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सर्वकोश
रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)

रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)

Autobiography of Ram Prasad Bismil

पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

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पृष्ठ 25

Uploaded By Rajesh Tanti.

आत्म-चरित्र 13

किया। कुछ व्यक्तियों ने बड़ी सहानुभूति दिखलाई परंतु रोग ठीक न हो सका।
स्वामीजी मुझे कई प्रकार के उपदेश दिया करते थे। मैं उन उपदेशों को सुनकर
उन पर अमल करने का पूरा प्रयत्न करता था। वास्तव में वह मेरे गुरुदेव तथा
पथ-प्रदर्शक थे। उनकी शिक्षाओं ने मेरे जीवन में आत्मिक बल का संचार किया
जिनके संबंध में मैं अलग से वर्णन करूँगा।
कुछ नवयुवकों ने मिलकर आर्यसमाज मंदिर में आर्य कुमार-सभा खोली थी,
जिसके साप्ताहिक अधिवेशन प्रत्येक शुक्रवार को हुआ करते थे। वहीं पर धार्मिक
पुस्तकों का पठन, विषय-विशेष पर निबंध-लेखन और पठन तथा वाद-विवाद होता
था। कुमार-सभा से ही मैंने जनता के सम्मुख बोलने का अभ्यास किया। प्रायः
कुमार-सभा के नवयुवक मिलकर शहर के मेलों में प्रचार करने जाया करते थे।
बाजारों में व्याख्यान देकर आर्यसमाज के सिद्धांतों का प्रचार करते थे। ऐसा
करते-करते मुसलमानों से बहस होने लगी। अतएव पुलिस ने झगड़े का भय
देखकर बाजारों में व्याख्यान देना बंद करा दिया। आर्यसमाज के सदस्यों ने
कुमार-सभा के प्रयत्न को देखकर उस पर अपना शासन जमाना चाहा, किन्तु
कुमार किसी का अनुचित शासन कब मानने वाले थे। आर्यसमाज के मंदिर में
ताला डाल दिया गया कि कुमार-सभा वाले आर्यसमाज मंदिर में अधिवेशन न
करें। यह भी कहा गया कि यदि वे वहाँ अधिवेशन करेंगे, तो पुलिस को बुलाकर
उन्हें मंदिर से निकलवा दिया जाएगा। कई महीनों तक हम लोग मैदान में अपनी
सभा के अधिवेशन करते रहे, किन्तु बालक ही तो थे, कब तक इस प्रकार कार्य
चला सकते थे ? कुमार-सभा टूट गई। तब आर्यसमाजियों को शांति हुई।
जब लखनऊ में कांग्रेस हुई तो अखिल भारतीय कुमार सम्मेलन का भी
वार्षिक अधिवेशन वहाँ हुआ। उस अवसर पर सबसे अधिक पुरस्कार लाहौर और
शाहजहाँपुर की कुमार सभाओं ने पाए थे, जिनकी प्रशंसा समाचार-पत्रों में
प्रकाशित हुई थी। उन्हीं दिनों मिशन स्कूल के एक विद्यार्थी से मेरा परिचय
हुआ। वह कभी-कभी कुमार-सभा में आ जाया करते थे। मेरे भाषण का उन पर