रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)
Autobiography of Ram Prasad Bismil
पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआत्म-चरित्र १५
देना चाहिए। एक समय मेरे पिताजी दीवानी में किसी पर दावा करके वकील से
कह गए थे कि जो काम हो वह मुझसे करा लें। कुछ आवश्यकता पड़ने पर
वकील साहब ने मुझे बुला भेजा और कहा कि मैं पिताजी के हस्ताक्षर वकालतनामे
पर कर दूँ। मैंने तुरंत उत्तर दिया कि यह तो धर्म के विरुद्ध होगा, इस प्रकार
का पाप मैं कदापि नहीं कर सकता। वकील साहब ने बहुत कुछ समझाया कि
एक सौ रुपये से अधिक का दावा है, मुकदमा खारिज हो जाएगा। किन्तु मुझ
पर कुछ भी प्रभाव न हुआ, न मैंने हस्ताक्षर किए। अपने जीवन में हमेशा सत्य
का आचरण करता था, चाहे कुछ हो जाए, सत्य बात कह देता था।
मेरी माता मेरे धर्म-कार्यों में तथा शिक्षादि में बड़ी सहायता करती थीं। वह
प्रातःकाल चार बजे ही मुझे जगा दिया करती थीं। मैं नित्य-प्रति नियमपूर्वक हवन
किया करता था। मेरी छोटी बहन का विवाह करने के लिए माताजी और पिताजी
ग्वालियर गए। मैं और श्री दादीजी शाहजहाँपुर में ही रह गए, क्योंकि मेरी
वार्षिक परीक्षा थी। परीक्षा समाप्त करके मैं भी बहन के विवाह में सम्मिलित होने
को गया। बारात आ चुकी थी। मुझे गाँव के बाहर ही मालूम हो गया कि बारात
में वेश्या आई है। मैं घर न गया और न बारात में सम्मिलित हुआ। मैंने विवाह
में कोई भी भाग न लिया। मैंने माताजी से थोड़े रुपये माँगे। माताजी ने मुझे
लगभग 125 रुपये दिए, जिनको लेकर मैं ग्वालियर गया। यह अवसर रिवाल्वर
खरीदने का अच्छा लगा। मैंने सुन रखा था कि रियासत में बड़ी आसानी से
हथियार मिल जाते हैं। बड़ी खोज की। टोपीदार बंदूक तथा पिस्तौल तो मिलते
थे, किन्तु कारतूसी हथियारों का कहीं पता नहीं लगा। पता लगा भी तो एक
महाशय ने मुझे ठग लिया और 75 रुपये में टोपीदार पाँच फायर करने वाला एक
रिवाल्वर दिया। रियासत की बनी हुई बारूद और थोड़ी-सी टोपियाँ दे दीं। मैं इसी
को लेकर बड़ा प्रसन्न हुआ। सीधा शाहजहाँपुर पहुँचा। रिवाल्वर को भरकर
चलाया तो गोली केवल पंद्रह या बीस गज पर ही गिरी, क्योंकि बारूद अच्छी न
थी। मुझे बड़ा खेद हुआ। माताजी भी जब लौट कर शाहजहाँपुर आईं तो उन्होंने