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सर्वकोश
रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)

रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)

Autobiography of Ram Prasad Bismil

पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

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पृष्ठ 36

Uploaded By Rajesh Tanti.

24 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
धार्मिक तथा आत्मिक जीवन में जो दृढ़ता मुझमें उत्पन्न हुई, वह स्वामीजी
महाराज के सदुपदेशों का ही परिणाम है। आपकी दया से ही मैं ब्रह्मचर्य-पालन में
सफल हुआ। आपने मेरे भविष्य-जीवन के संबंध में जो-जो बातें कही थीं, वे
अक्षरशः सत्य हुईं। आप कहा करते थे कि दुख है कि यह शरीर न रहेगा और
तेरे जीवन में बड़ी विचित्र-विचित्र समस्याएँ आएँगी, जिनको सुलझाने वाला कोई
न मिलेगा। यदि यह शरीर नष्ट न हुआ, जो असंभव है, तो तेरा जीवन भी
संसार में एक आदर्श जीवन होगा। मेरा दुर्भाग्य था कि जब आपके अंतिम दिन
बहुत निकट आं गए, तब आपने मुझे योगाभ्यास संबंधी कुछ क्रियाएँ बताने की
इच्छा प्रकट की, किन्तु आप इतनें दुर्बल हो गए थे कि जरा-सा परिश्रम करने या
दस-बीस कदम चलने पर ही आपको बेहोशी आ जाती थी। आप फिर कभी इस
योग्य न हो सके कि कुछ देर बैठकर कुछ क्रियाएँ मुझे बता सकते। आपने कहा
था, मेरा योग भ्रष्ट हो गया। प्रयत्न करूँगा, मरण समय पास रहना, मुझसे पूछ
लेना कि मैं कहाँ जन्म लूँगा। संभव है कि मैं बता सकूँ। नित्य-प्रति सेर-आध-सेर
खून गिर जाने पर भी आप कभी भी क्षुब्ध न होते थे। आपकी आवाज़ भी कभी
कमजोर न हुई। जैसे अद्वितीय आप वक्ता थे, वैसे ही आप लेखक भी थे।
आपके कुछ लेख तथा पुस्तकें आपके एक भक्त के पास थीं, जो यों ही नष्ट हो
गईं। कुछ लेख तथा पुस्तकें श्री स्वामी अनुभवानंदजी शांत ले गए थे। कुछ लेख
आपने प्रकाशित भी कराए थे। लगभग 48 वर्ष की उम्र में आपका निधन हो
गया। इस स्थान पर मैं महात्मा कबीरदास के कुछ अमृत वचनों का उल्लेख
करता हूँ, जो मुझे बड़े प्रिय तथा शिक्षाप्रद मालूम हुए :
'कबिरा' शरीर सराय है भाड़ा देके बस।
जब भठियारी खुश रहे तब जीवन का रस।। 1।।
'कबिरा' क्षुधा है कूक़री करत भजन में भंग।
याको टुकरा डारि के सुमिरन करो निशंक।। 2।।