रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)
Autobiography of Ram Prasad Bismil
पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआत्म-चरित्र 19
श्रीयुत ब्रजलाल चोपड़ा था। पंजाब के लाहौर शहर में आपका जन्म हुआ था।
आपका परिवार प्रसिद्ध था, क्योंकि आपके दादा महाराजा रणजीत सिंह के मंत्रियों
में से एक थे। आपके जन्म के कुछ समय बाद आपकी माता का देहांत हो गया
था। आपकी दादी ने ही आपका पालन-पोषण किया था। आप अपने पिता की
अकेली संतान थे। जब आप बड़े हुए तो चाचियों ने दो-तीन बार आपको जहर
देकर मार देने का प्रयत्न किया, ताकि उनके लड़कों को ही जायदाद का अधिकार
मिल जाए। आपके चाचा आप पर बड़ा स्नेह रखते थे और शिक्षादि की ओर
विशेष ध्यान रखते थे। अपने चचेरे भाइयों के साथ-साथ आप भी अंग्रेजी स्कूल
में पढ़ते थे। जब आपने एंट्रेंस की परीक्षा दी तो परीक्षा-फल प्रकाशित होने पर
आप यूनिवर्सिटी में प्रथम आए और चाचा के लड़के फेल हो गए। घर में बड़ा
शोक मनाया गया। भोजन तक नहीं बना। आपकी प्रशंसा तो दूर, किसी ने उस
दिन भोजन करने को भी न पूछा और बड़ी उपेक्षा की दृष्टि से देखा। आपका
हृदय पहले से ही घायल था, इस घटना से आपके जीवन को और भी बड़ा
आघात पहुँचा।
चाचाजी के कहने-सुनने पर कालिज में नाम लिखा तो लिया, किन्तु बड़े
उदासीन रहने लगे। आपके हृदय में दया बहुत थी। प्रायः अपनी किताबें तथा
कपड़े दूसरे सह-पाठियों को बाँट दिया करते थे। नए कपड़े बाँटकर पुराने कपड़े
स्वयं पहना करते थे। एक-दो बार चाचाजी से दूसरे लोगों ने कहा कि ब्रजलाल
को कपड़े भी आप नहीं बनवा देते, जो वह पुराने फटे-कपड़े पहने फिरते हैं।
चाचाजी को बड़ा आश्चर्य हुआ, क्योंकि उन्होंने कई जोड़े कपड़े थोड़े दिनों पहले
ही बनवाए थे। आपके संदूकों की तलाशी ली गई। उनमें दो-चार जोड़ी पुराने
कपड़े निकले, तब चाचाजी ने पूछा तो मालूम हुआ कि वे नए कपड़े निर्धन
विद्यार्थियों को बाँट दिया करते हैं। चाचाजी ने कहा कि जब कपड़े बाँटने की
इच्छा हो, कह दिया करो, हम विद्यार्थियों को कपड़े बनवा दिया करेंगे, अपने
कपड़े न बाँटा करो। आप प्रायः निर्धन विद्यार्थियों को अपने घर पर ही भोजन