रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)
Autobiography of Ram Prasad Bismil
पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें16 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
मुझसे पूछा कि क्या लाए ? मैंने कुछ कह कर टाल दिया। रुपये सब खर्च हो
गए थे। शायद एक गिन्नी बची थी, सो मैंने माताजी को लौटा दी।
मुझे जब किसी बात के लिए धन की आवश्यकता होती तो मैं माताजी से
कहता और वह मेरी माँग पूरी कर देती थीं। मेरा स्कूल घर से एक मील दूर
था। मैंने माताजी से प्रार्थना की कि मुझे साइकिल ले दें। उन्होंने लगभग एक सौ
रुपये दिए। मैंने साइकिल खरीद ली। उस समय मैं अंग्रेजी के नवें दर्जे में आ
गया था। किसी धार्मिक या देश संबंधी पुस्तक पढ़ने की इच्छा होती तो माताजी
से ही दाम ले जाता। लखनऊ कांग्रेस जाने के लिए मेरी बड़ी इच्छा थी। दादीजी
और पिताजी तो बहुत विरोध करते रहे, किन्तु माताजी ने मुझे खर्च दे ही दिया।
उसी समय शाहजहाँपुर में सेवा-समिति का आरंभ हुआ था। मैं बड़े उत्साह के
साथ सेवा-समिति में सहयोग देता था। पिताजी और दादीजी को मेरे इस प्रकार
के कार्य अच्छे न लगते थे, किन्तु माताजी मेरा उत्साह भंग न होने देती थीं,
जिसके कारण उन्हें अक्सर पिताजी की डाँट-फटकार तथा दंड भी सहन करना
पड़ता था। वास्तव में, मेरी माताजी स्वर्गीय देवी हैं। मुझमें जो कुछ जीवन तथा
साहस आया, वह मेरी माताजी तथा गुरुदेव श्री सोमदेव जी की कृपाओं का ही
परिणाम है। दादीजी और पिताजी मेरे विवाह के लिए बहुत अनुरोध करते, किन्तु
माताजी यही कहतीं कि शिक्षा पा चुकने के बाद ही विवाह करना उचित होगा।
माताजी के प्रोत्साहन तथा सद्व्यवहार ने मेरे जीवन में वह दृढ़ता उत्पन्न की कि
किसी आपत्ति तथा संकट के आने पर भी मैंने अपने संकल्प को न त्यागा।
मेरी माँ
ग्यारह वर्ष की उम्र में माताजी विवाह कर शाहजहाँपुर आई थीं। उस समय
वह नितांत अशिक्षित एक ग्रामीण कन्या के समान थीं। शाहजहाँपुर आने के थोड़े
दिनों बाद श्री दादीजी ने अपनी छोटी बहन को बुला लिया। उन्होंने माताजी को
गृहकार्य की शिक्षा दी। थोड़े दिनों में माताजी ने घर के सब काम-काज को समझ