्र का फैसला
अखबारों में छपा। भाई परमानंदजी को फाँसी की सजा पढ़कर मेरे शरीर में आग
लग गई।—⁶ मैंने विचारा कि अंग्रेज बड़े अत्याचारी हैं, इनके राज्य में न्याय नहीं,
जो इतने बड़े महानुभाव को फाँसी की सजा का हुक्म दे दिया। मैंने प्रतिज्ञा की
कि इसका बदला अवश्य लूँगा। जीवन-भर अंग्रेजी राज्य को नष्ट करने का प्रयत्न
करता रहूँगा। इस प्रकार की प्रतिज्ञा कर चुकने के पश्चात् मैं स्वामीजी के पास
आया। सब समाचार सुनाए और अखबार दिया। अखबार पढ़कर स्वामीजी बड़े
दुखित हुए। तब मैंने अपनी प्रतिज्ञा के संबंध में कहा। स्वामीजी कहने लगे कि
प्रतिज्ञा करना सरल है, किन्तु उस पर दृढ़ रहना कठिन है। मैंने स्वामीजी को
प्रणाम कर उत्तर दिया कि यदि श्रीचरणों की कृपा रहेगी तो प्रतिज्ञा-पूर्ति में किसी
प्रकार की त्रुटि न करूँगा। उस दिन से स्वामीजी कुछ-कुछ खुले। आप बहुत-सी
बातें बताया करते थे। उसी दिन से मेरे क्रांतिकारी जीवन का सूत्रपात हुआ।
यद्यपि आप आर्यसमाज के सिद्धांतों को सर्वप्रकारेण मानते थे किन्तु परमहंस
रामकृष्ण, स्वामी विवेकानंद, स्वामी रामतीर्थ तथा महात्मा कबीरदास के उपदेशों
का वर्णन प्रायः किया करते थे।