रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)
Autobiography of Ram Prasad Bismil
पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
पृष्ठ 34, कुल 128 में से
संदर्भ में पढ़ें22 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
काफी हो गया था। स्वामीजी ने बड़ी गहरी ठंडी साँस ली। मैंने चेहरे की ओर
देखा तो आँखों से आँसू बह रहे थे। मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ। मैंने कई घंटे
प्रार्थना की, तब आपने उपरोक्त विवरण सुनाया।
अंग्रेजी की योग्यता आपकी बड़ी उच्चकोटि की थी। आपका शास्त्र-विषयक
ज्ञान बड़ा गंभीर था। आप बड़े निर्भीक वक्ता थे। आपकी योग्यता को देखकर
एक बार मद्रास की कांग्रेस कमेटी ने आपको अखिल भारतीय कांग्रेस का
प्रतिनिधि चुनकर भेजा था। आगरा की आर्य मित्र सभा के वार्षिकोत्सव पर
आपके व्याख्यानों को श्रवण कर राजा महेन्द्र प्रताप जी बड़े मुग्ध हुए थे। राजा
साहब ने आपके पैर छुए और आपको अपनी कोठी पर लिवा ले गए। उस समय
से राजा साहब बहुधा आपके उपदेश सुना करते और आपको अपना गुरु मानते
थे। इतना साफ निर्भीक बोलने वाला मैंने आज तक नहीं देखा। सन् 1913 ई.
में मैंने आपका पहला व्याख्यान शाहजहाँपुर में सुना था। आर्यसमाज के वार्षिकोत्सव
पर आप पधारे थे। उस समय आप बरेली में निवास करते थे। आपका शरीर
बहुत दुबला-पतला था, क्योंकि आपको एक अजीब रोग हो गया था। आप जब
शौच जाते थे, तब आपके खून गिरता था। कभी दो छटाँक, कभी चार छटाँक
और कभी-कभी तो एक सेर तक खून गिर जाता था। बवासीर आपको नहीं थी।
ऐसा कहते थे कि किसी प्रकार योग की क्रिया बिगड़ जाने से पेट की आँत में
कुछ विकार उत्पन्न हो गया। आँत सड़ गई। पेट चिरवाकर आँत कटवानी पड़ी
और तभी से यह रोग हो गया था। बड़े-बड़े वैद्य-डाक्टरों की औषधिं की किन्तु
कुछ लाभ नहीं हुआ। इतने कमजोर होने पर भी जब व्याख्यान देते तब इतने
जोर से बोलते कि तीन-चार फर्लांग से आपका व्याख्यान साफ सुनाई देता था।
दो-तीन वर्ष तक आपको हर साल आर्यसमाज के वार्षिकोत्सव पर बुलाया जाता।
सन् 1915 ई. में कतिपय सज्जनों की प्रार्थना पर आप आर्यसमाज मंदिर
शाहजहाँपुर में ही निवास करने लगे। इसी समय से मैंने आपकी सेवा में समय
व्यतीत करना आरंभ कर दिया।