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रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)

रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)

Autobiography of Ram Prasad Bismil

पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

पृष्ठ 21, कुल 128 में से

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आत्म-चरित्र 9
मेरी कुमारावस्था
जब मैं उर्दू का चौथा दर्जा पास करके पाँचवें में आया उस समय मेरी आयु
लगभग चौदह वर्ष की होगी। इस बीच मुझे पिताजी के संदूक से रुपये-पैसे चुराने
की आदत पड़ गई थी। इन पैसों से उपन्यास खरीदकर खूब पढ़ता। पुस्तक
विक्रेता महाशय पिताजी के जान-पहचान के थे। उन्होंने मेरी पिताजी से शिकायत
की। अब मेरी कुछ जाँच होने लगी। मैंने उन महाशय के यहाँ से किताब
खरीदना ही छोड़ दिया। मुझमें दो-एक खराब आदतें भी पड़ गईं। मैं सिगरेट पीने
लगा। कभी-कभी भंग भी जमा लेता था। छोटी उम्र में स्वतन्त्रतापूर्वक पैसे हाथ
आ जाने से और उर्दू के प्रेम व रसपूर्ण उपन्यासों और ग़ज़लों की पुस्तकों ने मेरे
चरित्र पर भी अपना बुरा प्रभाव दिखाना आरम्भ कर दिया। घुन लगना आरंभ
हुआ ही था कि परमात्मा ने बड़ी सहायता की। मैं एक रोज भंग पीकर पिताजी
की संदूकची में से रुपये निकालने गया। नशे की हालत में होश ठीक न रहने
के कारण संदूकची खटक गई। माताजी को संदेह हुआ। उन्होंने मुझे पकड़ा दिया।
चाभी भी पकड़ी गई। मेरे संदूक की तलाशी ली गई, बहुत से रुपये निकले और
सारा भेद खुल गया। मेरी किताबों में कई उपन्यास आदि भी पाए गए जो उसी
समय फाड़ डाले गए।
परमात्मा की कृपा से मेरी चोरी पकड़ ली गई, नहीं तो दो चार वर्ष में न
दीन का रहता न दुनिया का। इसके बाद भी मैंने बहुत घातें लगाईं, किन्तु
पिताजी ने संदूकची का ताला बदल दिया था। मेरी कोई चाल न चल सकी। अब
जब कभी भी मौका मिल जाता तो माताजी के रुपयों पर हाथ फेर देता था।
इसी प्रकार की बुरी आदतों के कारण दो बार उर्दू मिडिल की परीक्षा में उत्तीर्ण
न हो सका। तब मैंने अंग्रेज़ी पढ़ने की इच्छा प्रकट की। पिताजी मुझे अंग्रेज़ी
पढ़ाना न चाहते थे और किसी कारोबार में लगाना चाहते थे, किन्तु माताजी की
कृपा से मैं अंग्रेज़ी पढ़ने भेजा गया। दूसरे वर्ष जब मैं उर्दू मिडिल की परीक्षा में
फेल हुआ उसी समय पड़ोस के देव-मंदिर में, जिसकी दीवार मेरे मकान से मिली