रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)
Autobiography of Ram Prasad Bismil
पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंUploaded By Rajesh Tanti.
आत्म-चरित्र 7
ग्रंथों में पाया जाता है। इनमें से एक बड़ा चमत्कारक तथा आश्चर्यजनक प्रयोग
यह है कि जिस बच्चे को सूखे की बीमारी हो गई हो, यदि उसके सामने
चमगादड़ चीर कर लाया जाए तो एक-दो मास का बालक चमगादड़ को पकड़
कर खून चूस लेगा और बीमारी जाती रहेगी। यह बड़ी उपयोगी औषधि है और
एक महात्मा की बताई हुई है।
जब मैं सात वर्ष का हुआ तो पिताजी ने स्वयं ही मुझे हिन्दी अक्षरों का
लिखना सिखाया और एक मौलवी साहब के मकतब (विद्यालय) में उर्दू पढ़ने के
लिए भेज दिया। मुझे भली भाँति स्मरण है कि पिताजी अखाड़े में कुश्ती लड़ने
जाते थे और अपने से वलिष्ठ (मजबूत) तथा शरीर में डेढ़ गुने पट्ठे को पटक
देते थे। कुछ दिनों बाद पिताजी का एक बंगाली (श्री चटर्जी) महाशय से प्रेम हो
गया। चटर्जी महाशय की अंग्रेजी दवा की दुकान थी। वह बड़े भारी नशाबाज
थे। एक समय में आधा छटाँक चरस की चिलम उड़ाया करते थे। उन्हीं की
संगत में पिताजी ने चरस पीना सीख लिया, जिसके कारण उनका शरीर काफी
कमजोर हो गया। दस वर्ष में ही संपूर्ण शरीर सूख कर हड्डियाँ निकल आईं।
चटर्जी महाशय शराब भी पीने लगे। अतएव उनका कलेजा बढ़ गया और उसी
से उनकी मृत्यु हो गई। मेरे बहुत कुछ समझाने पर पिताजी ने अपनी चरस पीने
की आदत को छोड़ा, किन्तु बहुत दिनों के बाद।
मेरे बाद पाँच बहनों और तीन भाइयों का जन्म हुआ। दादीजी ने कहा कि
कुल की प्रथा के अनुसार कन्याओं को मार डाला जाए, किन्तु माताजी ने इसका
विरोध किया और कन्याओं के प्राणों की रक्षा की। मेरे कुल में यह पहला ही
समय था कि कन्याओं का पोषण हुआ। पर इनमें से दो बहनों और दो भाइयों
का देहांत हो गया। शेष एक भाई इस समय (1927) दस वर्ष का है और तीन
बहनें बचीं। माताजी के प्रयत्न से तीनों बहनों को अच्छी शिक्षा दी गई और
उनके विवाह बड़ी धूमधाम से किए गए। इससे पूर्व हमारे कुल की कन्याएँ किसी
को नहीं ब्याही गईं, क्योंकि वे जीवित ही नहीं रही थीं।