रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)
Autobiography of Ram Prasad Bismil
पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआत्म-चरित्र 11
प्रातःकाल चार बजे ही बिस्तर से उठ जाता था। स्नान और संध्या आदि करने
के बाद व्यायाम करता, परंतु मन की भावनाएँ ठीक न होतीं। मैंने रात के समय
भोजन करना भी छोड़ दिया। रात को केवल थोड़ा दूध ही पीने लगा। मिर्च
खटाई तो छूता भी न था। मेरा स्वास्थ्य भी दर्शनीय हो गया। सब लोग मेरे
स्वास्थ्य को आश्चर्य से देखा करते थे।
मैं थोड़े दिनों में ही बड़ा कट्टर आर्यसमाजी हो गया। आर्यसमाज के
अधिवेशन में आता-जाता। संन्यासी महात्माओं के उपदेशों को बड़ी श्रद्धा से
सुनता। जब कोई संन्यासी आर्यसमाज में आता तो उसकी हर प्रकार से सेवा
करता, क्योंकि मेरी प्राणायाम सीखने की बहुत इच्छा थी। जिस संन्यासी का नाम
सुनता शहर से तीन-चार मील उसकी सेवा के लिए जाता। मैं इस बात की
परवाह नहीं करता कि वह संन्यासी किस मत का अनुयायी है। जब मैं अंग्रेजी
के सातवें दर्जे में था तब सनातनधर्मी पंडित जगत प्रसाद जी शाहजहाँपुर पधारे।
उन्होंने आर्यसमाज का खंडन करना शुरू किया। आर्यसमाजियों ने भी उनका
विरोध किया और पंडित अखिलानंदजी को बुलाकर शास्त्रार्थ (शास्त्रों का सही
अर्थ जानने के लिए बहस) कराया। शास्त्रार्थ संस्कृत में हुआ। जनता पर अच्छा
प्रभाव पड़ा। मेरे कामों को देखकर मुहल्ले वालों ने पिताजी से मेरी शिकायत की।
पिताजी ने मुझसे कहा कि आर्यसमाजी हार गए। अब तुम आर्यसमाज से अपना
नाम कटा दो। मैंने पिताजी से कहा कि आर्यसमाज के सिद्धांत विश्वव्यापी हैं,
उन्हें कौन हरा सकता है ? अनेक वाद-विवाद के पश्चात् पिताजी जिद्द पकड़ गए
कि आर्यसमाज से त्यागपत्र नहीं देगा तो मैं तुझे रात में सोते समय मार दूँगा,
या तो आर्यसमाज से त्यागपत्र दे दे या घर छोड़ दे।
मैंने यह सोचा कि पिताजी का क्रोध यदि अधिक बढ़ गया और उन्होंने
मुझ पर कोई ऐसी वस्तु दे पटकी जिससे बुरा परिणाम हुआ तो अच्छा न होगा।
अतएव घर छोड़कर चला जाना ही अच्छा है। मैं केवल एक कमीज पहने खड़ा
था और पायजामा उतार कर धोती पहन रहा था। पायजामे के नीचे लंगोट बँधा